

सारांश
2019-24 के दौरान राज्य में नए और पात्र परिवारों की पहचान करने, जॉब कार्ड में सदस्यों के नाम जोड़ने या हटाने और विसंगति को ठीक करने के लिए कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया
सीएजी ने पाया कि जांच की गई सभी 40 ग्राम पंचायतों में से किसी भी ग्राम पंचायत द्वारा कोई श्रम बजट तैयार नहीं किया गया था
ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि 2019-24 के दौरान 154.31 करोड़ रुपए की मजदूरी के भुगतान में 1.44 करोड़ दिनों की देरी हुई। इस देरी के लिए लाभार्थियों को 1.03 करोड़ का रुपए मुआवजा पाने का अधिकार था
“यह योजना आजीविका सुरक्षा के मूल उद्देश्य को पूरा करने में विफल रही, जिसमें गारंटीशुदा रोजगार शामिल है। इसकी वजह काम के समय और मात्रा का सही आकलन न होना था।”
यह टिप्पणी ओडिशा में मनरेगा कार्यक्रम के सीएजी ऑडिट में गई है। हाल ही में जारी इस ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि ओडिशा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के क्रियान्वयन में भारी अनियमितताएं बरती गई हैं, जिससे यह कार्यक्रम अपने मूल मकसद को पूरा नहीं कर पाया।
कानून में पंजीकृत परिवारों को 100 दिनों के गारंटीशुदा रोजगार के प्रावधान के विपरीत ऑडिट में यह पाया गया कि वित्त वर्ष 2019-24 के दौरान केवल 6.24 से 11.26 प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया, जबकि 25.77 लाख से 44.58 लाख परिवारों ने काम की मांग की थी। जिन जिलों की जांच की गई, वहां यह आंकड़ा 0.20 से 16.18 प्रतिशत के बीच रहा।
काम की कम मांग और उसके परिणामस्वरूप रोजगार के कम अवसर पैदा होने का कारण समय पर जॉब कार्ड जारी न होना, नए परिवारों को पंजीकृत करने के लिए घर-घर जाकर सर्वे न होना, समय पर मजदूरी का भुगतान न होना, राज्य की न्यूनतम मजदूरी दर की तुलना में मनरेगा में मजदूरी की दर कम होना और साथ ही आंध्र प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों की तुलना में मनरेगा की मजदूरी दर का कम होना बताया गया। ऊपर बताए गए कारणों की पुष्टि 441 लाभार्थियों के इंटरव्यू के दौरान हुई। इनमें से 117 लाभार्थियों (27 प्रतिशत) ने कहा कि मजदूरी के भुगतान में देरी के कारण उनकी काम करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जबकि 234 लाभार्थियों (53 प्रतिशत) ने कहा कि दूसरी योजनाओं से जुड़े कामों की तुलना में मनरेगा में मजदूरी की दर कम होने के कारण वे काम करने में इच्छुक नहीं थे।
जॉब कार्ड नहीं हुए अपडेट, मृतकों को भुगतान
2019-24 के दौरान राज्य में नए और पात्र परिवारों की पहचान करने, जॉब कार्ड में सदस्यों के नाम जोड़ने या हटाने और विसंगति को ठीक करने के लिए कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया। इससे यह पता चलता है कि राज्य की ओर से इस योजना के लाभों का विस्तार करने यानी नए पात्र लाभार्थियों को शामिल करने और मौजूदा लाभार्थियों के विवरण को अपडेट करने के लिए पर्याप्त पहल नहीं की गई। जॉब कार्ड से संबंधित जानकारी को अपडेट करने के लिए ऐसे सर्वेक्षणों के अभाव में ऐसे मामले सामने आए जिनमें मृत लाभार्थियों के नाम पर भुगतान किया गया था और गलत डेटा के कारण लाभार्थियों के बैंक खातों में मजदूरी जमा नहीं हो पाई थी।
जांचे गए पांच जिलों में 2019-24 के दौरान जॉब कार्ड के लिए आवेदन करने वाले 64.26 लाख परिवारों में से 0.82 लाख परिवारों को बिना किसी दर्ज कारण के जॉब कार्ड जारी नहीं किए गए। इन परिवारों को मनरेगा के तहत रोज़गार के अवसरों से वंचित रहना पड़ा।
सीएजी ने यह भी पाया है कि श्रम बजट को ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम सभा द्वारा तैयार और अनुमोदित किया जाना था, फिर इसे पंचायत समिति को भेजा जाना था और जिला स्तर पर समेकित किया जाना था। इसके बाद इसे राज्य सरकार को प्रस्तुत किया जाना था, ताकि वह इसे आगे केंद्रीय सरकार को भेज सके।
सीएजी ने पाया कि जांच की गई सभी 40 ग्राम पंचायतों में से किसी भी ग्राम पंचायत द्वारा कोई श्रम बजट तैयार नहीं किया गया था। इसके बजाय, ग्राम सभाओं द्वारा परियोजनाओं की एक सूची तैयार की गई और उसे अनुमोदित किया गया।
नहीं मिला मुआवजा
ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि 2019-24 के दौरान 154.31 करोड़ रुपए की मजदूरी के भुगतान में 1.44 करोड़ दिनों की देरी हुई। इस देरी के लिए लाभार्थियों को 1.03 करोड़ का रुपए मुआवजा पाने का अधिकार था। हालांकि, 2019-24 के दौरान मुआवजे के तौर पर केवल 0.01 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया और शेष 1.02 करोड़ रुपए का मुआवजा प्राकृतिक आपदाओं, राज्य नोडल खाते में अपर्याप्त धनराशि आदि कारणों से अस्वीकृत कर दिया गया और उसका भुगतान नहीं किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, चूंकि उपरोक्त में से किसी भी बाधा के लिए लाभार्थी जिम्मेदार नहीं थे, इसलिए मुआवजे को अस्वीकृत करना उचित नहीं था। इसके अलावा, मुआवजे का भुगतान न होने से गारंटीशुदा रोजगार के माध्यम से आजीविका सहायता प्रदान करने की इस योजना का उद्देश्य ही विफल हो गया।