

ऊषा देवी फरीदाबाद के मेवला महाराजपुर गांव में किराए के एक छोटे से कमरे में अपने दो बच्चों, सास और भैया-भाभी के साथ रहती हैं। कमरे में एक तरफ छोटा सा किचन है और दूसरी तरफ शौचालय है। अंधेरे और सीलन से भरा उनका कमरा हमेशा तितर-बितर और अव्यवस्थित रहता है लेकिन उनकी चिंता दूसरे के घरों को चमकाने की है।
सुबह 8 बजे वह घर से निकल जाती हैं और रात को करीब 9 बजे घर लौटती हैं। इस दौरान उन्हें चार घरों की साफ-सफाई करनी होती है। करीब 12 घंटे काम करने के बाद वह महीने में लगभग 10 हजार रुपए कमाती हैं, जिसमें से चार हजार रुपए कमरे के किराए पर खर्च हो जाते हैं और शेष बच्चों की पढ़ाई व घर के खर्च में लग जाते हैं।
ऊषा देवी करीब 10 साल से इसी दिनचर्या के साथ जी रही हैं। उनके लिए न तो कोई छुट्टी का दिन है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा। कभी किसी जरूरी काम से छुट्टी करने पर उनके पैसे काट लिए जाते हैं। सरकार की तरफ से उन्हें राशन भी मिलना बंद हो गया है क्योंकि उनके पास फरीदाबाद का निवास साबित करने वाला कोई दस्तावेज नहीं है। ऊषा अशिक्षित हैं। वह सरकार की किसी भी योजना से अनजान हैं। सरकार की कोई योजना उनके पास नहीं पहुंची है।
घरेलू कामगारों के हालातों से चिंतित होकर उच्चतम न्यायालय ने 29 जनवरी 2025 को एक आदेश में कहा था, “घरेलू कामगारों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दे के संबंध में हम श्रम एवं रोजगार मंत्रालय को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय के साथ समन्वय में यह निर्देश देते हैं कि वे विषय विशेषज्ञों को सम्मिलित करते हुए एक संयुक्त समिति का गठन करें। यह समिति घरेलू कामगारों के हित, संरक्षण तथा उनके अधिकारों के विनियमन के लिए किसी विधिक ढांचे की सिफारिश किए जाने की आवश्यकता और उपयुक्तता पर विचार करेगी।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि विशेषज्ञ समिति की संरचना भारत सरकार तथा उससे संबंधित मंत्रालयों के विवेक पर छोड़ी जाती है। यह अपेक्षा की जाती है कि समिति 6 माह की अवधि के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिसके उपरांत भारत सरकार घरेलू कामगारों के मुद्दों और चिंताओं का प्रभावी रूप से समाधान करने हेतु किसी विधिक ढांचे को लागू करने की आवश्यकता पर विचार कर सके।
उच्चतम न्यायालय के आदेश पर गठित ने समिति ने जुलाई 2025 में तैयार अपनी रिपोर्ट स्पष्ट तौर पर कहा है कि घरेलू कामगारों के लिए किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू कामगारों से संबंधित मौजूदा कानूनी और नीतिगत ढांचों पर विस्तृत चर्चा के बाद समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि घरेलू कामगारों के लिए किसी नए कानूनी ढांचे को लागू करने की आवश्यकता वांछनीय नहीं है, क्योंकि घरेलू कामगार पहले से ही चार श्रम संहिताओं के प्रावधानों के अंतर्गत सम्मिलित हैं। ये श्रम संहितांए हैं- मजदूरी संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियां संहिता, 2020 और सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020।
घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन मार्था फैरल फाउंडेशन में सीनियर प्रोग्राम ऑफिसर पीयूष पोद्दार कहते हैं कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह बात तो मानी है कि भारत में घरेलू कामगार जिनमें मुख्यतः महिलाएं है, वह आज कम वेतन और सामाजिक और न्यायिक सुरक्षाओं की कमी के वजह से हाशिए पर है। लेकिन रिपोर्ट ने इसकी गहराइयों को समझने की कोई कोशिश नहीं की है।
इस वजह से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि घरेलू महिला कामगारों की दिक्कतें अन्य कामगारों की तरह ही हैं और इसलिए उन्हें कोई अलग कानून की जरूरत नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ), विमिन इन इन्फॉर्मल इंप्लॉयमेंट: ग्लोब्लाइजिंग एंड ऑर्गनाइजिंग (डब्ल्यूआईईजीओ), मार्था फैरल फाउंडेशन द्वारा किए गए शोध से यह पता चलता है कि घरेलू कामगार महिलाओं की दिक्कतें और मांगें बहुत अलग और विशिष्ट है जिसके लिए अलग कानून की जरूरत है।
पोद्दार आगे कहते हैं कि मौजूदा लेबर कोड जो हाल में ही नोटिफाई किए गई हैं, वह काम की जगह पर रिश्तों को एक नियोक्ता और कर्मचारी के ढांचे के अंतर्गत और कार्यस्थल को संस्थान के रूप में परिभाषित करता है। इसके वजह से ही घरेलू कामगार चार में से तीन कोड से वास्तविक तौर पर बाहर है।
घरेलू कामगार महिलाओं का जिक्र सिर्फ सामाजिक सुरक्षा कोड के अंतर्गत किया गया है। हालांकि कमिटी की रिपोर्ट में यह स्पष्ट लिखा गया है कि तीनों लेबर कोड के अंतर्गत घरेलू कामगार भी शामिल हैं, लेकिन इसका क्रियान्वयन कैसे होगा इसकी कोई बात नहीं की गई है। उनके अनुसार, जमीनी स्तर पर काम कर रही गैर सरकारी संस्थाओं का अनुभव यह कहता है कि घरेलू कामगार महिलाओं को अपना एक कानून चाहिए जो उन्हें सुरक्षा प्रदान कर सके।
मार्था फैरल की रिपोर्ट “वर्क विथाउट सिक्योरिटी: एन एनेलिसिस ऑफ विमिन डोमेस्टिक वर्कर्स कंडिशन, स्ट्रगल एंड एस्पिरेशंस” के अनुसार, निजी लोगों के घरेलू कार्य की अनौपचारिक व अनियमित प्रकृति सरकार के न्यूनतम हस्तक्षेप का कारण बनती है। अनेक घरेलू कामगारों की औपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को उपलब्ध स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, भविष्य निधि तथा पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच नहीं है।
प्रवासी घरेलू कामगारों के मामले में यह बहिष्करण और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि उन्हें प्रायः दस्तावेजों की कमी तथा सरकारी कार्यक्रमों के प्रति जागरुकता के अभाव के कारण इन योजनाओं तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त, औपचारिक अनुबंधों के अभाव तथा अनियमित वेतन भुगतान व्यवस्था के कारण अनेक घरेलू कामगार आर्थिक असुरक्षा और रोजगार की अस्थिरता से ग्रस्त रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू कामगारों के लिए विशेष रूप से तैयार की गई कल्याणकारी योजनाएं या तो सीमित हैं या उनका क्रियान्वयन कमजोर है, अथवा वे प्रवासी कामगारों की पहुंच से बाहर हैं। यह स्थिति एक महत्वपूर्ण नीतिगत खामी को उजागर करती है जिसके परिणामस्वरूप यह श्रमबल असुरक्षित और अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है। ऊषा देवी और उन जैसी करोड़ों घेरलू कामगार महिलाएं इसी तरह की अनिश्चितताओं से जूझ रही हैं।