गांवों को सामुदायिक वन संसाधनों के पूरे अधिकार अब भी नहीं मिल रहे Photo: GettyImages
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बंजार के वन अधिकार: मान्यता से सामुदायिक नेतृत्व वाले वन शासन तक

सीएफआर की मान्यता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि वन प्रबंधन से सरकारी संस्थाएं पीछे हट जाएं
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हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू के उप मंडल बंजार में सामुदायिक वन संसाधन (सीएफआर) अधिकारों की मान्यता, वन अधिकार अधिनियम (एफआरए)- 2006 के क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन सामुदायिक अधिकारों इस मान्यता को प्रक्रिया का अंत नहीं माना जाना चाहिए। इसे सामुदायिक-केंद्रित वन शासन, एकीकृत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, टिकाऊ आजीविका और साक्ष्य-आधारित सार्वजनिक नीति की दिशा में एक बड़े बदलाव की शुरुआत के रूप में देखना आवश्यक है।

 समुदायों के लिए जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है। जंगल का सीधा संबंध जलस्रोतों, प्राकृतिक झरनों, चरागाहों, कृषि, पशुधन, जैव विविधता, औषधीय पौधों, गैर-काष्ठ वन उत्पादों (एनटीएफपी), सांस्कृतिक परंपराओं और स्थानीय आजीविकाओं से है। इसलिए सीएफआर अधिकारों की मान्यता तभी अपना पूरा प्रभाव पैदा कर सकती है, जब कानूनी अधिकारों को प्रभावी संस्थाओं, सहभागी योजना और पर्यावरणीय तथा आजीविका संबंधी परिणामों के नियमित आकलन से जोड़ा जाए।

 वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य वन-निर्भर समुदायों के ऐतिहासिक वंचन को दूर करना और उनके वैध अधिकारों तथा जिम्मेदारियों को मान्यता देना है। लेकिन केवल अधिकारों की कानूनी मान्यता या प्रमाण-पत्र अपने आप जंगलों को पुनर्जीवित नहीं कर सकता, जलस्रोतों को बहाल नहीं कर सकता, जंगल की आग के जोखिम को कम नहीं कर सकता या स्थानीय शासन को अधिक जवाबदेह नहीं बना सकता। इन परिणामों के लिए मान्यता के बाद निरंतर संस्थागत सहयोग आवश्यक है।

इसलिए बंजार में अगले चरण का प्रमुख फोकस सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन पर होना चाहिए। इन योजनाओं का नेतृत्व ग्राम सभा करे और संबंधित सरकारी विभाग तकनीकी सहयोग प्रदान करें। ऐसी योजनाएं केवल प्रशासनिक औपचारिकता के लिए तैयार किए गए दस्तावेज न बनें बल्कि स्थानीय संसाधनों, पर्यावरणीय जोखिमों, आजीविका की प्राथमिकताओं और संरक्षण उपायों को दिशा देने वाली जीवंत प्रबंधन व्यवस्थाएं बनें।

सहभागी संसाधन मानचित्रण के माध्यम से समुदाय जंगलों, चरागाहों, जलस्रोतों, जैव विविधता, गैर-काष्ठ वन उत्पादों तथा आग, कटाव या क्षरण से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं। स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक जानकारी के साथ जोड़कर वन की स्थिति, जल उपलब्धता और जैव विविधता में हो रहे बदलावों को समझा जा सकता है। इससे भविष्य में होने वाली प्रगति को मापने के लिए एक आधाररेखा तैयार की जा सकती है।

इस प्रक्रिया में वन विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी। सीएफआर की मान्यता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि वन प्रबंधन से सरकारी संस्थाएँ पीछे हट जाएं। इसके बजाय यह समुदाय और राज्य के बीच संबंधों को नए आधार पर स्थापित करने का अवसर होना चाहिए। मूल सिद्धांत होना चाहिए ‘समुदाय के साथ सरकार’, न कि समुदाय बनाम सरकार।

 वन विभाग के पास वानिकी, जैव विविधता, वनाग्नि प्रबंधन, जलग्रहण संरक्षण और पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन से जुड़ा तकनीकी ज्ञान है। वहीं समुदायों के पास स्थानीय भू-दृश्य, प्रजातियों, मौसमी बदलावों, चराई और संसाधनों के उपयोग का पीढ़ियों से अर्जित अनुभव है। इन दोनों प्रकार के ज्ञान को जोड़ने से केवल सरकारी या केवल स्थानीय दृष्टिकोण पर निर्भर रहने की तुलना में अधिक प्रभावी वन प्रबंधन विकसित किया जा सकता है।

 संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) के अनुभव भी इस प्रक्रिया में उपयोगी हो सकते हैं। सीएफआर और जेएफएम को एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी संस्थागत मॉडल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जहां उपयुक्त हो, दोनों की ताकतों को एक-दूसरे का पूरक बनाया जा सकता है। लक्ष्य ऐसी संस्थागत व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए जिसमें सामुदायिक अधिकार, ग्राम सभा की भूमिका, सरकारी तकनीकी विशेषज्ञता और सार्वजनिक संस्थाओं का सहयोग एक-दूसरे को मजबूत करें।

इसके लिए संस्थागत भूमिकाओं की स्पष्टता आवश्यक है। ग्राम सभा को निर्णय लेने और सामुदायिक संसाधन प्रबंधन में वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए। पंचायतें वन प्रबंधन को व्यापक स्थानीय विकास योजनाओं से जोड़ सकती हैं। वन विभाग तकनीकी सहयोग दे सकता है। जल, कृषि, पशुपालन, ग्रामीण विकास, पर्यटन और आजीविका से जुड़े विभाग स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार संसाधन और विशेषज्ञता उपलब्ध करा सकते हैं।

यह समन्वय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वन प्रबंधन को व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उदाहरण के लिए, वनों का क्षरण जलस्रोतों और झरनों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है। चरागाहों की गुणवत्ता में कमी पशुधन-आधारित आजीविका को प्रभावित कर सकती है। जैव विविधता का नुकसान पारिस्थितिकीय लचीलेपन को कम कर सकता है और अनियोजित पर्यटन संवेदनशील क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

इसलिए भागीदारी केवल बैठकों में उपस्थिति तक सीमित नहीं होनी चाहिए। समुदायों की भूमिका योजना निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही के सभी चरणों में होनी चाहिए। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी भी वास्तविक और निर्णयकारी होनी चाहिए, न कि केवल औपचारिक।

महिलाओं के पास ईंधन, चारा, जलस्रोतों, जंगली खाद्य पदार्थों, औषधीय पौधों और घरेलू स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़ा महत्वपूर्ण ज्ञान होता है। निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी वन प्रबंधन योजनाओं को अधिक प्रासंगिक और न्यायसंगत बना सकती है। युवा मोबाइल आधारित निगरानी, जीपीएस और जीआईएस मानचित्रण, जैव विविधता दस्तावेजीकरण, वनाग्नि की सूचना और डिजिटल रिपोर्टिंग जैसी नई तकनीकी क्षमताओं का उपयोग कर सकते हैं।

सीएफआर शासन को टिकाऊ आजीविका से जोड़ना भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। वन-निर्भर समुदाय गैर-काष्ठ वन उत्पादों, औषधीय पौधों, जंगली खाद्य पदार्थों, रेशों, हस्तशिल्प, पशुधन और चरागाहों से आजीविका प्राप्त कर सकते हैं। उपयुक्त क्षेत्रों में जिम्मेदार और सामुदायिक-आधारित पर्यटन भी आर्थिक अवसर पैदा कर सकता है।

लेकिन आजीविका संवर्धन को प्राकृतिक संसाधनों के अति-दोहन का नया माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। इसके लिए टिकाऊ संग्रहण के नियम, स्थानीय संसाधनों का आकलन, मूल्य संवर्धन, बाजार तक पहुँच और लाभों के न्यायसंगत बँटवारे की व्यवस्था आवश्यक होगी। आर्थिक लाभों का उद्देश्य संरक्षण को कमजोर करना नहीं बल्कि उसे मजबूत करना होना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन इस एकीकृत दृष्टिकोण को और अधिक आवश्यक बनाता है। हिमालयी क्षेत्रों में वनाग्नि, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, जल उपलब्धता में बदलाव तथा बुनियादी ढाँचे और पर्यटन का बढ़ता दबाव महत्वपूर्ण जोखिम हैं। इसलिए वन प्रबंधन को जलवायु अनुकूलन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जोड़ा जाना चाहिए।

सीएफआर प्रबंधन योजनाओं में जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और वनाग्नि की रोकथाम, क्षतिग्रस्त क्षेत्रों का पुनर्स्थापन, जलस्रोतों का संरक्षण, मिट्टी और नमी संरक्षण, जैव विविधता सुरक्षा तथा टिकाऊ चराई जैसे उपाय शामिल किए जा सकते हैं। स्थानीय समुदाय प्रारंभिक चेतावनी, रोकथाम और स्थानीय प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे पूरे वर्ष अपने भू-दृश्य के साथ जुड़े रहते हैं।

सीएफआर क्रियान्वयन की सफलता को निगरानी और मूल्यांकन के माध्यम से भी समझना होगा। पारंपरिक रिपोर्टिंग में अक्सर दावों की संख्या, आयोजित बैठकों, प्रशिक्षणों या किए गए पौधरोपण जैसी गतिविधियों पर जोर रहता है। ये संकेतक क्रियान्वयन की प्रगति बताते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे वन शासन में सुधार को प्रमाणित करें।

एक मजबूत मूल्यांकन (एमएंडई) ढांचे में परिणामों और दीर्घकालिक प्रभावों को शामिल किया जाना चाहिए। इसमें वन पुनर्जनन और वन की स्थिति, जल एवं झरनों की सुरक्षा, वनाग्नि की घटनाएँ और जोखिम, चरागाहों की गुणवत्ता, जैव विविधता, वन-आधारित टिकाऊ गतिविधियों से आय, आजीविका की लचीलापन क्षमता, निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी, ग्राम सभा की प्रभावशीलता, समुदाय-सरकार समन्वय और संसाधन संबंधी विवाद जैसे संकेतक शामिल हो सकते हैं।

इसके लिए एक आधाररेखा तैयार करना महत्वपूर्ण होगा। सहभागी पारिस्थितिकीय आकलन, आजीविका सर्वेक्षण, संसाधन मानचित्रण, प्रशासनिक आँकड़े और सामुदायिक ज्ञान मिलकर प्रारंभिक स्थिति को दर्ज कर सकते हैं। इसके बाद नियमित निगरानी से यह समझा जा सकेगा कि हस्तक्षेप वास्तव में अपेक्षित परिवर्तन ला रहे हैं या नहीं।

यह प्रक्रिया साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को भी मजबूत कर सकती है। आँकड़े केवल इसलिए एकत्र नहीं किए जाने चाहिए कि किसी कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की आवश्यकता है। साक्ष्य का उपयोग बजट, प्राथमिकताओं, संस्थागत जिम्मेदारियों और क्रियान्वयन संबंधी निर्णयों को प्रभावित करने के लिए होना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया को एक नीति चक्र के रूप में देखा जा सकता है: सामुदायिक साक्ष्य → विश्लेषण → सीख → नीतिगत सुझाव → क्रियान्वयन → निगरानी → सुधार। समुदायों को केवल आँकड़े उपलब्ध कराने वाले उत्तरदाता के रूप में नहीं, बल्कि साक्ष्य के सह-निर्माता और उसकी व्याख्या करने वाले साझेदार के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका अनुभव यह समझने में मदद कर सकता है कि कोई नीति या कार्यक्रम एक स्थान पर सफल क्यों होता है और दूसरे स्थान पर अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं देता।

सीएफआर शासन में सामाजिक जवाबदेही भी महत्वपूर्ण आधार होनी चाहिए। संसाधन प्रबंधन योजनाओं, व्यय, निर्णयों और निगरानी के परिणामों को समुदायों के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। नियमित सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक समीक्षा से पारदर्शिता बढ़ सकती है और योजनाओं तथा उनके क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर को पहचाना जा सकता है।

बंजार हिमाचल प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सीखने का क्षेत्र बन सकता है। इसे तुरंत एक सफल मॉडल घोषित करने के बजाय राज्य पाँच या दस वर्षों की अवधि में यह अध्ययन कर सकता है कि सीएफआर की मान्यता के बाद वास्तव में क्या परिवर्तन होते हैं। इससे वन, जल सुरक्षा, जलवायु लचीलापन, ग्रामीण आजीविका और स्थानीय शासन से संबंधित व्यापक नीतियों के लिए उपयोगी सीख विकसित की जा सकती है।

ऐसे दीर्घकालिक सीखने के ढाँचे में सामुदायिक निगरानी, सरकारी आँकड़े, पारिस्थितिकीय आकलन, आजीविका अध्ययन और समय-समय पर स्वतंत्र मूल्यांकन को शामिल किया जा सकता है। लक्ष्य केवल यह साबित करना नहीं होना चाहिए कि सीएफआर अधिकारों को मान्यता मिल गई है बल्कि यह समझना होना चाहिए कि इन अधिकारों से पारिस्थितिक संरक्षण, आजीविका और स्थानीय संस्थाओं की जवाबदेही में क्या बदलाव आया।

इस प्रकार सीएफआर को केवल वन अधिकारों की संकीर्ण अवधारणा तक सीमित रखने के बजाय इसे प्राकृतिक संसाधनों के लोकतांत्रिक शासन को मजबूत करने के मंच के रूप में देखा जा सकता है। इसमें कानूनी अधिकार, सामुदायिक संस्थाएं, सरकारी तकनीकी क्षमता, स्थानीय विकास योजना, टिकाऊ आजीविका और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं।

बंजार के सामने अब केवल यह प्रश्न नहीं है कि समुदायों को अधिकारों की मान्यता मिली या नहीं। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह मान्यता आने वाले वर्षों में समुदायों को क्या हासिल करने में सक्षम बनाती है। यदि सीएफआर की मान्यता के बाद सहभागी योजना, प्रभावी संस्थागत समन्वय, तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग, टिकाऊ आजीविका के अवसर, पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन और परिणाम-आधारित निगरानी विकसित होती है, तो यह समुदाय-केंद्रित विकास का एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकता है।

सफलता का वास्तविक प्रमाण केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आँकड़ों में नहीं, बल्कि स्वस्थ वनों, अधिक सुरक्षित जलस्रोतों, लचीली आजीविकाओं, मजबूत ग्राम सभाओं, महिलाओं और युवाओं की सार्थक भागीदारी, कम होते पर्यावरणीय जोखिमों और समुदाय तथा सार्वजनिक संस्थाओं के बीच बेहतर संबंधों में दिखाई देना चाहिए। अधिकारों का प्रमाण-पत्र प्रक्रिया की शुरुआत हो सकता है, लेकिन वन अधिकारों की वास्तविक परीक्षा और उनका वास्तविक प्रभाव मान्यता के बाद शुरू होता है।

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