“मनोचिकित्सकों की कमी, बड़ी समस्या”

रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकेट्री एंड एलाइड साइंसेज रिनपास की निदेशक जयति सिमलाई ने विवेक मिश्रा से साक्षात्कार में कहा व्यापक शोध की जरूरत है
“मनोचिकित्सकों की कमी, बड़ी समस्या”
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Q

क्या आपने अपने मरीजों में जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध देखा है?

A

रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकेट्री एंड एलाइड साइंसेज (रिनपास) के पास जलवायु परिवर्तन को मानसिक स्वास्थ्य से सीधे जोड़ने वाला कोई विशिष्ट आंकड़ा नहीं है। फिर भी, प्राकृतिक आपदाएं, विस्थापन और आजीविका की हानि जैसे पर्यावरणीय तनाव वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। झारखंड की कृषि-निर्भर ग्रामीण आबादी फसल खराब होने या आर्थिक तनाव के कारण चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं का शिकार हो सकती है। प्रत्यक्ष संबंध सिद्ध करने के लिए और शोध की जरूरत है।

Q

क्या पर्यावरणीय तनाव या जलवायु घटनाओं के कारण चिंता, अवसाद या पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) जैसी कोई खास मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं?

A

रिनपास के 2003-2006 के आउटरीच कैंप डेटा में मिर्गी सबसे आम विकार (56.53 फीसदी) थी, लेकिन चिंता, अवसाद या पीटीएसडी का पर्यावरणीय तनाव से स्पष्ट संबंध नहीं बताया गया। वैश्विक स्तर पर बाढ़, सूखा और लू जैसी घटनाएं इन बीमारियों को बढ़ाती हैं। झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऐसे मामले संभव हैं, पर संस्थान-विशेष आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

जलवायु प्रेरित तनाव जैसे उच्च तापमान, प्रदूषण और बाढ़ किशोरों के ध्यान स्मृति कार्य प्रणाली को प्रभावित करती है। जब यह प्रणाली कमजोर पड़ती है तब भावनात्मक नियंत्रण कम होता है और आक्रमकता अधिक बढ़ जाती है
Q

क्या बाढ़, लू या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं प्रभावित लोगों में मनोवैज्ञानिक आघात पैदा करती हैं?

A

वैश्विक शोध बताते हैं कि ऐसी आपदाएं विस्थापन, आजीविका हानि और संपत्ति क्षति के कारण पीटीएसडी, चिंता और अवसाद उत्पन्न करती हैं। कृषि पर निर्भर झारखंड की ग्रामीण आबादी इनके प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। रिनपास के सामुदायिक कार्यक्रमों में ऐसे मामले देखे जा सकते हैं।

Q

क्या बच्चों और किशोरों में “ईको-एंजायटी” या जलवायु-संबंधी डर के लक्षण दिख रहे हैं?

A

पर्यावरणीय विनाश को लेकर लगातार चिंता (ईको-एंजायटी) दुनियाभर में युवाओं में बढ़ रही है। झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। वनों की कटाई और सूखे जैसी समस्याएं होने से यहां भी चिंताएं उभर सकती हैं। इसके लिए एक लक्षित और व्यापक अध्ययन जरूरी है।

Q

जलवायु-संबंधी अनिश्चितता युवाओं की भावनात्मक स्थिति को कैसे प्रभावित कर रही है?

A

अप्रत्याशित मौसम और संसाधन कमी के कारण विश्व भर में युवाओं में तनाव, चिंता और निराशा बढ़ रही है। झारखंड में कृषि पर निर्भरता के चलते जलवायु व्यवधान भावनात्मक संकट को और गहरा सकते हैं। सामुदायिक कार्यक्रम में इन मुद्दों को देखा जा सकता है।

Q

क्या आपने पर्यावरणीय क्षरण से विस्थापन या आजीविका हानि के कारण मानसिक संकट झेल रहे मरीजों का इलाज किया है?

A

रिनपास के उपलब्ध आंकड़ों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है। लेकिन ग्रामीण झारखंड में वन कटाई और मिट्टी क्षरण आम हैं। संस्थान के आउटरीच कार्यक्रमों में ऐसे मामले जरूर सामने आते हैं। वैश्विक अध्ययन विस्थापन और आजीविका हानि को अवसाद-चिंता से जोड़ते हैं, इसलिए रिनपास में भी यही रुझान संभव है।

Q

क्या प्रकृति पर सीधे निर्भर लोगों (जैसे किसान, मछुआरे) में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं ज्यादा देखी जा रही हैं?

A

रिनपास के पास इसका पुख्ता आंकड़ा नहीं है, लेकिन वैश्विक शोध बताते हैं कि किसान-मछुआरे जैसे समुदाय सूखा-बाढ़ जैसे जलवायु व्यवधानों से मानसिक रूप से ज्यादा प्रभावित होते हैं। झारखंड में कृषि मुख्य आजीविका होने से आउटरीच कैंपों (हजारीबाग, खूंटी आदि) में ऐसे मामले आम हैं।

Q

भारत में जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य के संबंध पर पर्याप्त शोध हो रहा है?

A

नहीं, भारत में इस विषय पर शोध अभी बहुत सीमित है। सामान्य मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों पर ही ज्यादा ध्यान है। इसके लिए अधिक फंड और फोकस की जरूरत है। रिनपास जैसे 130 साल पुराने संस्थान ऐसे शोध का नेतृत्व कर सकते हैं। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं, जबकि मनोचिकित्सकों की काफी कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, वर्ष 2020 तक 3,500 मनोचिकित्सक ही देश में मौजूद थे। जलवायु तनाव इस कमी को और गहरा रहा है।

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