न्याय के अर्थ और अनर्थ
न्यायतंत्र के अपने छद्म और अपने यथार्थ हैं - इसीलिये 'सापेक्षिक न्याय' और कुछ हद तक '(अ)तार्किक न्याय' अब बदलती दुनिया के नये न्यायतंत्र के लिए नई नैतिक सहुलियत है।
न्यायतंत्र की नैतिकता के अपेक्षाकृत उपेक्षित सिद्धांतों के बरअक्स - 'न्याय' और 'न्यायिक निर्णय' दो समानांतर संकल्पनाएं हैं। एक ओर जहां 'न्यायिक निर्णय' सीधे तौर पर न्यायालयों का न्यूनतम अपेक्षित उत्पाद है; वहीं 'न्याय' वृहद् अर्थों में न्यायाधीश अथवा न्यायमूर्ति का अधिकतम 'न्यायिक विवेक' है - जिसकी अपेक्षा समाज और याचक करता है।
गौरतलब है कि विगत कुछ बरसों मे अनेक न्यायिक निर्णयों ने, न्याय (अथवा न्यायिक विवेक) की नैतिक परिधि को लांघा है। विगत तीन दशकों के संक्षिप्त इतिहास मे हम इसे 'सापेक्षिक न्याय' के (राज)नैतिक केंद्र बिंदु से लेकर '(अ)तार्किक न्याय' के नेपथ्य तक पढ़, सुन, देख और समझ सकते हैं।
मौजूं सवाल यह है कि – न्यायिक संस्थानों के माध्यम से न्याय देने वालों की न्यूनतम ‘नैतिक योग्यता’ क्या होनी चाहिये? क्या संविधान की विशेषज्ञता उनके पूर्णता का पैमाना हो सकता है या न्यायिक प्रशासन की दक्षता को नयी योग्यता माना जाना चाहिये?
क्या सर्वज्ञाता विधि-विशेषज्ञ से न्याय की अपेक्षा की जाये अथवा न्यायिक सुलह के पैरोकार बेहतर विकल्प हैं? क्या न्याय के प्रदाता आज के समाज और दुनिया के बेहतर जानकर हों या फिर देशकाल की सामाजिक दूरदर्शिता को न्यायाधीशों के लिये नयी कसौटी माना जाये?
और फिर जब न्यायालयों की ओर उम्मीदों का कारवां हर रोज और अधिक बढ़ता ही जा रहा हो, तब न्याय अथवा न्यायिक निर्णय देने वाले को मशीन (अथवा कृत्रिम मेधा) बना दिया जाये अथवा न्यायतंत्र के किसी विवेकसम्मत विकेन्द्रित स्वरुप पर सहमत होने का निर्णायक वक्त आ गया है?
कुल जमां - इनमें से किसी भी सवाल के आधे-अधूरे जवाब यह नही बताते कि इन तमाम योग्यताओं के साथ/बिना भी, अनेक न्यायालयीन निर्णय 'न्याय होने' अथवा 'अन्याय न होने' की न्यूनतम सुरक्षा तक दे पाने मे अमूमन असफल ही साबित हुये हैं।
न्यायालयों के बाहर प्रतीक्षरत लोगों के कारवां के सरल निहितार्थ तो यही है कि वह 'न्याय' की उम्मीद लेकर आजीवन प्रतीक्षा के लिये, कम से कम मानसिक रूप से तैयार है। लेकिन, याचिकाकर्त्ता की अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण अपेक्षा अक्सर यह भी होती है कि - उसके अथवा दूसरे के साथ यही अन्याय फिर न हो। इसीलिये न्यायिक निर्णयों को, जाने-अनजाने स्वयं के द्वारा स्थापित एल्गोरिदम के स्वनिर्मित परिधि से बाहर आना होगा।
सेंटर फॉर लीगल स्टडीज के अनुसार कुछ जटिल गणितीय प्रमेयों के आधार पर यह अनुमान लगा लेना कठिन नहीं है कि - किसी न्यायालयीन प्रकरण का संभावित निर्णय क्या हो सकता है। न्यायालयों अथवा न्यायाधीशों के निर्णयों के नये एल्गोरिदम मे संभावित न्यायालयीन निर्णयों की यह प्रत्याशा, वास्तव में नैतिक विवेक नहीं बल्कि (राज)नैतिक व्यवहारिकता का नया उत्पाद हो चला है।
इसे न्याय मानना अथवा न मानना, न्यायालयों के समक्ष प्रतीक्षारत कारवां के उन हरेक लोगों पर निर्भर करता है, जो केवल न्यायिक निर्णय से कहीं अधिक – ‘न्यायपूर्ण निर्णय’ की अपेक्षा रखते हैं।
यथार्थ तो यह भी है कि, भारत सहित अनेक लोकतान्त्रिक देशों में 'सामाजिक - आर्थिक बहुमत' न्यायालयीन निर्णयों का नया केंद्रबिंदु है - जहां अब 'अल्पसंख्यक', अपवाद की अपनी पुरानी भूमिका मे, 'बहुसंख्यक' की नयी भूमिका के आगे और अधिक बौना अथवा गौण हो चला है।
न्यायालयीन निर्णयों की नयी परिभाषा मे इसे, बहुसंख्यक समाज के 'सामाजिक आर्थिक विकास' के लिये अपरिहार्य शर्त की तरह लगभग स्वीकार किया ही जा चुका है। इसलिये नये कालखंड में 'न्याय' को (विशेष रूप से अधिकार विहीन कर जा रहे लोगों के लिये) वास्तव में 'न्यायिक निर्णयों' के नये उत्पाद के रूप मे अपघटित किया जा रहा है।
इन न्यायिक निर्णयों का प्रथम और अंतिम लाभार्थी, अक्सर समाज का वह बहुसंख्यक वर्ग हो चला है - कम से कम जिसके लिये तो तथाकथित विकास के लिये समर्पित न्यायिक निर्णय, एक नया सुकून है; जहां इस नये समाज को आने वाले कल के बजाये, आगत आज मे जीना पसंद है। समाज मे जारी संक्रमण के इस दौर के प्रतिबिम्ब, आज 'सामाजिक - आर्थिक बहुमत' के आयाम वाले न्यायिक निर्णयों के रूप मे शनैः शनैः आकार ले रहे हैं।
न्यायतंत्र के पुराने एल्गोरिदम का चर्चित उदाहरण वर्ष 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों के द्वारा दी गयी 'वन' की वह परिभाषा है, जिसने हमेशा के लिये (अल्पसंखयक) आदिवासी समाज के ऊपर वन विभाग की सर्वोच्चता को स्थापित कर दिया और वन एक जीवित निकाय से सरकारी उत्पाद मे अपघटित कर दिया गया।
जंगल से आदिवासी समाज के खुले विस्थापन और संगठित बेदखली का समकालीन इतिहास यहीं से प्रारम्भ होता है और कहीं ख़त्म नहीं होता। इस एक न्यायिक निर्णय ने - आदिवासियों के लिये हो सकने वाले न्याय के संभावित समाप्ति की घोषणा ही कर दी।
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (1996) की वैधानिक सीमाओं मे क़ैद रह जाना अथवा वनाधिकार कानून (2006) को वैधानिक सीमाओं में कैद कर दिया जाना, दोनों ही सत्य वर्ष 1996 के उस न्यायिक निर्णय का ही विस्तार है, जिसने आदिवासी समाज को अपनी ही मातृभूमि मे अतिक्रमणकारी बना दिया।
वन की परिभाषा न्यायिक विवेक से नहीं, बल्कि उस (औपनिवेशिक) न्यायिक निर्णय के प्रारूप मे दी गयी, जिसने जंगलों के मालिक को महज याचक के रूप में सदा सर्वदा के लिये अपघटित कर दिया।
न्यायतंत्र के नये एल्गोरिदम का नया अतिचर्चित उदाहरण वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों के द्वारा (अरावली के उदाहरण से) दी गयी 'पहाड़ों' की वह संभावित परिभाषा है, जिसने -बहुसंख्यक समाज के लिये विकास की प्रधानता को स्थापित करते हुये पहाड़ों को एक जीवित निकाय से वाणिज्यिक उत्पाद में अपघटित कर दिया।
संभव है कि यह भारत मे पहाड़ों और उस पर चिरकाल से निर्भर रहने वाले समाज और सजीवों के अंत की शुरुआत साबित हो।
पहाड़ों के विनाश के नये राजमार्ग को जिस न्यायिक निर्णय के माध्यम से स्थापित किया गया/ जा रहा है - वह (तथाकथित) विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा - वास्तव मे ऐसा बहुसंख्यक समाज ने चाहा और सर्वोच्च न्यायालय ने कह दिया है।
(तथाकथित) विकास की वकालत करने वाला बहुसंख्यक समाज और उसे स्थापित करने वाला न्यायतंत्र जीता, और पराजित वह मुट्ठीभर लोग हुये जिनके प्रतिरोध पर, बीसवीं सदी के पिछड़ेपन का आरोप चस्पां कर दिया गया।
वर्ष 1996 से वर्ष 2025 के मध्य जिन न्यायिक निर्णयों को 'न्याय' के न्यूनतम विवेक की कसौटी पर परखा जा सकता है वह उन उदाहरणों के रूप मे न्यायालयों के न्यायतंत्र मे दर्ज हो चुका है - जो 'न्यायिक विवेक' की सायास सतत संकुचित की जा रही सीमाओं और ‘न्यायिक निर्णयों’ के नये विस्तार का वर्तमान है।
फिलहाल, हम इसे विकसित होते भारत और समृद्ध होने की बेइंतिहां चाहत रखने वाले भारतवासियों का अपना सपना कह सकते हैं। लेकिन, विकसित भारत का तकाजा यही है कि - समाज और सरकार दोनों ही, बेहतर कल की भावना और संभावना को विवेकपूर्ण दृष्टि से देखने और गढ़नें की अपनी न्यूनतम नैतिक योग्यता का अब उपयोग करे - कदाचित तभी न्यायालय भी, केवल ‘न्यायिक निर्णयों’ से आगे बढ़कर 'न्यायपूर्ण निर्णय' की ओर अपना कदम बढ़ायेंगे।
(लेखक रमेश शर्मा – एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)

