

औपनिवेशिक दौर से शुरू हुआ वनों का दोहन और संरक्षण के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन आज भी नए रूपों में जारी है।
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के उदाहरण दिखाते हैं कि ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन अधिकार और ट्रांजिट परमिट जैसे कानूनी अधिकार मिलने के बाद भी तेंदू, महुआ और अन्य लघु वनोपज के व्यापार, मूल्य निर्धारण और मूल्य संवर्धन पर असली नियंत्रण अब भी बाजार और निजी खिलाड़ियों के हाथ में है।
वन अधिकार कानून के बावजूद टाइगर रिजर्व, संरक्षित क्षेत्र, कार्बन क्रेडिट और हरित ऊर्जा नीतियां समुदायों को बेदखली, अपारदर्शी बाजार, बिचौलियों और कमजोर सरकारी सहयोग के बीच असुरक्षित छोड़ रही हैं।
क्या होता है जब तेंदू के पत्ते और बांस गांव से बाजार तक पहुंचते हैं? जब महुआ, जिससे आदिवासी समुदायों के शोषण का पीढ़ियों पुराना इतिहास जुड़ा है, के प्रति शहरी वर्ग की रुचि बढ़ने लगती है? या जब छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों के पारंपरिक खाने का हिस्सा रहे चरोटा साग के बीजों के औद्योगिक और औषधीय उपयोग खोज लिए जाते हैं?
वन पर निर्भर समुदायों और ग्रामीण समाज के जीवन में वनों की सिर्फ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि आजीविका के एक प्रमुख स्रोत के तौर पर भी काफी अहमियत रही है। हर साल देशभर में ये समुदाय लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के लघु या गैर-काष्ठ वनोत्पादों जैसे शहद, गोंद (रेजिन) और औषधीय जड़ी-बूटियों आदि का संग्रहण करते हैं।
हालांकि, समुदायों और सामुदायिक संसाधनों (कॉमन्स) के बीच का यह संबंध अब तेजी से बदल रहा है। जंगलों पर बढ़ते दबाव के साथ यह बदलाव केवल वस्तुओं की शृंखला (कमोडिटी चेन) के विस्तार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जलवायु परिवर्तन रोकने में जंगलों की भूमिका, कार्बन क्रेडिट के बढ़ते बाजार, ताप संयंत्रों (थर्मल प्लांट्स) की स्थापना और हरित ऊर्जा की तरफ बढ़ने (ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन) जैसी प्रक्रियाएं भी इसमें शामिल हो गई हैं। लगातार गहराते पर्यावरण संकट से निपटने के नाम पर तैयार की गई इन सभी नीतियों का जमीन पर गहरा असर पड़ा है।
यह सब प्रकृति के उस बाजारीकरण की तरफ इशारा करता है, जहां भले ही लकड़ियों से भरे ट्रक न दिखाई दें, लेकिन स्थानीय समुदायों और पारिस्थितिकी पर उसका असर उतना ही गंभीर होता है।
ऐसे में सवाल यह नहीं है कि समुदाय इन आर्थिक व्यवस्थाओं का हिस्सा बनते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वे इनमें शामिल होकर अपने अधिकार और आजीविका सुरक्षित कर पाएंगे, या फिर वे पहले से भी अधिक असुरक्षित हो जाएंगे?
वनों से गहरे संबंधों के बावजूद, वन आश्रित समुदायों की उन्हें प्रबंधित और संचालित करने की क्षमता, ऐतिहासिक रूप से राज्य और बाज़ार जैसी बाहरी शक्तियों द्वारा नियंत्रित होती रही है।
औपनिवेशिक काल से लेकर आज़ादी के बाद तक, वनों से कच्चे माल का दोहन और उसका व्यवसायीकरण तथा संरक्षण के नाम पर जंगलों से आदिवासी समुदायों को बेदखल किया जाना साथ-साथ चलते चले आ रहे हैं। संरक्षण के नाम पर यह एक बड़ा विरोधाभास है।
बीसवीं सदी के अंत तक ग्रामीण स्तर पर विकेंद्रीकरण के प्रयासों के रूप में कुछ बड़े बदलाव देखने को मिले और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में वन अधिकार कानून (एफआरए) अस्तित्व में आया। इसके बाद भले ही समुदायों के पारंपरिक अधिकारों और उनके द्वारा वन उत्पादों के संग्रहण व प्रबंधन को कानूनी मान्यता मिली, लेकिन अफसरशाही द्वारा कानून के प्रावधानों को कमजोर किया जाना इसके क्रियान्वयन में एक बड़ी चुनौती बनी रही। साथ ही, संरक्षित वन क्षेत्रों के विस्तार की वजह से समुदाय अपने पारंपरिक क्षेत्रों और आजीविका से बेदखल होने के संकट का सामना अभी भी कर रहे हैं।
साल 2002 में छत्तीसगढ़ के (तत्कालीन) उदंती सीतानदी वन अभयारण्य (अब उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व) में वन विभाग ने स्थानीय लोगों द्वारा तेंदू और सियाली के पत्तों जैसे वनोत्पादों के संग्रहण पर रोक लगा दी थी। अभयारण्य के कोर क्षेत्र में धमतरी जिले के 34 और गरियाबंद के 17 गांव आते थे।
जब आधिकारिक रूप से वन अभयारण्य को टाइगर रिजर्व में बदलने की आधिकारिक चर्चाएं हो रही थी तो स्थानीय समुदायों को विस्थापित होने के लिए मुआवजे की पेशकश की गयी थी। हालांकि उन्होने इसे अस्वीकार कर दिया और 2006 के वन अधिकार कानून में वर्णित अधिकारों सहित उनके सभी अधिकार तय किए जाने की मांग की। टाइगर रिज़र्व को 2009 में अधिसूचित किया गया था, और तब से ही लोग मनमानी बेदखली और अपने अधिकारों के हनन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।
इस बारे में धमतरी और गरियाबंद में समुदायों के साथ पिछले 25 सालों से कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता और खोज संस्था के संस्थापक बेनीपुरी गोस्वामी बताते हैं, “हमने 2009 में धमतरी और गरियाबंद में समुदायों के साथ काम शुरू किया था, ताकि वे वन अधिकार कानून के तहत अपने अधिकार हासिल कर सकें। साल 2013 तक व्यक्तिगत वन अधिकार और निस्तार (धारा 3 (1) (ख) के तहत) जैसे कुछ अधिकार ही हासिल किए जा सके।”
2018 से अब तक खोज संस्था ने टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में आने वाली ग्राम सभाओं सहित 100 से भी अधिक ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन अधिकार हासिल करने में सहयोग दिया है।
बेनीपुरी आगे बताते हैं, “हमने ग्राम सभाओं के साथ मिलकर वन क्षेत्रों की पहचान की, जिन्हें बाद में वन खंडों में विभाजित किया गया। इसके बाद प्रत्येक खंड में प्रति हेक्टेयर वनस्पति का घनत्व और प्रजातीय विविधता का आकलन किया गया। यह सभी जानकारी अब ग्राम सभाओं के पास मौजूद है।”
इसके आधार पर ग्राम सभाओं ने यह तय किया कि किन खंडों में चराई होगी, किनसे वन उत्पाद लिए जाएंगे और कौन से खंड 3–5 वर्षों के लिए पुनरुत्पादन हेतु छोड़े जाएंगे। इन नियमों के बनने के बाद डीएफओ (डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर) और ग्राम सभाओं के बीच सहमति बनी और 22 वर्षों की पाबंदी के बाद लोगों को फिर से तेंदू पत्ते के संग्रहण का अधिकार मिल पाया।
हालांकि, इन वन उत्पादों की बिक्री अभी भी ग्राम सभाओं के माध्यम से नहीं हो रही है। लोग वनोत्पादों का संग्रहण तो व्यक्तिगत स्तर पर करते हैं, पर उन्हें साल बीज और तेंदू पत्तों की बिक्री वन विभाग को करनी पड़ती है। दूसरी ओर, महुआ सहित अन्य लघु या गैर-काष्ठ वनोत्पाद खुले बाजार में बिचौलियों और ठेकेदारों को बेचे जाते हैं।
यहीं एक महत्वपूर्ण फर्क नजर आता है। देश के कुछ हिस्सों में समुदायों ने अपने वन अधिकारों पर सफलतापूर्वक दावा तो किया है, लेकिन लघु वनोपज के बाज़ार, जो अक्सर अपारदर्शी होते हैं, में व्यापार और मूल्य-निर्धारण से जुड़े निर्णयों में अब भी उनकी कोई भूमिका नहीं है।
भारत में वनोत्पादों का संग्रहण, विपणन और बिक्री ऐतिहासिक रूप से केंद्रीकृत रही है, जिसके कारण इससे आने वाला राजस्व मुख्य रूप से वन विभाग और राजस्व विभागों के पास ही जाता रहा है। वन अधिकार कानून आने के बाद ग्राम सभाओं को वनों के प्रबंधन और प्रशासन में भूमिका मिलने से उन्हें लघु वनोपज के संग्रहण और बिक्री की निगरानी का अवसर मिला।
बीते वर्षों में कुछ राज्य सरकारों ने अलग-अलग स्तरों पर गैर-काष्ठ वनोत्पादों के विनियमन में ढील दी है। उदाहरण के लिए, ओडिशा में तेंदू पत्ते के व्यापार पर लगी पाबंदियां केवल कुछ विशेष जिलों या विकासखंडों में ही हटाई गई। इसलिए जहां पाबंदियां नहीं हटी हैं वहां के ग्रामीण समुदाय इसके लिए लंबे समय से संघर्षरत हैं।
इसके बावजूद, जब भी समुदाय सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से लघु वनोपज को बेचने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें एक अनियंत्रित और असंतुलित बाज़ार का सामना करना पड़ता है।
वृत्ति, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है और छोटे और सीमांत उत्पादकों के साथ आजीविका सहयोग पर काम करती है के मुख्य मार्गदर्शक रघुनाथन नारायणन बताते हैं, “लघु वन उपज के बाज़ार समुदायों को विभिन्न प्रकार की कमजोरियों के जटिल जाल में फंसा देते हैं। पहला, पर्यावरण और मौसम से जुड़ी अनिश्चितता। वन उपज पूर्णतया जलवायु पर निर्भर होती है, ऐसे में खरीदारों को एक तय मात्रा उपलब्ध कराने का भरोसा देना संभव नहीं होता है। दूसरा है सूचना में असमानता, लोगों को बाज़ार की कीमतों की जानकारी अक्सर तभी मिलती है जब व्यापारी उन्हें बताते हैं, जिससे वे बराबरी की शर्तें तय नहीं कर पाते और उनके पास अन्य विकल्प भी नहीं होते हैं। तीसरा, कार्यशील पूंजी तक पहुंच, वन उत्पादों के प्रसंस्करण और भंडारण के लिए समुदायों को तुरंत पूंजी चाहिए होती है, लेकिन उनके पास ऐसा कोई कोलैटरल (बैंक के ऋण देने का आधार) नहीं होता जिसे बैंक स्वीकार करें। और चौथा, अनौपचारिक बाज़ारों के नेटवर्क पर पूरी तरह से निजी व्यापारियों का नियंत्रण होता है, जिन्होंने दशकों में इन्हें बनाया होता हैं। समुदाय संरचनात्मक असमानता के साथ ऐसे बाज़ार में प्रवेश कर रहे होते हैं।”
समय के साथ बाज़ार का विस्तार होने के साथ, समुदायों को लगातार अधिक जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
कृषि उत्पादों की तुलना में वन उत्पादों के व्यापार को सरकार से मिलने वाला सहयोग बहुत कमजोर रहा है।
महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए विदर्भ नेचर कंजर्वेशन सोसाइटी (वीएनसीएस) के निदेशक दिलीप गोडे बताते हैं, “पहले महाराष्ट्र में तेंदू और बांस जैसे वन उत्पाद सरकार के नियंत्रण में थे। जंगलों में उगने वाले बांस की कटाई वन विभाग द्वारा की जाती थी, जिसे या तो नीलाम किया जाता था या सरकार द्वारा तय दामों पर पेपर मिलों को बेचा जाता था। इसी तरह तेंदू पर भी सरकार का नियंत्रण था।”
जो रॉयल्टी, कर और मुनाफा पहले वन या राजस्व विभाग के पास जाता था, वह अब लोगों के पास वापस आ गया है।
वे आगे कहते हैं, “हालांकि राज्य का जनजातीय विकास विभाग आंवला, हर्रा, बेहड़ा और चिरौंजी जैसे लघु वनोपज स्थानीय आदिवासी समुदायों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदता था, लेकिन इनके खरीद केंद्र 20-25 किलोमीटर दूर होते थे और भुगतान में भी देरी होती थी। वहीं व्यापारी सीधे गांवों या आसपास के बाजारों और साप्ताहिक हाटों में यह उपज एमएसपी से कम दामों पर खरीद लेते थे। समुदायों के लिए यह मजबूरी में की गई बिक्री होती थी।”
बीते वर्षों में महाराष्ट्र में समुदायों द्वारा वन अधिकार अधिनियम के तहत सामुदायिक वन अधिकार हासिल करने और वन उत्पादों के व्यापार पर नियंत्रण पाने के लिए लगातार संघर्ष हुए हैं। वीएनसीएस ने छह जिलों में नौ महासंघों में संगठित 275 ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन अधिकार पत्र प्राप्त करने और बांस तथा तेंदू जैसे उत्पादों की बिक्री की प्रक्रिया के संचालन में सहयोग दिया है। यह प्रक्रिया 2013 में तब शुरू हुई जब गोंदिया और गढ़चिरौली के 12 गांवों को अधिकार पत्र मिलने के बाद उन्होंने एक महासंघ बनाकर तेंदू पत्तों के प्रबंधन की व्यवस्था शुरू की।
वन अधिकार कानून लागू होने के कई वर्षों बाद साल 2014 में महाराष्ट्र में वन उत्पादों को विनियमन से मुक्त किया गया, जिससे ग्राम सभाओं को वन विभाग द्वारा संचालित संग्रहण और बिक्री की प्रक्रिया से बाहर निकलने की अनुमति मिली। 2021 में आदिवासी समुदायों के लिए महुआ के फूलों के संग्रहण, बिक्री और परिवहन पर लगी पाबंदियां भी हटा दी गईं।
इसके बावजूद हाल ही में सन 2025 में राज्य सरकार ने औपचारिक रूप से ग्राम सभाओं को लघु वनोपज के लिए ट्रांजिट परमिट जारी करने के अधिकार को मान्यता दी है। हालांकि वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) और पेसा के तहत ये अधिकार पहले से ही समुदायों को प्राप्त थे, लेकिन कई राज्यों में वन और राजस्व विभाग इन्हें नियंत्रित करते रहे हैं। दिलीप बताते हैं कि हालांकि यह प्रस्ताव पिछले साल ही आया था, लेकिन कुछ क्षेत्रों में ग्राम सभाएं सफलतापूर्वक ट्रांजिट परमिट प्राप्त करने में सक्षम रही हैं, जिनमें गोंदिया का धमाडीटोला गांव भी शामिल है, जो 2013 में देश में पहला ऐसा गांव बना।
रघुनाथन कहते हैं कि एक अन्य मुद्दा कच्चे वन उत्पादों को अर्ध-निर्मित या तैयार उत्पादों में कैसे बदला जाए। इसे समझाते हुए वह जोड़ते हैं, “मान लीजिये कि समुदाय जो कच्चा माल इकट्ठा करते हैं, उसे 10 रुपये प्रति किलो में बेच देते हैं, और फिर देखते हैं कि निजी व्यवसायी उसका प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) करके 200 रुपये प्रति किलो में बिकने वाला तैयार उत्पाद बना लेते हैं। यह 190 रुपये का अंतर ही वह असली मूल्य है जो समुदाय की पहुंच के बाहर ही रह जाता है। मूल्य संवर्धन केवल प्रोसेसिंग भर नहीं है; यह शक्ति का सवाल भी है। जब समुदाय समस्त वैल्यू चेन यानि जंगल से मिलने वाले कच्चे माल से लेकर तैयार उत्पाद तक पूरी श्रृंखला पर नियंत्रण रखते हैं, तो वे कीमत, गुणवत्ता मानकों और खरीदारों के साथ संबंधों पर भी नियंत्रण रख पाते हैं। यही उन्हें, जो दाम मिल जाए उसे स्वीकार करने वालों से, दाम तय करने वालों में बदलता है। लेकिन इसके लिए सिर्फ प्रोसेसिंग की आधारभूत संरचना ही नहीं, बल्कि पूरी आर्थिक व्यवस्था पर समुदायों का स्वामित्व भी जरूरी है।
हाल के वर्षों में इस दिशा में कुछ नीतिगत प्रयास भी हुए हैं। 2018 की प्रधानमंत्री वन धन योजना के तहत वन धन विकास केंद्र (वीडीवीके) स्थापित किए गए हैं, जो खरीद और मूल्य संवर्धन दोनों का काम कर रहे हैं । ये केंद्र स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) द्वारा संचालित किए जाते हैं।
हालांकि, इसकी भी अपनी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों के बारे में ओडिशा के कालाहांडी जिले में 100 से अधिक ग्राम सभाओं के महासंघ कालाहांडी ग्राम सभा महासंघ (केजीएसएम) के अध्यक्ष ब्यासदेब माझी कहते हैं, “ये वीडीवी केंद्र केवल एसएचजी के साथ व्यापार करते हैं। ऐसे में जब कोई ग्राम सभा इन केन्द्रों के पास जाएगी तब क्या होगा? ग्राम सभाओं के पास वन अधिकार कानून और पेसा के तहत संस्थागत स्वायत्तता और स्पष्ट अधिकार हैं। यदि ग्राम सभाओं को एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन) यानी एक कंपनी की तरह माना जाएगा, तो उनकी स्वायत्तता और स्वामित्व का क्या होगा?”
रघुनाथन कहते हैं, “समुदाय स्तर पर मूल्य संवर्धन के लिए एक साथ दो चीज़ों की जरूरत होती है: पूंजी और स्वामित्व संरचना। पूंजी के स्तर पर प्रोसेसिंग अवसंरचना के लिए प्रति क्लस्टर 30–50 करोड़ रुपये की जरूरत होती है। यह धन सरकारी योजनाओं में मौजूद है, लेकिन इसे आवश्यक निवेश के अनुरूप ढालने की जरूरत है।”
वे आगे जोड़ते हैं, “समुदायों के स्वामित्व वाला हिस्सा अधिक कठिन है: अगर एक व्यक्ति या परिवार का प्रोसेसिंग यूनिट पर नियंत्रण रहता है, तो समुदाय के भीतर ही बिचौलिये की समस्या को दोबारा पैदा हो जाती है। इसलिए हमें ऐसे तरीकों की जरूरत है जिनसे ग्राम सभाएं या उत्पादक समूहों के संघ, कानूनी मालिक और संचालक बनने में सक्षम बन पाएं। किसी ऐसी एक साल बीज प्रोसेसिंग यूनिट की कल्पना करिए, जहां बीज इकट्ठा करने वाली 500 महिलाएं ही उस यूनिट में हिस्सेदार हों, जहाँ मुनाफा संग्रह की मात्रा के आधार पर और निश्चित लाभांश के साथ बांटा जाए, और जहां का प्रशासन नियमित सामुदायिक बैठकों से हो। यही वह मॉडल है जो मूल्य को स्रोत पर बनाए रखता है, सिर्फ अवसंरचना नहीं, बल्कि वास्तविक सामूहिक स्वामित्व वाली अवसंरचना।”
जहां एक तरफ समुदायों को बाजारों में समान रूप से भागीदारी करने में सक्षम बनाने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करना जरूरी है, वहीं यह तय करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वन और प्रकृति, बाजार की ताकतों के अधीन न हो जाएं।
यह सामुदायिक संसाधनों या कॉमन्स के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो पर्यावरण की दृष्टि से लघु वनोपज से कहीं अधिक व्यापक हैं। जल और जलवायु का विनियमन, मिट्टी की उर्वरता में सुधार और जैव विविधता का संरक्षण जैसे कार्यों को वस्तु में बदलना न तो संभव है और न ही यह उचित है।
यहीं पर सामुदायिक शासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह केवल बिक्री की शर्तों, बाजार की संरचना, या एसएचजी या एफपीओ के व्यापार करने भर का मसला नहीं है, बल्कि ग्राम सभाओं को प्रदत्त उस व्यापक अधिकार का सवाल है, जिसके तहत ग्राम सभाएं अपनी आजीविका और पर्यावरण के संरक्षण को साथ लेकर चलती हैं। जब तक स्थानीय शासन मजबूत नहीं होगा, तब तक सामुदायिक संसाधन (कॉमन्स) और उनसे जुड़े जटिल पारिस्थितिकी तंत्र के जरूरत से ज़्यादा दोहन और उनके क्षरण के खतरे बने रहेंगे।
ओडिशा, महाराष्ट्र और राजस्थान सहित देश भर के समुदायों ने यह दिखाया है कि सामुदायिक संसाधनों के प्रशासन के सिद्धांत बराबरी पर आधारित व्यापार और वन संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन दोनों को दिशा कैसे दे सकते हैं। सामूहिक जुड़ाव, नियमों के निर्धारण और निगरानी के द्वारा सामुदायिक वन क्षेत्रों के प्रशासन और वन उत्पादों के व्यापार के लिए वे अपनी व्यवस्थाएं बना रहे हैं।
ओडिशा के कालाहांडी जिले में केजीएसएम ने तेंदू पत्ते और बांस के संग्रहण और व्यापार के लिए ग्राम सभाओं को संगठित किया है। हालांकि समझौते ग्राम सभाओं और व्यापारियों के बीच होते हैं, लेकिन केजीएसएम यह तय करता है कि व्यापार की शर्तें और कीमतें न्यायसंगत हों। वर्तमान में 20 गाँव बांस और 120 गाँव तेंदू पत्ते का व्यापार कर रहे हैं।
“बांस के एक गुच्छे को परिपक्व होने में 3 से 4 साल लगते हैं। ग्राम सभा यह प्रबंधन योजना बनाती है कि किस वर्ष कौन-सा गुच्छा काटा जाएगा। पहले ये योजनाएं हाथ से बने नक्शों के आधार पर बनती थीं, अब हम जीआईएस मैपिंग का उपयोग करते हैं,” ब्यासदेब बताते हैं।
इन ग्राम सभाओं ने ट्रांजिट परमिट जारी करने के अधिकार भी हासिल किए हैं। इसके तहत कटाई के बाद उत्पाद को ट्रकों में लाद कर भंडारण केंद्र तक ले जाया जाता है।
जब व्यापारी भुगतान करते हैं, तो आय के बंटवारे का निर्णय ग्राम सभाओं और महासंघ द्वारा लिया जाता है। इसमें संग्राहकों की मजदूरी, बांस के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए फंड, और गांव के विकास के लिए एक हिस्सा शामिल होता है।
“जो रॉयल्टी, कर और मुनाफा पहले वन या राजस्व विभाग के पास जाता था, वह अब लोगों के पास वापस आ गया है। केजीएसएम ने जो एक और महत्वपूर्ण प्रणाली स्थापित की है, वह है सामूहिकता या बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था,” ब्यासदेब कहते हैं।
वे आगे कहते हैं, “यदि ग्राम सभाएं सामूहिक रूप से काम करती हैं, तो वे बड़े पैमाने पर व्यापार कर सकती हैं, जिससे बड़े व्यापारी आते हैं और मुनाफा भी अधिक होता है।”
इस मॉडल ने समुदायों को यह नियंत्रण भी दिया है कि वे किसके साथ व्यापार करेंगे। उदाहरण के लिए, ग्राम सभाओं ने कागज उद्योग को बांस बेचने पर रोक लगाई है, ताकि बांस के जरूरत से ज़्यादा दोहन से बचा जा सके।
जब समुदाय सामूहिक रूप से वनों का प्रशासन करते हैं, तो संरक्षण कोई अलग काम नहीं होता, वह नियमों में ही समाहित होता है। इस बारे में बेनीपुरी कहते हैं, “वन पर निर्भर समुदाय हमेशा वन उत्पादों को आजीविका या जीवन-निर्वाह का स्रोत मानते रहे हैं, लेकिन अब इन्हें बाजार की वस्तु बनाया जा रहा है। वन विभाग ने यही किया है। उन्होंने 10-20 साल की विस्तृत योजनाएं बनाई हैं, जिनमें पहले पेड़ों की छंटाई की जाती है फिर उन्हें काटा जाता है और फिर उन्हें बाजार में बेच दिया जाता है। बिलकुल वैसे ही जैसे बाजार के लिए सब्जियाँ उगाई और बेची जाती हैं। लेकिन इस तरह वन संरक्षित नहीं रह पाएंगे।”
वह इस पर आगे कहते हैं, “जंगल जितना दे सकता है, उससे उतना ही लेना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा, तो यह चाहे ग्राम सभा करे या वन विभाग, जंगलों का विनाश होना तय है। बहुत से ग्रामीण और वन पर निर्भर समुदायों के लिए जंगल कभी भी आय का मुख्य स्रोत नहीं रहे हैं, बल्कि ये उनकी जीवनशैली का हिस्सा रहे हैं।”
इसके लिए यह जरूरी है कि मौजूदा नीतियों पर पुनर्विचार किया जाए, जिसमें ग्रामीण समुदायों की आजीविका की विविधता को ध्यान में रखा जाए और जमीनी स्तर की विकास योजनाओं में पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को केंद्र में रखा जाए।
इसी मुद्दे पर दिलीप कहते हैं, “बांस और तेंदू की बिक्री से जो पैसा आता है, वह लोगों के ही पास जाता है। ग्राम सभाएं इसका केवल 5 प्रतिशत ही अपने पास रखती हैं, जिसका इस्तेमाल ग्राम सभा के प्रबंधन और विकास से जुड़े कामों, जैसे स्कूल के लिए कंप्यूटर खरीदने या तालाबों की गाद हटाने और उन्हें गहरा करने आदि में किया जाता है। तालाबों पर हुए काम से मिट्टी की नमी बढ़ी है और खेती को फायदा मिला है, जिससे अब लोग साल में दूसरी फसल भी उगा पा रहे हैं। परिवार के स्तर पर, इसका अर्थ यह भी है कि बच्चों की शिक्षा या घरों की मरम्मत के लिए लोगों के पास पैसा उपलब्ध होता है।”
वे आगे कहते हैं, “जब ग्राम सभाएं मजबूत हो जाती हैं, तो फिर यह सवाल आता है कि विकास का स्वरूप कैसा हो। पारिस्थितिक सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। यदि जंगलों को नुकसान होगा तो भूजल भी घटेगा। ऐसे में खेती के लिए पानी कहां से आएगा? पर्यावरण के सभी घटक आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन हम उन्हें अलग-अलग देखते हैं। वन, जल, मछली, सबके अलग विभाग हैं। इन्हें इस तरह अलग-अलग देखे जाने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ही बिखर जाता है। इसलिए हमें एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा। जिन गांवों के साथ हम काम कर रहे हैं, उन्होंने जंगल, पानी और खेती के साझा प्रबंधन से इसके मजबूत उदाहरण स्थापित किए हैं। उनका विश्वास है कि अगर उनके जंगल बचेंगे, तो ही लोग भी बच पाएंगे।”
अंततः, बाजार की बात करें तो अगर उन्हें साझा वन संसाधनों या फॉरेस्ट कॉमन्स के साथ जुड़ना है, तो उन्हें पहले से मौजूद सामुदायिक शासन प्रणालियों को बदलकर नहीं, बल्कि उनके अनुसार ही काम करना होगा।
श्रेया अधिकारी और सृष्टि गुप्ता ने इस लेख में योगदान दिया है। यह लेख इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू (आईडीआर, हिंदी) से लिया गया है, जो एक स्वतंत्र मीडिया प्लेटफार्म है। ऑरीजनल लेख यहां क्लिक करके पढ़ें।