

जब देश के विभिन्न हिस्सों से स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षात्मक उपकरण (पीपीई) और मास्क की कमी को ले कर रिपोर्ट्स आ रही है, उस वक्त भी ऐसा लगता है कि इसकी उपलब्धता को ले कर केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और संगठनों के बीच समन्वय नहीं है।
28 मार्च, 2020 की इन्वेस्ट इंडिया के एक आंतरिक दस्तावेज के हवाले से समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा है कि 38 मिलियन मास्क की आवश्यकता है, लेकिन आपूर्ति के लिए जिन कंपनियों से संपर्क किया गया था, उनके पास मात्र 9.1 मिलियन मास्क ही उपलब्ध थे। इसी तरह 6.2 मिलियन पीपीई की जरूरत थी, जबकि आपूर्ति के लिए पीपीई की उपलब्धता मात्र 0.8 मिलियन थी। इन्वेस्ट इंडिया, केंद्रीय वाणिज्य और व्यापार मंत्रालय के तहत एक गैर-लाभकारी संस्था है, ने 730 कंपनियों से संपर्क किया, जिनमें से केवल 319 ने ही आपूर्ति के लिए हामी भरी।
इस दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उपकरण की जरूरत का आकलन केवल चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए किया गया था। सही संख्या के बारे में कुछ भी ठोस न बताते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने 29 मार्च को कहा कि उपलब्धता के उनके आंकड़े इस अर्थ में पूरे नहीं हो सकते हैं कि राज्यों के पास जो उपकरण उपलब्ध थे, उसे इसमें शामिल नहीं किया गया।
इन्वेस्ट इंडिया को मास्क, पीपीई, वेंटिलेटर और अन्य आवश्यक सामग्री की खरीद और आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए राज्य और केंद्र सरकारों के साथ समन्वय करने का काम सौंपा गया है। डाउन टू अर्थ ने इन्वेस्ट इंडिया को ई-मेल लिखकर अग्रवाल के अवलोकन पर टिप्पणी मांगी। प्रतिक्रिया मिलते ही स्टोरी अपडेट कर दिया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब तक पीपीई की आवश्यकता और उपलब्धता को ले कर कोई भी संख्या बताने से लगातार इनकार किया है। अग्रवाल ने कहा, "यह एक ऐसी संख्या है जो आगे बढ़ती रहेगी। इसलिए, आपको संख्या बताने का कोई अर्थ नहीं।"
लगभग 10 ऐसे निर्माताओं की पहचान की है जो मास्क का उत्पादन शुरू करेंगे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब विदेश मंत्रालय से भी कहा है कि जितना संभव हो सके, मास्क आयात किया जाए।
केंद्र सरकार के उद्यम एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड ने 24 मार्च, 2020 को पीपीई, चश्मा, एन95 मास्क, नाइट्राइल दस्ताने, फेस शील्ड, ट्रिपल लेयर सर्वाइवल मास्क और इन्फ्रारेड थर्मामीटर की खरीद के लिए एक वैश्विक निविदा जारी की। इसकी बोली 15 अप्रैल 2020 को लगाई जाएगी और उसके बाद वह समय-सीमा तय की जाएगी, जिसके भीतर इन उपकरणों की आपूर्ति की जानी है।
अग्रवाल ने हमेशा पिछली बार की खरीद को 'वर्गीकृत’ (ग्रेडेड) बोल कर बचाव किया है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था?
एक नागरिक समूह, ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की मालिनी आइसोला पूछती हैं, “खरीद में सरकारी देरी ने कोविड-19 के खिलाफ हमारी लडाई को बाधित किया है और स्वास्थ्य कर्मचारियों को जोखिम में डाल दिया है। इन्वेस्ट इंडिया और "सरकारी ई-मार्केटप्लेस" के तहत अब नई पहल कितनी सफल हो पाएगी, यह लॉकडाउन से उत्पन्न चुनौतियों के कारण संदिग्ध है। हाल ही में एचएलएल ने रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन के जरिए सीधे बाहर से आपूर्ति पाने का प्रयास किया है। इसमें समय लगेगा। तब तक हमारा बफर स्टॉक खत्म होता चला जाएगा। सरकार के पास दो महीने का समय था, लेकिन वह अब जा कर सक्रिय हुई है।“
मलेरिया-रोधी दवाओं का परीक्षण नहीं
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों में संक्रमण की रोकथाम के लिए मलेरिया रोधी दवा हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्वीन के उपयोग की अनुमति दे दी है। एक सवाल के जवाब में, आईसीएमआर की महामारी विज्ञान इकाई के प्रमुख आर गंगाखेडकर ने स्पष्ट किया कि संक्रमण की रोकथाम में दवा की प्रभावकारिता पर कोई परीक्षण नहीं किया गया है, लेकिन इस पर अध्ययन चल रहा है। पहले दिन, दिन में दो बार 400 मिलीग्राम की खुराक, इसके बाद अगले 7 हफ्तों तक, हर सप्ताह एक बार 400 मिलीग्राम की सिफारिश की गई है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कोविड-19 रोगियों का इलाज करने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए 50 लाख रुपये बीमा की घोषणा करने वाली अधिसूचना में जिस ’दुर्घटना’ का उल्लेख है, उसका अर्थ सिर्फ मृत्यु है न कि कोई अन्य घटना या दुर्घटना।