गर्भावस्था में बढ़ता ब्लड प्रेशर हजारों जानें ले रहा, डब्ल्यूएचओ की नई पहल से जगी उम्मीद

दुनिया में 10-15 फीसदी गर्भावस्थाएं हाइपरटेंशन से प्रभावित, हर साल 42 हजार मातृ मौतें और पांच लाख से अधिक मृतजन्म-नवजात मौतें जुड़ी हैं
हर साल लगभग 42 हजार माताओं की मौत गर्भावस्था संबंधी हाइपरटेंसिव बीमारियों की जटिलताओं के कारण होती है।
हर साल लगभग 42 हजार माताओं की मौत गर्भावस्था संबंधी हाइपरटेंसिव बीमारियों की जटिलताओं के कारण होती है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • दुनिया में 10-15 फीसदी गर्भावस्थाएं हाइपरटेंशन से प्रभावित, जिससे माताओं और नवजातों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।

  • गर्भावस्था संबंधी हाइपरटेंसिव बीमारियां दुनियाभर में मातृ मौतों के करीब 16 फीसदी मामलों के लिए जिम्मेदार हैं।

  • हर साल लगभग 42 हजार माताओं की मौत गर्भावस्था संबंधी हाइपरटेंसिव बीमारियों की जटिलताओं के कारण होती है।

  • इन बीमारियों से हर साल 5 लाख से अधिक मृतजन्म और नवजात मौतें जुड़ी होने का अनुमान है।

  • मई 2026 में डब्ल्यूएचओ ने 140 से अधिक साझेदारों के साथ 20 प्राथमिक शोध सवालों की पहचान की।

गर्भावस्था किसी भी महिला के जीवन का बेहद खास समय होता है। लेकिन इसी दौरान बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर कई बार मां और बच्चे दोनों के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। प्री-एक्लेम्पसिया और गर्भावस्था से जुड़ी दूसरी हाइपरटेंसिव बीमारियां आज भी दुनिया भर में मातृ और नवजात मृत्यु का एक बड़ा कारण हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और उसके सहयोगी संगठनों ने इस चुनौती से निपटने के लिए 2026 से 2035 और उसके आगे के लिए एक नया वैश्विक रोडमैप जारी किया है। इसका उद्देश्य समय पर बीमारी की पहचान, बेहतर इलाज और जरूरत पड़ने पर तुरंत आपातकालीन चिकित्सा उपलब्ध कराना है।

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10 से 15 फीसदी गर्भावस्थाएं प्रभावित

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनिया में करीब 10 से 15 फीसदी गर्भावस्थाएं हाइपरटेंसिव डिसऑर्डर से प्रभावित होती हैं। ये बीमारियां वैश्विक मातृ मृत्यु के करीब 16 फीसदी मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। हर साल अनुमानित 42 हजार महिलाओं की मौत इन जटिलताओं के कारण होती है। इसके अलावा पांच लाख से अधिक मृतजन्म और नवजात मौतें भी इससे जुड़ी हैं।

प्री-एक्लेम्पसिया खास तौर पर चिंता का विषय है। इसमें गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर बढ़ने के साथ शरीर के दूसरे अंगों पर भी असर पड़ सकता है। अगर समय रहते इसकी पहचान और इलाज न हो, तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है।

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एक साधारण जांच बन सकती है जीवनरक्षक

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि कई मामलों में जिंदगी और मौत के बीच फर्क किसी बहुत महंगी तकनीक का नहीं, बल्कि समय पर की गई एक साधारण जांच का होता है। ब्लड प्रेशर की नियमित जांच, पेशाब में प्रोटीन की जांच और जरूरी दवाओं की उपलब्धता कई महिलाओं को गंभीर स्थिति से बचा सकती है।

लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में आज भी महिलाओं को ये बुनियादी सुविधाएं आसानी से नहीं मिलतीं। कहीं प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है, तो कहीं दवाएं और जांच की सुविधाएं सीमित हैं। कई जगह अस्पताल तक पहुंचने में भी काफी समय लग जाता है।

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गरीब देशों और दूरदराज इलाकों में ज्यादा खतरा

कम और मध्यम आय वाले देशों में समस्या और गंभीर है। ग्रामीण तथा दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं को नियमित प्रसवपूर्व जांच, जरूरी दवाओं और विशेषज्ञ चिकित्सा की सुविधा समय पर नहीं मिल पाती। गरीबी, युद्ध और मानवीय संकट जैसी परिस्थितियां इस जोखिम को और बढ़ा देती हैं।

डब्ल्यूएचओ की विशेषज्ञ डॉ. पास्केल अलोटे के अनुसार, प्री-एक्लेम्पसिया किसी भी गर्भावस्था में हो सकता है। इसका परिणाम कितना गंभीर होगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि महिला का ब्लड प्रेशर समय पर जांचा गया या नहीं और स्थिति बिगड़ने पर उसे गुणवत्तापूर्ण आपातकालीन इलाज कितनी जल्दी मिला।

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इलाज में भी है बड़ी कमी

इस बीमारी की चुनौती सिर्फ अस्पतालों तक पहुंच की नहीं है। नई और बेहतर दवाओं तथा उपचार के विकल्पों पर शोध की भी जरूरत है। डब्ल्यूएचओ ने बताया कि प्री-एक्लेम्पसिया और एक्लेम्पसिया की रोकथाम या इलाज के लिए विशेष रूप से विकसित और नियामकों से मंजूर दवाओं की संख्या बेहद सीमित है।

मई 2026 में डब्ल्यूएचओ ने 140 से अधिक साझेदारों को एक साथ लाकर इस क्षेत्र में शोध की प्राथमिकताएं तय कीं। विशेषज्ञों ने 20 महत्वपूर्ण शोध सवालों की पहचान की, जिनका उद्देश्य बीमारी को पहले पहचानना, उसके खतरे का बेहतर अनुमान लगाना और अधिक प्रभावी इलाज विकसित करना है।

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असर बच्चे के जन्म के बाद भी रहता है

गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर का असर सिर्फ प्रसव तक सीमित नहीं रहता। ऐसी महिलाओं में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, स्ट्रोक और किडनी की बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। गर्भावस्था के दौरान प्रभावित हुए बच्चों में समय से पहले जन्म और भविष्य में हृदय तथा मेटाबॉलिक बीमारियों से जुड़े जोखिम भी बढ़ सकते हैं।

अब जरूरत है मिलकर काम करने की

डब्ल्यूएचओ का नया रोडमैप केवल एक स्वास्थ्य योजना नहीं, बल्कि दुनिया के देशों के लिए साझा दिशा तय करने की कोशिश है। सरकारों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं, दवा कंपनियों, स्वास्थ्यकर्मियों, फंड देने वाली संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा।

संदेश साफ है-गर्भावस्था में बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर गंभीर जरूर है, लेकिन समय पर जांच और सही इलाज से कई जानें बचाई जा सकती हैं। किसी महिला की जिंदगी इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि वह दुनिया के किस हिस्से में रहती है।

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