भारत एक राजनैतिक 'गणतंत्र' तो बना लेकिन बहुसंख्यक (विपन्न) समाज, इस बनते हुये 'गणतांत्रिक देश' की प्रक्रिया और प्रयासों से बेदखल होता चला गया। फोटो: सिमोन विलियम्स
भारत एक राजनैतिक 'गणतंत्र' तो बना लेकिन बहुसंख्यक (विपन्न) समाज, इस बनते हुये 'गणतांत्रिक देश' की प्रक्रिया और प्रयासों से बेदखल होता चला गया। फोटो: सिमोन विलियम्स

भारतीय गणतंत्र की भावना और संभावना

क्या ग्राम-स्वशासन, वास्तव मे संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप साकार हो सका है?
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भारत के ‘सम्प्रभुता संपन्न गणराज्य’ बनने के 77 बरस बाद यदि आज महात्मा गांधी होते तो भारत के गांवों में उस 'ग्राम गणराज्य' को तलाशते, जिसे वे आजीवन तराशने का प्रयास करते रहे। महात्मा गांधी - भारत को सात लाख से अधिक गांवों के परिसंघ के रूप मे विकसित करना चाहते थे, जहां हर गांव स्वायत्त, स्वावलम्बी और स्वशासित रहे। 

महात्मा गांधी द्वारा वर्ष 1909 मे भावी भारत देश के दृष्टिकोण पर लिखे 'हिन्द स्वराज' मे ग्राम स्वराज की परिकल्पना, ऐसे गांव के रूप में किया गया जो एक ‘पूर्ण गणराज्य’ की तरह काम करे, अपनी बुनियादी जरूरतों को यथासंभव पूरा कर सके और जहां निर्णय लेने का अधिकार लोगों के हाथ में हो। महात्मा गांधी का मानना था कि 'ग्राम गणराज्य' भारत के संविधान का केंद्रीय मूल्य हो। 

संवैधानिक आदर्शों को लेकर कुछ काल्पनिक सवाल हो सकते हैं कि - क्या ग्राम गणराज्य के (राज)नैतिक मूल्य, भारत के 'संविधान' मे समाहित हैं? क्या संविधान मे ग्राम स्वराज, उन अधिकारों के साथ दर्ज़ है - जिसकी कल्पना महात्मा गांधी ने की थी? संविधान, स्थानीय संसाधनों पर ग्रामसभा के स्वशासन को सुनिश्चित करने के लिये वैधानिक रूप से कितना प्रतिबद्ध है?

क्या ग्राम-स्वशासन, वास्तव मे संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप साकार हो सका है? इन तमाम सवालों के सीमित उत्तर या सीमित कर दिये गये उत्तर, आज उस भारत देश और उसके सात लाख से अधिक गांवों का यथार्थ है, जो पूर्ण उत्तर होते हुए - भारत देश को गांवों के ‘अधिकार संपन्न ग्राम गणराज्यों के परिसंघ’ के रूप मे निर्मित कर सकता था।  

भारत की राजनैतिक स्वाधीनता के बाद ऐसा नहीं हो पाने का सरल उत्तर तो यही है कि - भारत देश और उसके विकास के सपनों को शनैः शनैः (विशेषाधिकार संपन्न) सरकार और (विशेषाधिकार हासिल करते संभ्रांत) समाज ने लगभग अगवा कर लिया।

बाद के बरसों का इतिहास, एक देश (भारत) के कई सपने और कई सपनों के अनेक देश (भारत) बनने की व्यथा-कथा है। एक ऐसे गणतंत्र की सत्यकथा जहां 'अधिकार संपन्न नागरिक' होने का हमारा अपना (राज)नैतिक बोध हर रोज जर्जर होता रहा (है)।

भारत एक राजनैतिक 'गणतंत्र' तो बना लेकिन बहुसंख्यक (विपन्न) समाज, इस बनते हुये 'गणतांत्रिक देश' की प्रक्रिया और प्रयासों से बेदखल होता चला गया। महात्मा गांधी के सात लाख ग्राम गणराज्य का परिसंघ, आज वास्तव मे - 'भारत की मौलिकता' और 'आईडिया ऑफ़ इंडिया' के दो (राज)नैतिक ध्रुवों के मध्य असमंजस मे खड़ा है।  

संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान, सभा के कुछ सदस्य हिन्द स्वराज मे लिखित विचारों तथा आदर्शों, और विशेष रूप से पंचायती राज व्यवस्था को भारतीय संविधान में शामिल किए जाने के पक्ष में थे। किंतु असहमतियों के स्वर हावी रहे और अंततः, संविधान सभा ने पंचायती राज आधारित प्रशासन की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इसे स्वीकारने पर, संविधान के मूल रूप और संरचना में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ता।

फिर भी महात्मा गांधी के प्रति नैतिकता के प्रदर्शन के लिए ही सही, पंचायती राज के लिए एक प्रावधान (अनुच्छेद 40) को राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत रखा गया, जो न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं।

साथ ही शराब निषेध (अनुच्छेद 47) और कुटीर उद्योगों (अनुच्छेद 43) से संबंधित अन्य प्रावधानों को भी शामिल किया गया। लेकिन इन तमाम उपेक्षित नैतिकताओं की संवैधानिक संहितायें, कालांतर मे कभी वैधानिक प्रतिबद्धताओं मे कायाकल्पित नहीं हो सकीं। यह केवल महात्मा गांधी ही नहीं, बल्कि उसे राष्ट्रपिता मानने वाले समाज को दिया गया झूठा दिलासा ही साबित हुआ।  

स्वाधीन भारत का संविधान लागू होने के लगभग चार दशकों के बाद वर्ष 1992 मे 'पंचायती राज' के उस प्रारूप को स्वीकारने के लिये अंततः राजनैतिक अभिमत एकजुट हुआ, जिसका सपना महात्मा गाँधी ने दशकों पहले देखा था। भारतीय गणतंत्र की नयी संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने के लिये वर्ष 1992 मे, 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।

लेकिन भारतीय गणतंत्र के इतिहास में, वर्ष 1950 के ‘सम्प्रभुता संपन्न गणराज्य’ और वर्ष 1992 के 'पंचायती राज' (ग्राम गणराज्य) की घोषणाओं के मध्य अनेक फ़ैसले, फ़ासले, फ़लसफ़े और फ़रमान उग आये थे। भारत की राजनैतिक स्वाधीनता के पश्चात्, विकास के लिये जिस विकसित प्रशासन तंत्र को अपनाया जा चुका था वहां, भारत देश का, वर्ष 1992 के ग्राम गणराज्य वाले अतीत मे लौटना लगभग असंभव था/ है - कालांतर मे इसी राजनैतिक तर्क ने एक-एक कर पंचायती राज के आदर्शों और अवसरों पर आशंकाओं का अमरबेल डाल दिया।

भावनाओं और संभावनाओं के संकेतकों मे तो 'गणतंत्र का विकेन्द्रीकरण' हुआ लेकिन ग्राम संसाधनों का सरकारीकरण दशकों पहले ही हो चुका था, लिहाज़ा विकेन्द्रीकरण अमूमन अफलदायी ही साबित हुये। वर्ष 1952 से 1960 के मध्य, पुनः संपादित किये गये 'भूमि सुधार क़ानूनों' के पश्चात् ग्राम के समस्त भूमि का सर्वोपरि अधिकार 'राज्य सरकारों' का हो गया।

अर्थात, भारत मे एक भूमि स्वामी अपनी भूमि का वैधानिक मालिक तो है, किन्तु उसके अधिकार, राज्य के क़ानून और राज्य के (जनहित हेतु आवश्यक) विकासात्मक कार्यों के अधीन हैं।  वर्ष 1957 के खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम के मातहत समग्र अवभूमि (सतह से एक फुट नीचे की समस्त भूमि) शामिल कर दी गयी, जिसके अंतर्गत शासन को उत्खनन के विशेषाधिकार हासिल हो गये, अर्थात खनिज सम्पदा के दोहन के लिये राज्य, भूमि का अधिग्रहण कर सकती है। वर्ष 1927 का औपनिवेशिक भारतीय वन अधिनियम तो समस्त वनभूमि को वैधानिक रूप से सरकारी साबित किये बैठा है, और जिसकी नज़रों मे गण और ग्राम-गणतंत्र सब वनविभाग के रहमोकरम पर है। 

कुल जमा, गांवों के 'जल, जंगल और ज़मीन' जैसे सामुदायिक संसाधनों की निर्णायक भूमिका मे राज्य के स्थापित होने का अर्थ - ग्राम गणराज्यों को 'संसाधनों और अवसरों' दोनों ही संभावनाओं से विस्थापित कर दिया जाना (भी/ही) है। 

फ़िर सवाल लाज़िमी हैं कि - क्या ग्राम संसाधनों का सरकारीकरण, पंचायती राज व्यवस्था के मातहत -ग्राम शासन के विकेन्द्रीकरण का अनुलोम नहीं है? यदि जल जंगल और ज़मीन के सार्वभौमिक अधिकार राज्य के हैं, तो इन संसाधनों पर ग्राम सभा के किसी भी अभिमत की कोई वैधानिक मान्यता है भी? संसाधनों के औपनिवेशिक विधानों की परिधि मे, विकेन्द्रीकरण के राजनैतिक नारों का क्या और कितना अर्थ है? और फ़िर ग्राम स्वशासन के केंद्र मे ग्रामसभा द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की वैधानिक और प्रशासनिक हैसियत आख़िर कितनी रह गयी है? 

ज़ाहिर है, इन ऐतिहासिक सवालों की मरुभूमि का, 'गणतंत्र' की मृगतृष्णा के पास ज़वाब है ही/भी नहीं। फ़िर भी गणतांत्रिक भारत के बहुसंख्यक ग्रामवासियों का मानना है कि, अब तो ‘जल, जंगल जमीन’ के समस्त क़ानूनों को पंचायती राज के मूल भावना के अनुरूप संशोधित (अथवा निरस्त) किया जाना चाहिये। साथ ही विकसित भारत के गणतंत्र को जिलाने की दिशा मे ‘जल जंगल ज़मीन’ के समस्त क़ानून को लागू करने की मूल इकाई, ग्रामसभा को मानते हुये संसाधनों के प्रशासन मे तत्संबंधी परिवर्तन भी होने चाहिये।

भारतीय गणतंत्र और भारत के संविधान के अपने मूल्यों को आज पूरी दुनिया 'वृहत्तम लोकतंत्र' का सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानती है। आवश्यकता इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाये जाने की है। इसका सबसे श्रेष्ठ मार्ग यही होगा कि पंचायती राज की भावना और संभावना के अनुरूप, हम औपनिवेशिक क़ानूनों और औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के अवशेषों को यथाशीघ्र समाप्त करें। विकसित भारत के अमृतमार्ग मे खड़े होने और आगे बढ़ने की न्यूनतम नैतिक योग्यता जिस ग्राम गणराज्य से संभव है, उसे अब आकर और अवसर दें ताकि हम सब मिलकर महात्मा गांधी के सपनों के अनुरूप - भारत को सात लाख स्वाधीन, स्वायत्त और स्वावलम्बी गांवों का परिसंघ बना सकें।  

(लेखक रमेश शर्मा – एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)

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