क्या हम जरूरत से ज्यादा दवाइयां खा रहे हैं? आधुनिक चिकित्सा के दौर में बढ़ता ओवरमेडिकेशन का खतरा

हालांकि कोई एक निश्चित संख्या नहीं है, लेकिन ज़्यादातर चिकित्सा विशेषज्ञ और दिशा-निर्देश 'पॉलीफ़ार्मेसी' को नियमित रूप से 5 या उससे ज़्यादा दवाएं लेने के रूप में परिभाषित करते हैं, जबकि कुछ परिभाषाओं में यह संख्या 2 या उससे ज़्यादा से ही शुरू हो जाती है
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सिरदर्द हो, थकान हो, नींद न आए या शरीर में थोड़ी कमजोरी महसूस हो, हमारी पहली प्रतिक्रिया अक्सर किसी दवा या सप्लीमेंट की तलाश होती है। कई बार डॉक्टर की सलाह पर और कई बार खुद ही हम दवाइयां लेना शुरू कर देते हैं। सवाल यह है कि क्या वाकई हमें इन सभी दवाओं की जरूरत है?

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लाहरिया अपनी किताब पिल-फ्री में इसी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनका मानना है कि आधुनिक चिकित्सा ने इंसान को कई गंभीर बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं में जरूरत से ज्यादा जांच, दवाओं और चिकित्सा प्रक्रियाओं का इस्तेमाल भी बढ़ा है। इसे मेडिकल भाषा में 'ओवरमेडिकेशन' या 'ओवरमेडिकलाइजेशन' कहा जाता है।

डॉ लाहरिया कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति 5 से अधिक गोलियां एक दिन में लेता है तो इसे 'पॉलीफ़ार्मेसी' कहते हैं। उनके मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह है बीमारियों को लेकर बढ़ती चिंता।  शोध बताते हैं कि हालांकि कोई एक निश्चित संख्या नहीं है, लेकिन ज़्यादातर चिकित्सा विशेषज्ञ और दिशा-निर्देश 'पॉलीफ़ार्मेसी' को नियमित रूप से 5 या उससे ज़्यादा दवाएं लेने के रूप में परिभाषित करते हैं, जबकि कुछ परिभाषाओं में यह संख्या 2 या उससे ज़्यादा से ही शुरू हो जाती है।

विशेषकर बुजुर्गों में पॉलीफार्मेसी की यह समस्या गंभीर हो सकती है। अलग-अलग विशेषज्ञों से इलाज कराने पर मरीज के पास कई डॉक्टरों की अलग-अलग पर्चियां जमा हो जाती हैं। इन दवाओं के बीच आपसी प्रतिक्रिया (Drug Interaction) और दुष्प्रभाव का खतरा भी बढ़ सकता है।

डॉ लाहरिया बताते हैं कि मरीज़ों में बेवजह एंटीबायोटिक लेने की संस्कृति बढ़ रही है। इससे एंटी माइक्रोबिअल रेजिस्टेंस का ख़तरा बढ़ रहा है और यह समाज में दूसरे लोगों के लिए भी बुरा है क्योंकि ऐसे इस्तेमाल से किसी बीमारी से लड़ने की एंटीबायोटिक की क्षमता खत्म हो रही है।  

आजकल लोग नियमित रूप से फुल बॉडी चेकअप करवाते हैं। इन जांचों में कई बार रिपोर्ट में ऐसे छोटे-मोटे बदलाव सामने आते हैं, जिनका किसी बीमारी से सीधा संबंध नहीं होता। लेकिन रिपोर्ट में कोई आंकड़ा सामान्य सीमा से बाहर दिखते ही चिंता शुरू हो जाती है। इसके बाद अतिरिक्त जांच, डॉक्टरों के चक्कर और कई बार ऐसी दवाइयां शुरू हो जाती हैं जिनकी वास्तव में जरूरत नहीं होती।

विटामिन डी, बी12, कैल्शियम और दूसरे सप्लीमेंट्स इसका एक उदाहरण हैं। स्वस्थ रहने की चाह में बड़ी संख्या में लोग बिना किसी प्रमाणित कमी या चिकित्सकीय सलाह के इनका सेवन करने लगते हैं। जबकि संतुलित खानपान और जीवनशैली में सुधार कई मामलों में पर्याप्त हो सकता है।

डॉ लाहरिया कहते हैं, “लोगों को लगता है कि विटामिन और सप्लीमेंट्स खाने से कोई नुकसान नहीं होगा क्योंकि ये दवायें नहीं बल्कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए है लेकिन बड़ी गलत सोच है। बेवजह सप्लीमेंट्स खाना आपके लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है।”

असल आम धारणा के विपरीत सप्लीमेंट्स हमेशा सेफ नहीं होते औऱ आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं। हमारा लिवर शरीर के मुख्य फिल्ट्रेशन और वेस्ट-मैनेजमेंट सिस्टम के रूप में काम करता है। ऐसे सप्लीमेंट लिवर की कोशिकाओं पर बहुत ज़्यादा दबाव डाल सकते हैं, उनमें सूजन पैदा कर सकते हैं या उन्हें विषाक्त पदार्थों से ओवरलोड कर सकते हैं।

डॉ लाहरिया दिलचस्प किस्सा बताते हैं कि जब उन्होंने एक महिला की जांच के बाद उसे दवा नहीं लिखी तो उसने कहा कि वह उन्हें कोई फीस नहीं देगी। वह बताते हैं, “हो सकता है कि किसी व्यक्ति को दवा की ज़रूरत नहीं हो और केवल लाइफस्टाइल को ठीक करने से उसकी परेशानी का निदान संभव हो लेकिन अक्सर यह होता है अगर दवा न लिखी जाये तो फिर लोग दूसरे डॉक्टर के पास चले जाते हैं।”

हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि दवाइयां नुकसानदेह हैं या डॉक्टर की सलाह के बिना उन्हें बंद कर देना चाहिए। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी स्थितियों में नियमित दवाएं जीवनरक्षक हो सकती हैं। असली सवाल यह है कि क्या हर दवा की आज भी उतनी ही जरूरत है, जितनी उसे शुरू करते समय थी?

डॉ. लहरिया की किताब का महत्वपूर्ण संदेश यही है कि इलाज का मतलब ज्यादा दवाइयां, ज्यादा जांच और ज्यादा प्रक्रियाएं नहीं होना चाहिए। बेहतर स्वास्थ्य के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और स्वस्थ जीवनशैली की भूमिका को भी समझना होगा।

आखिरकार, हमें दवाओं का विरोध नहीं, बल्कि उनके विवेकपूर्ण इस्तेमाल की जरूरत है। अगली बार जब कोई नई दवा हमारी पर्ची में जुड़े, तो अपने डॉक्टर से एक सवाल जरूर पूछें—क्या मुझे वास्तव में इसकी जरूरत है?