प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीरफोटो साभार: आईस्टॉक

जब उम्मीद बोल उठी: वे जो हार नहीं मानते

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर आशा और प्रिया जैसी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि जब बेटियां साथ दे जाती हैं, तो उनकी साहस पूरी दुनिया बदल सकती है
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कभी-कभी कुछ कहानियां हमें याद दिला जाती हैं कि साहस हमेशा शोर नहीं मचाता — कई बार वह बहुत धीरे बोलता है।

वह झलकता है दृढ़ निश्चय में, चुपचाप विरोध में, और उन बेटियों के सपनों में जो हार मानने से इंकार करती हैं।

झारखंड के हृदय में दो ऐसी कहानियां हैं — आशा वर्मा और प्रिया कुमारी की — जो दिखाती हैं कि असली ताकत कैसी होती है। अलग परिस्थितियों से आई इन दोनों की यात्रा में एक ही धड़कन है: आत्मसम्मान, साहस और यह विश्वास कि बेटियों को भी सपने देखने का अधिकार है।

सबके लिए आशा

जब 19 वर्षीय आशा वर्मा ने रांची में आयोजित राज्यस्तरीय बालिका सुरक्षा परामर्श बैठक में मंच संभाला, तो उनकी आवाज़ में हज़ारों अनसुनी बेटियों की ताकत थी।

वह सिर्फ एक वक्ता नहीं थीं - वह एक योद्धा थीं, जिन्होंने अपनी बाल विवाह की कोशिश को ठुकराकर खुद अपना भविष्य चुना।

गिरीडीह जिले के कोवर गाँव की आशा एक मज़दूर पिता और गृहिणी माँ की बेटी हैं। उनके गाँव में कम उम्र में शादी आम बात है। दो बड़ी बहनों की शादी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी। जब आशा ने मैट्रिक पास किया, तो परिवार ने सोचा कि अब “सही समय” है उसकी शादी का।

लेकिन आशा के अपने सपने थे — वह पढ़ना चाहती थी, कुछ बनना चाहती थी।

ऐसे कठिन समय में सीआरवाई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) और जागो फाउंडेशन ने उसके साथ खड़े होकर उसे संभाला। उन्होंने उसके माता-पिता को समझाया, आशा को हिम्मत दी और उसके फैसले पर टिके रहने की प्रेरणा दी।

धीरे-धीरे परिवार राज़ी हुआ — और आशा ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत हासिल की।

आज आशा होम साइंस की छात्रा है और किशोरियों की पीयर लीडर के रूप में उन्हें शिक्षा, अधिकार और स्वास्थ्य पर मार्गदर्शन देती है। 2023–24 में वह यूनिसेफ की पीयर एजुकेटर भी बनीं और 75 किशोरों को प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य अधिकारों पर प्रशिक्षित किया।

अब जब भी कहीं बाल विवाह की आहट मिलती है, वह आगे बढ़कर उसको रोकती है — अब तक उसने सात विवाहों को रोका, जिसमें उनका खुद का भी शामिल है।

उसका साहस उसे कोवर गाँव से रांची की ज्यूडिशियल एकेडमी तक ले गया, जहाँ उसने हाई कोर्ट के जजों और वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष ग्रामीण बालिकाओं की समस्याओं पर अपनी बातें पुरज़ोर तरीके से रखीं

उसने कहा — “लड़कियाँ स्कूल इसलिए छोड़ती हैं क्योंकि वे सुरक्षित सफर नहीं कर पातीं। और जब वे पढ़ाई छोड़ देती हैं, तो उनकी शादी कर दी जाती है।”

सुरक्षित यातायात की उसकी मांग साधारण लगती है, लेकिन हज़ारों लड़कियों की ज़िंदगी बदल सकती है। “जब एक लड़की अपनी आवाज़ पाती है, तो पूरा समुदाय सुनना शुरू करता है। हमारा काम उसे आगे धकेलना नहीं, बल्कि उसके साथ मज़बूती से खड़ा रहना है, ताकि उसका साहस ही बदलाव की प्रेरणा बने।”

मौन की मज़बूती

गिरीडीह ज़िला मुख्यालय से कुछ दूर, अलागुंडा पंचायत के गुरो गाँव में रहती हैं 19 वर्षीय प्रिया कुमारी — जो सुन या बोल नहीं सकतीं, लेकिन जिनका साहस किसी शब्द से कम नहीं।

बचपन का ज़्यादातर समय उन्होंने एकाकीपन में बिताया, यह मानकर कि वह “बोझ” हैं। समाज की चुप्पी ने उसके मन की कुंठा की दीवारों को और ऊँचा कर दिया था

फिर उसकी मुलाकात हुई जागो फाउंडेशन से, जो सीआरवाई के सहयोग से काम करता है।

डॉली कुमारी, फील्ड कर्मी, ने उनके घर जाना शुरू किया — धैर्य, स्नेह और निरंतर संवाद के साथ। उन्होंने प्रिया को साइन लैंग्वेज सिखाई, पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया और आत्मविश्वास जगाया।

डॉली बताती हैं — “शुरू में प्रिया कुछ बोलती नहीं थीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थीं। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इशारों और लेखन से खुद को व्यक्त करना शुरू किया। अब वह बड़ी सोचती हैं और खुद को विकलांगता से परे मानती हैं।”

अब प्रिया ने 2023 में मैट्रिक और 2025 में इंटरमीडिएट (बारहवीं) पास कर लिया है। उसने एएनएम (ऑक्ज़िलियरी नर्स मिडवाइफ) की परीक्षा भी पास कर ली है और नर्स बनकर समाज की सेवा करना चाहती हैं।

फिलहाल वह अपनी पढ़ाई एवं ट्रेनिंग पूरी करने में लगी है।

वह हर्ष के साथ इशारों में कहती है, “मैं ज़रूरतमंदों की सेवा करना चाहती हूँ।”

उसके पिता राजेश वर्मा कहते हैं — “उसने हर मुश्किल से लड़ाई की। वह बोल या सुन नहीं सकती, पर उसने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी। अब बस एक मौका चाहिए अपने सपने पूरे करने का।”

 

 

संख्या का भार: कितनी सुरक्षित हैं हमारी बेटियाँ?

आशा और प्रिया की कहानियाँ तब और चमक उठती हैं जब हम इन्हें भारत की हकीकत से जोड़कर देखते हैं।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2023 की रिपोर्ट बताती है कि आज भी सुरक्षा बेटियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है:

•     1,77,335 बच्चों के विरुद्ध अपराध दर्ज हुए — 2022 के मुकाबले 9.16% की बढ़ोतरी।

•     इनमें से 45.05% मामले अपहरण और लापता होने से जुड़े थे।

•     पॉक्सो अधिनियम के तहत 67,694 मामले दर्ज हुए — कुल बाल अपराधों का लगभग 38.17%।

•     98.96% पॉक्सो मामलों में पीड़ित लड़कियाँ थीं — और ज्यादातर अपराधी उनके परिचित।

•     झारखंड में ही 1,626 से अधिक ऐसे मामले दर्ज हुए।

ये आँकड़े बताते हैं कि खतरें दूर नहीं — वे अक्सर घरों, स्कूलों और आस-पड़ोस में छिपे होते हैं।

लड़कियों के लिए सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं — यह आज़ादी का विषय है: चलने की, सीखने की, सपने देखने की।

साहस की जीत – और साथ की ताकत

इसी वास्तविकता के बीच आशा और प्रिया की कहानियाँ उम्मीद के प्रतीक बनती हैं।

उनकी जीत व्यक्तिगत हैं, लेकिन वे यह भी दिखाती हैं कि जब समाज अपनी बेटियों के साथ खड़ा होता है, तो असंभव भी संभव हो जाता है।

आशा ने “नहीं” कहना सीखा क्योंकि किसी ने उसे मार्गदर्शन और विश्वास दिया।

प्रिया ने खुद को व्यक्त करना सीखा क्योंकि किसी ने उसे सुना।

कल की उम्मीद

इस अराष्ट्रीय बालिका दिवस पर जब हम आशा और प्रिया जैसी बेटियों के साहस का उत्सव मनाते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि हज़ारों और लड़कियाँ आज भी दो राहों पर खड़ी हैं — चुप्पी और आवाज़ के बीच, सपने और समझौते के बीच।

बराबरी की यह लड़ाई कानूनों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे छोटे सलों से जीतती है — जब एक शिक्षक सुनता है, एक पिता भरोसा करता है, एक माँ प्रोत्साहित करती है, और समुदाय साथ खड़ा होता है।

आशा और प्रिया सिर्फ़ नाम नहीं, भावना नहीं, प्रेरणा नहीं, बल्कि एक क्रिया हैं।

अतः जब उम्मीद को पोषित किया जाता है, तो वह बोल उठती है — चाहे मौन ही क्यों न हो ।

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