आर एंड डी में निवेश नहीं करने से भारी कीमत चुकाता भारत
इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई

आर एंड डी में निवेश नहीं करने से भारी कीमत चुकाता भारत

आर एंड डी के क्षेत्र में निजी क्षेत्र का लगातार अपर्याप्त निवेश अब एक गंभीर संकट का रूप ले चुका है
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हम आलोचना को आसानी से नहीं सुन पाते। कोई यदि हमारी कमियों की ओर ध्यान दिलाए अक्सर हमें बुरा लग जाता है। भले ही वह बात चाहे कितनी ही सही और जरूरी क्यों न हो। शायद यही वजह है कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने निजी क्षेत्र द्वारा रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आर एंड डी) में लगातार कम निवेश के मुद्दे पर लिखते समय काफी संयम बरता है।

एक राष्ट्रीय अखबार में प्रकाशित अपने दो लेखों में उन्होंने बताया कि भारतीय उद्योग लंबे समय से अनुसंधान और विकास में निवेश करने से बचता रहा है। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में नवाचार की गंभीर कमी पैदा हो गई है और अब यही भारतीय उद्योग के अस्तित्व के लिए चुनौती बन रही है।

नागेश्वरन ने यह समझाने की कोशिश की कि भारतीय उद्योग अनुसंधान में निवेश से क्यों बचता रहा। उन्होंने इसके पीछे ऐतिहासिक कारण गिनाए। ऐसा करते हुए कई बार ऐसा लगा मानो वह उद्योग जगत की जिम्मेदारी कुछ हल्की कर रहे हों। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि उनका उद्देश्य आर एंड डी में कमी को सही ठहराना नहीं है।

फिर भी सवाल उठता है कि जब दुनिया के दूसरे देश अभूतपूर्व गति से नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं और ऐसे नवाचार सामने ला रहे हैं जो आने वाले समय को बदल सकते हैं, तब नागेश्वरन भारतीय उद्योग की इस गंभीर विफलता के परिणामों पर उतनी सख्ती से बात क्यों नहीं करते?

यह भारत के लिए बेहद निर्णायक समय है। देश कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकता था, लेकिन उद्योग जगत ने उस संभावना का पूरा साथ नहीं दिया। एक वर्ग के रूप में भारतीय उद्योगपति जोखिम उठाने से बचते रहे हैं। उनका ध्यान लंबे समय के अनुसंधान की बजाय जल्दी मुनाफा कमाने पर ज्यादा रहा। उन्होंने भारी निवेश और अनिश्चित परिणाम वाले शोध को वित्त देने के बजाय विदेशों में पहले से विकसित तकनीकों को खरीदना ज्यादा आसान समझा। अगर उन्होंने जोखिम उठाया होता तो संभव है कि भारत भी दुनिया बदल देने वाली तकनीकी खोजों की अगली कतार में खड़ा होता।

यह भी सच है कि कई दशकों तक भारतीय उद्योग एक तरह के सुरक्षित माहौल में काम करता रहा। 1991 में आर्थिक उदारीकरण से पहले उसे ऊंचे आयात शुल्क का संरक्षण मिला हुआ था। घरेलू बाजार लगभग सुरक्षित था, इसलिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए नवाचार की जरूरत बहुत ज्यादा महसूस नहीं हुई। नागेश्वरन का यह तर्क सही है कि सरकार की इस संरक्षणवादी नीति ने उद्योगों में ऐसी सोच पैदा की, जिसका असर आज भी दिखाई देता है। यही कारण है कि जब आर एंड डी में बड़े निवेश का फैसला लेना होता है तो अधिकांश कंपनियां अब भी पीछे हट जाती हैं। लेकिन जब वह भारत की धीमी प्रगति के लिए औपनिवेशिक दौर के डी इंडस्ट्रियलाइजेशन यानी स्थानीय उद्योगों के पतन और लोकतंत्र की जटिलताओं को भी जिम्मेदार ठहराते हैं तो उनकी दलील कुछ कमजोर पड़ जाती है। अगर यही वजह होती तो फिर वियतनाम, ईरान और रवांडा जैसे देशों की सफलता को कैसे समझाया जाए? इन देशों ने युद्ध, तबाही और नरसंहार जैसी कहीं अधिक कठिन परिस्थितियों का सामना किया है।

वियतनाम ने पहले फ्रांस के खिलाफ लंबा स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और उसके बाद लगभग दो दशक तक अमेरिका जैसी महाशक्ति से युद्ध झेला। इसके बावजूद उसने औद्योगिक विकास और तकनीकी क्षमता के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की। कई अन्य लोकतांत्रिक देशों ने भी भारत की तुलना में कहीं अधिक राजनीतिक अस्थिरता और संघर्ष देखे हैं, फिर भी वे आर एंड डी और नवाचार में भारत से आगे निकल गए। क्या यह माना जाए कि लंबे समय तक मिली स्थिरता ने भारतीय उद्योग में प्रतिस्पर्धा की जरूरत को ही कम कर दिया?

दक्षिण एशिया, खासकर भारत के विशेषज्ञ माने जाने वाले फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक और समाजशास्त्री क्रिस्टोफ जाफरलो इस सवाल का अलग जवाब देते हैं। उनके अनुसार, भारत के अधिकांश उद्यमी उन व्यापारी जातियों से आए, जिनके पास औद्योगिक संस्कृति या जोखिम उठाने की परंपरा मजबूत नहीं थी। ऐसे उद्यमियों का ध्यान स्वाभाविक रूप से जल्दी लाभ और तेज वृद्धि पर रहता है, खासकर तब जब पूंजी जुटाने की लागत अधिक हो। यही वजह है कि भारतीय कंपनियां लंबे समय तक चलने वाले और अनिश्चित परिणाम वाले रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश करने से बचती रही हैं।

फोर्ब्स ध्यान दिलाता है कि देश के तीन सबसे बड़े कारोबारी समूह जिनमें टाटा, अंबानी और अडानी समूह शामिल हैं, वे सेमिकंडक्टर, पेट्रोकेमिकल, बुनियादी ढांचा और वैकल्पिक ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में हजारों करोड़ रुपए का निवेश कर रहे हैं। लेकिन तकनीकी अनुसंधान में उनका निवेश अब भी सीमित है। अपवाद के रूप में टाटा समूह की कुछ कंपनियों का उल्लेख किया जा सकता है।

यही भारत की सबसे बड़ी और सबसे असहज सच्चाई है। देश में आर एंड डी पर होने वाले कुल खर्च का केवल 36 प्रतिशत निजी उद्योग से आता है, जबकि प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में यह हिस्सा 70 प्रतिशत से भी अधिक है।

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूआईपीओ) की 2025 के अंत में जारी रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के कई देशों में आर एंड डी का अधिकांश खर्च उद्योग जगत करता है। इस मामले में इजराइल सबसे आगे है, जहां आर एंड डी का 93 प्रतिशत खर्च निजी क्षेत्र उठाता है। यह उसके अत्यधिक विकसित और उच्च आय वाले देश होने के कारण कुछ हद तक स्वाभाविक है।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाला उदाहरण वियतनाम का है। भारत की तरह यह भी निम्न मध्यम आय वाला देश है, फिर भी वहां 90.5 प्रतिशत आर एंड डी निवेश निजी क्षेत्र करता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वियतनाम की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है और वहां उद्योग को ऊंची आयात शुल्क का संरक्षण नहीं मिला हुआ है। प्रतिस्पर्धा ही वहां नवाचार की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

कुल खर्च के लिहाज से भारत की स्थिति बहुत खराब नहीं दिखती। डब्ल्यूआईपीओ के अनुसार, वर्ष 2000 में भारत ने आर एंड डी पर 20.8 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए थे। 2024 तक यह बढ़कर 75.7 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। हालांकि रिपोर्ट यह भी जोड़ती है कि यह उसका अनुमान है। इस आधार पर भारत दुनिया के आर एंड डी पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले 15 देशों में शामिल है। लेकिन असली तस्वीर तब सामने आती है, जब आर एंड डी खर्च को देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में देखा जाता है। यहां भारत 55वें स्थान पर पहुंच जाता है। देश अपने जीडीपी का केवल 0.64 प्रतिशत आर एंड डी पर खर्च करता है। 2005 से 2010 के बीच का छोटा सा दौर छोड़ दें तो यह आंकड़ा लंबे समय से लगभग यहीं अटका हुआ है।

चिंता की बात यह है कि रवांडा, मिस्र, केन्या, ट्यूनीशिया और ईरान जैसी अपेक्षाकृत छोटी अर्थव्यवस्थाएं भी इस पैमाने पर भारत से आगे हैं। यह भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

आज दुनिया के कई देशों को एहसास हो गया है कि औद्योगिक संप्रभुता के बिना आर्थिक और रणनीतिक ताकत हासिल नहीं की जा सकती। यही वजह है कि कम आय वाला देश रवांडा भी विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और आर एंड डी पर अपना खर्च बढ़ा रहा है।

भारत के लिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। नागेश्वरन अपने लेख के अंत में एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं। उनके अनुसार, किसी देश का रणनीतिक प्रभाव केवल उसकी कूटनीति से तय नहीं होता। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उद्योग जगत अपने बोर्ड रूम में कितनी दूरदृष्टि दिखाता है और आर एंड डी पर कितना खर्च करता है। साथ ही भविष्य की तकनीकी क्षमताएं विकसित करने के लिए कितना निवेश करने को तैयार है।

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