स्पेशल रिपोर्ट: केंद्र सरकार की खनन नीति का क्यों विरोध कर रहे हैं मछुआरे?

नवंबर 2024 में कोयला और खनन मंत्री ने गुजरात, अंडमान-निकोबार द्वीप और केरल के समुद्री क्षेत्रों में खनिज ब्लॉकों की नीलामी की घोषणा की थी
केरल के कोल्लम में मछली पकड़ने वाले 27 गांव हैं। इन गांवों में 27 से अधिक मछुआरे और 17 हजार से अधिक उनके सहायक रहते हैं
केरल के कोल्लम में मछली पकड़ने वाले 27 गांव हैं। इन गांवों में 27 से अधिक मछुआरे और 17 हजार से अधिक उनके सहायक रहते हैं(फोटो: रोहिणी कृष्णमूर्ति / सीएसई)
Published on

हमने कोई और हुनर नहीं सीखा है। जिंदगी जीने का खर्च पहले से ही ज्यादा है। अगर खनन से हमारी मछलियों की पकड़ कम हो गई तो हम कैसे जिंदा रहेंगे? यह चिंताजनक सवाल केरल के थंगास्सेरी गांव में रहने वाले पेशे से मछुआरे टैगोर लेटलस पूछते हैं। वह कोल्लम जिले के उन कई तटीय गांवों के मछुआरों में से एक हैं, जो केंद्र सरकार के तटवर्ती खनन की अनुमति देने के फैसले का विरोध कर रहे हैं।

नवंबर 2024 में कोयला और खनन मंत्री ने गुजरात, अंडमान-निकोबार द्वीप और केरल के समुद्री क्षेत्रों में खनिज ब्लॉकों की नीलामी की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य बारी-बारी से चूना कीचड़, पॉलिमेटैलिक नॉड्यूल और रेत का खनन करना है। इसी के साथ भारत ने तटवर्ती खनन में कदम रखा। कोल्लम जहां पर रेत के तटवर्ती खनन की योजना है वहां मछुआरे लगातार विरोध कर रहे हैं। 22 फरवरी 2025 को कोल्लम पोर्ट पर दिन-रात का प्रदर्शन भी हुआ, जिसमें सैकड़ों मछुआरे शामिल हुए।

पानी के बाद रेत दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्राकृतिक संसाधन है। एक मकान बनाने के लिए लगभग 200 टन रेत चाहिए, जबकि एक किलोमीटर हाइवे बनाने में 30 हजार टन रेत लगती है। भारत में रेत के मुख्य स्रोत बाढ़ प्रभावित जमीन, तटीय क्षेत्र और कृषि भूमि है।

हालांकि सरकार तटवर्ती रेत को निर्माण क्षेत्र के लिए एक सतत स्रोत मानती है। खनन मंत्रालय द्वारा 11 जनवरी 2025 को जारी दस्तावेज के अनुसार, “इससे देश को जमीन आधारित स्रोतों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।”

तटवर्ती रेत निकालने के लिए ड्रेजिंग जहाजों की जरूरत होती है, जो समुद्र की तलहटी से तलछट निकालते हैं और उन्हें किनारे तक पहुंचाते हैं। यह जहाज या तो सक्शन ड्रेज हो सकते हैं, जो ढीले पदार्थ को वैक्यूम की तरह खींचते हैं या फिर बकेट ड्रेज जो समुद्र की सतह पर बड़े कंटेनर घसीटते हैं। हालांकि, यह खनन उन तलछटों को हटा देता है जिनमें समुद्री जीव रहते हैं और जहां उनका आवास होता है। इससे स्थानीय प्रजातियों के विलुप्त होने और प्रजातियों की संरचना में बदलाव की संभावना होती है।

ट्रेंड्स इन इकोलॉजी एंड एवोल्यूशन पत्रिका में 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, ड्रेजिंग तलछट को हिला देती है, जिससे रेत के गुबार उठते हैं और दूसरी जगहों तक फैल जाते हैं। इससे पानी गंदला हो जाता है और जीव दम घुटने से मर सकते हैं। ये गुबार पानी की गुणवत्ता को खराब कर सकते हैं और तलछट से हानिकारक तत्व भी छोड़ सकते हैं। साथ ही यह प्रक्रिया शोर, रोशनी और कंपन से समुद्री जीवों को परेशान करती है (देखें,खतरनाक हलचल,)।

तिरुवनंतपुरम स्थित केरल विश्वविद्यालय के मत्स्य विज्ञान विभाग के प्रमुख और प्रोफेसर बीजू कुमार डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “कोल्लम एक बड़ा रेतीला क्षेत्र है, जिसमें बहुत अधिक कार्बनिक पदार्थ हैं। यह समुद्री जीवन के लिए अच्छा भोजन स्थल और आदर्श मछली पकड़ने का क्षेत्र है। यह झींगा समेत कई तलहटी में रहने वाली प्रजातियों के प्रजनन स्थल के रूप में भी काम करता है। कोल्लम तट पर सबसे ज्यादा प्रवाल प्रजातियों की विविधता पाई जाती है।”

कोल्लम में बड़ी संख्या में मछुआरा समुदाय रहता है। केरल फिशिंग स्टैटिस्टिक्स 2022 के अनुसार, कोल्लम में 27 समुद्री मछली पकड़ने वाले गांव हैं, जहां 27,470 सक्रिय मछुआरे और 17,831 सहायक कार्यकर्ता हैं। यहां का कुल वार्षिक मछली उत्पादन 1,11,310 टन है, जिसकी कीमत 2,215.83 करोड़ रुपए है। यह राज्य के कुल मछली उत्पादन मूल्य का करीब 20 फीसदी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह क्षेत्र कितना महत्वपूर्ण है।

इस क्षेत्र में तटवर्ती रेत खनन के लिए चिन्हित तीन ब्लॉक तट से 27-33 किमी दूर हैं, जो 242 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हैं और इनमें 30.24 करोड़ टन रेत मौजूद है। यही वह इलाका है जहां मछुआरे मछली पकड़ने जाते हैं। लेटलस बताते हैं, “हम आमतौर पर 25-40 किमी दूर के गहरे समुद्र तक जाते हैं। दिसंबर-जनवरी में हम टूना पकड़ने के लिए 100 किमी तक जाते हैं।”

और भी चिंताएं

मछलियों की पकड़ कम होने के अलावा, तटवर्ती खनन का एक और संभावित असर तटीय कटाव बढ़ना हो सकता है। 2012 में केरल स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने कहा था कि कोल्लम कटाव के लिए अत्यधिक संवेदनशील है, हालांकि इसे कृत्रिम तरीकों जैसे सीवॉल और ग्रोइन से आंशिक रूप से बचाया गया है, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।

मणडक्कल गांव में ग्रोइन यानी समुद्र के किनारे बनाए गए बांध के किनारे रहने वाली 50 वर्षीय लैला कहती हैं, “लहरें तेज हो गई हैं और वे ग्रोइन से टकराती हैं, जिससे मेरा घर क्षतिग्रस्त हो जाता है।” जब डाउन टू अर्थ उनके घर गया तो वहां फर्श पर दरारें साफ दिख रहीं थीं।

कोल्लम के पास तटवर्ती रेत खनन के संभावित प्रभावों पर आधारित केरल विश्वविद्यालय की 2025 की एक चेतावनी रिपोर्ट बताती है कि खनन से रेत के बहाव का पैटर्न बदल सकता है, जिससे तटरेखाएं और अस्थिर हो जाएंगी और आसपास की बस्तियां खतरे में पड़ेंगी।

कुमार एक और खतरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, “कोल्लम की अष्टमुडी झील, जो समुद्र में मिलती है दरअसल समुद्र तक भारी मात्रा में गाद लेकर आती है। इसका मतलब है कि रेत खनन के लिए चिन्हित क्षेत्र में भी भारी मात्रा में गाद होगी। ऑपरेटरों को गाद को रेत से अलग करने के लिए समुद्र के पानी से कई बार धोना पड़ेगा। इससे उस इलाके में भारी मात्रा में गाद जमा होगी, जो उथले पानी की तरफ बहकर पारंपरिक मछुआरों को प्रभावित करेगी, जो तट के पास मछली पकड़ते हैं।”

वह यह भी चेतावनी देते हैं कि पानी का मटमैलापन (टर्बिडिटी) निश्चित रूप से प्रवाल भित्तियों को नुकसान पहुंचाएगा, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत संरक्षित हैं और प्रस्तावित खनन स्थलों से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

अध्ययनों में तटवर्ती खनन के तटीय समुदायों पर प्रभाव को भी बताया गया है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ह्यूमैनिटीज एजुकेशन एंड सोशल साइंसेज में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन ने इंडोनेशिया के बावेन द्वीप पर तटवर्ती खनन के प्रभाव का आकलन किया और पाया कि इससे मछली पकड़ में कमी आई, समुद्री पानी की गुणवत्ता घटी, पर्यटन की आकर्षण क्षमता कम हुई और समुद्र तटों पर प्रदूषण बढ़ गया। अध्ययन ने पर्यावरण समर्थक समुदायों और खनन से जुड़ी पार्टियों के बीच सामाजिक टकराव की घटनाओं को भी दर्ज किया।

केंद्र सरकार तटवर्ती खनन का औचित्य यह बताकर देती है कि यह काम यूनाइटेड किंगडम, स्वीडन, इंडोनेशिया, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में हो रहा है। पूर्व केंद्रीय खनन मंत्री प्रह्लाद जोशी ने 3 अगस्त, 2023 को संसद में ऑफशोर एरियाज मिनरल (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अधिनियम, 2002 (ओएएमडीआर अधिनियम) में संशोधन के दौरान दिए भाषण में कहा, “देश पहले से ही तटवर्ती क्षेत्रों में खनन कर रहा है। वहां मछली पकड़ना भी होता है और लोग अब भी वहीं रहते हैं।”

यह अधिनियम 2002 में तटवर्ती क्षेत्रों में खनिज संसाधनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था और 2010 में लागू हुआ। भारत का तटवर्ती क्षेत्र विशेष आर्थिक क्षेत्र तक फैला है। वह बिंदु जहां तक भारत संसाधनों की खोज कर सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, खनन शुरू नहीं हो सका क्योंकि खनन ब्लॉकों के आवंटन में अनियमितताएं थीं। 2023 के संशोधन से सरकार को तटवर्ती क्षेत्रों में परिचालन अधिकारों की पारदर्शी नीलामी करने की अनुमति मिल गई है।

केंद्र का खनन मंत्रालय खनिज उत्पादन पर अधिभार लगाकर धन जुटाने के लिए एक तटवर्ती क्षेत्र खनिज ट्रस्ट भी बनाएगा। इस धन का उपयोग अनुसंधान, प्रशासन और खनन से पारिस्थितिकी या लोगों पर पड़ने वाले किसी भी प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए किया जाएगा।

एक खनन विशेषज्ञ नाम छिपाने की शर्त पर बताते हैं, “असली चुनौती नियमों की निगरानी और प्रवर्तन होगी।” वह आगे कहते हैं,“जमीनी खनन में हमारा रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। तटवर्ती क्षेत्र गतिशील वातावरण वाले होते हैं, जहां प्राकृतिक बदलाव लगातार होते रहते हैं। इसकी निगरानी करना और भी कठिन होगा।”

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in