एनएसओ रिपोर्ट पर सवाल: निजी अस्पतालों पर बढ़ी निर्भरता, स्वास्थ्य असमानता भी गहराई

जन स्वास्थ्य संगठन, भारत ने राष्ट्रीय नमूना सर्वे (एनएसएस) के 80वें दौर (2025) की स्वास्थ्य रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए
फाइल फोटो
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देश में बढ़ते रोग बोझ और इलाज पर जेब से होने वाले खर्च (ऑउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर) ने स्वास्थ्य असमानता को और गहरा कर दिया है। गैर सरकारी संगठन जन स्वास्थ्य अभियान, भारत ने राष्ट्रीय नमूना सर्वे (एनएसएस) के 80वें दौर (2025) की स्वास्थ्य रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे अधूरी तस्वीर बताई है और व्यापक सुधारों की मांग की है।

संगठन का कहना है कि यह सर्वेक्षण स्वास्थ्य सेवाओं को मुख्यतः अस्पताल-केन्द्रित नजरिये से प्रस्तुत करता है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण पहलू जैसे रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं नजरअंदाज हो जाते हैं।

संगठन से जुड़े गौरांग मोहापात्रा और प्रो. ऋतु प्रिया के अनुसार, सर्वे में ओपीडी सेवाओं पर कुल जेब से खर्च का आंकड़ा शामिल नहीं किया गया, जबकि इसके लिए डेटा एकत्र किया गया था। इसे एक बड़ी विश्लेषणात्मक कमी माना जा रहा है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 15 दिनों की अवधि में करीब 13.1 प्रतिशत लोगों ने बीमारी की सूचना दी, लेकिन इनमें से कितने लोगों ने इलाज नहीं कराया और क्यों नहीं कराया, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कमी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित लोगों की वास्तविक स्थिति को छुपाती है।

सर्वे के अनुसार, बुजुर्गों में बीमारी का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 44 प्रतिशत लोगों ने किसी न किसी बीमारी की शिकायत की। साथ ही देश में संक्रामक और गैर-संचारी रोगों का दोहरा बोझ बना हुआ है, जिसमें मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

इसके बावजूद अस्पताल में भर्ती होने की दर मात्र 2.9 प्रतिशत है, जो स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में बाधाओं की ओर संकेत करती है।

रिपोर्ट में निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ती निर्भरता भी सामने आई है। ग्रामीण क्षेत्रों में 58 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 65 प्रतिशत मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं। इसका कारण सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, पहुंच में दिक्कत और गुणवत्ता संबंधी समस्याएं बताई गई हैं।

इसी कारण इलाज पर खर्च का बोझ भी बढ़ा है। अस्पताल में भर्ती का औसत खर्च 34,064 रुपए है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह 6,631 रुपए है। मध्य खर्च क्रमशः 11,285 रुपए और 1,100 रुपए दर्ज किया गया है।

हालांकि मातृ स्वास्थ्य में सुधार हुआ है और 96.2 प्रतिशत प्रसव अब संस्थानों में हो रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव के बाद देखभाल अभी भी कमजोर बनी हुई है।

JSAI ने कहा है कि ये सभी तथ्य बताते हैं कि देश में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य अभी दूर है। संगठन ने सरकार से स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च को जीडीपी के कम से कम 3 प्रतिशत तक बढ़ाने, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, निजी क्षेत्र को नियंत्रित करने और सभी के लिए मुफ्त दवाएं व जांच उपलब्ध कराने की मांग की है।

संगठन का कहना है कि जब तक पारदर्शी डेटा और ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाए जाते, तब तक “सभी के लिए स्वास्थ्य” का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहेगा।

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