

मध्य प्रदेश के डिंडोरी वनमंडल में साल के जंगलों में लगे साल बोरर कीट को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग ने बरसात के मौसम में ट्रैप ट्री विधि से स्थानीय लोगों की मदद से करीब 20 लाख कीड़े पकड़े और करीब 40 लाख रुपए व्यय किए, लेकिन फिर भी साल के वनों में कीट का प्रकोप कम नहीं हुआ है।
डिंडोरी वनमंडल में पिछले साल 30 हजार हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र साल बोरर से प्रभावित हुआ था और जिन पेड़ों पर कीट लगा था, मौजूदा समय में उनकी कटाई जारी है। करीब 1.5 लाख चिन्हित पेड़ों में से एक तिहाई पेड़ों की कटाई हो चुकी है। इन पेड़ों की कटाई से पहले वन विभाग ने 6,769 अप्रभावित पेड़ों को ट्रैप ट्री विधि के लिए काटा था और कीड़ों को पकड़ने के लिए मुहिम चलाई थी। वन विभाग के अनुसार, 1 जून से 31 जुलाई तक ट्रैप ट्री चला। स्थानीय लोगों का कहना है कि कीड़ों की संख्या कम होने पर वन विभाग ने ट्रैप ट्री विधि से कीड़े पकड़वाना बंद कर दिया। अगर कीड़े पकड़ने का काम लंबे समय तक चलता को इतना प्रकोप नहीं होता।
वनमंडल में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल चौड़ादादर और सोनतीरथ गांव के ज्यादातर ग्रामीणों का कहना था कि कीड़े पकड़ने का काम (ट्रैप ट्री) समय पर शुरू तो हो गया लेकिन उसे बंद करने में जल्दबाजी की गई, शायद इसी वजह से बड़ी संख्या में साल के पेड़ फिर से कीटों से प्रभावित पाए गए हैं। खुद वन विभाग के अधिकारी इसकी पुष्टि कर रहे हैं। डिंडोरी वनमंडल के एसडीओ सुरेंद्र जाटव ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इस वर्ष प्रकोप काफी ज्यादा है। वह बताते हैं कि आमतौर पर महामारी की स्थिति में दूसरे वर्ष साल बोरर का प्रकोप अधिक देखा जाता है।
और कहां हुई चूक
डिंडोरी वनमंडल के वर्किंग प्लान (कार्य आयोजना) में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि साल वनों में पातन (कटाई) का कार्य जून से पहले हो जाना चाहिए। यह कार्य वर्षा ऋतु में नहीं किया जाए क्योंकि इस दौरान कटाई की जाती है तो इससे इन वृक्षों पर कीड़े आकर्षित होंगे और कीड़ों के प्रजनन में सहायता मिलेगी। वर्किंग प्लान के निर्देश के उलट साल के पेड़ों की मौजूदा कटाई बरसात के मौसम सितंबर में शुरू की गई। जानकार इसे चूक के तौर पर देखते हैं। हालांकि इसकी अहम वजह पेड़ों की कटाई की केंद्र सरकार की अनुमति में देरी बताई जा रही है।
कीट विशेषज्ञों के अनुसार, बरसात में साल बोरर प्रभावित पेड़ों की कटाई का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि इससे कीटों का प्रसार रोकने का मकसद पूरा नहीं होता। उनका कहना है कि मॉनसून से पहले कटाई होने पर प्रभावित पेड़ों पर मौजूद कीट जंगल से दूर चला जाता है और नए पेड़ों को संक्रमित नहीं कर पाता लेकिन ऐसा न होने पर कीट जंगल में बना रहता है और नए पेड़ों पर प्रवेश कर अंडे दे देता है। एक गलती यह भी हुई है कि सितंबर-अक्टूबर में जिन पेड़ों की कटाई हुई, वे जंगल में जगह-जगह पड़े हैं। ऐसे पेड़ों के जंगल से दूर बनाए गए अस्थायी डिपो में तत्काल नहीं पहुंचा गया।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय सशक्त समिति ने 1 सितंबर को पेड़ों को कटाने की मंजूरी थी, जिसके कुछ दिनों बाद ही पेड़ों की कटाई शुरू हो गई। मध्य प्रदेश के वन विभाग ने 24 जून को साल बोरर प्रभावित पेड़ों की कटाई के लिए प्रस्ताव भेजा था। समिति ने साल बोरर के प्रसार को रोकने के लिए डिंडोरी में 1,46,784 और अनूपपुर जिले में 9,535 पेड़ों को काटने की अनुमति दी। वन विभाग ने समिति को बताया था कि मृत और संक्रमित पेड़ों को हटाने से स्वस्थ पेड़ों को और अधिक संक्रमण से बचाने में मदद मिलेगी और यह वनों के स्वास्थ्य तथा जैव विविधता के दीर्घकालिक संरक्षण में योगदान देगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रभावित पेड़ों को काटने की टाइमिंग सही थी? और क्या उन्हें इस वक्त काटना वाकई जरूरी था? जबलपुर स्थिति राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) में कीट विशेषज्ञ (एंटोमॉलोजिस्ट) और साल बोरर के फैलाव पर लगातार नजर रखने वाले उदय होमकर का कहना है कि अभी भी कई पेड़ कटे हुए पड़े हैं और कुछ की कटाई बाकी है। उनमें से कीट निकल चुके हैं। इससे कटाई का उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पा रहा है। उनका कहना है कि सभी प्रभावित पेड़ों की कटाई नहीं हुई है। मैंने अपने निदेशक से भी बात की है कि पिछले साल संक्रमित पाए गए जो पेड़ अब तक नहीं काटे गए हैं, उनका एक बार फिर निरीक्षण किया जाए।
अगले साल बारिश से पहले होगी कटाई: पीसीसीएफ
मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) बीएस अन्नागिरी डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि इस कीट का प्रकोप पहले भी तीन-चार साल तक बना रहता है। इसकी तीव्रता कम-ज्यादा हो सकती है, लेकिन संक्रमण जारी रहता है। इस बार भी यह रहेगा और अगले साल भी इसकी आशंका है। इसलिए हमें इसे इसी दृष्टिकोण से देखना होगा कि संक्रमण की गंभीरता कितनी है और इसे किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है। उनका कहना है कि पेड़ों की कटाई के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है और बड़े पैमाने पर कटाई करने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है। जब तक केंद्र सरकार इस बात से संतुष्ट नहीं होती कि वहां कटाई की जरूरत है, तब तक हम अपनी तरफ से इतने बड़े पैमाने पर कटाई नहीं कर सकते।
हालांकि, स्थिति की निगरानी की जा सकती है। वह बताते हैं कि मौजूदा स्थिति की गंभीरता का आकलन करने के लिए वह संबंधित सीएफ और डीएफओ से बात करेंगे और वे मौके पर जाकर क्षेत्र का निरीक्षण करेंगे। यदि संक्रमण की गंभीरता ज्यादा पाई जाती है तो तत्काल कार्रवाई की जाएगी।
वह आगे बताते हैं कि अगर किसी क्षेत्र में संक्रमण बहुत ज्यादा है और वहां कटाई की जरूरत है, तो अगले साल बारिश का मौसम शुरू होने से पहले ऐसे पेड़ों को जंगल से बाहर निकालने की व्यवस्था की जा सकती है।
कटाई में जल्दबाजी की गई: रामप्रसाद
मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) एवं 1990 के दशक में साल बोरर प्रभावित पेड़ काटने की सिफारिश करने वाली केंद्र सरकार की समिति की रिपोर्ट में हस्ताक्षर से इनकार करने वाले तत्कालीन आईआईएफएम (भारतीय वन प्रबंध संस्थान) निदेशक राम प्रसाद मानते हैं कि पेड़ों की कटाई में जल्दबाजी हो रही है। उनका जोर है कि जिन पेड़ों को काटने के लिए चिह्नित किया गया है, उनका दोबारा वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए। साथ ही, जंगल में जाकर स्थिति का आकलन करने, पेड़ों के प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित होने की संभावना समझने और कटाई के फैसले में जल्दबाजी न करने की जरूरत है।
उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि 23 अक्टूबर को भोपाल में हुई वर्कशॉप में मैंने वन विभाग से पेड़ों की कटाई को तत्काल रोकने की गुजारिश की। उनका कहना है कि मैं 1970 से इस क्षेत्र और वन विभाग के कामकाज को जानता हूं। पिछले 50 वर्षों में मैंने शायद ही कभी ऐसा देखा हो कि पेड़ों की मार्किंग के लिए विभाग का पूरा स्टाफ जंगल में जाता हो। आमतौर पर यह काम स्थानीय ग्रामीण ही करते रहे हैं। मेरा सवाल है कि साल बोरर जैसे गंभीर संक्रमण के मामले में पेड़ों की पहचान और मार्किंग ग्रामीणों के भरोसे क्यों छोड़ी जानी चाहिए? क्या उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से संक्रमण का आकलन किया है? प्रभावित पेड़ों का कितना प्रतिशत जांचा गया है? यह आज भी एक गंभीर सवाल है।
केवल संक्रमण के कारण पेड़ काटना गलत
रामप्रसाद मानते हैं कि जिन पेड़ों को काटकर जंगल में छोड़ दिया गया है, उनमें से कीट निकल चुके हैं। ऐसे में उन्हें काटने का क्या औचित्य है? साथ ही जो पेड़ अभी हरे हैं और खड़े हैं, वे कार्बन का अवशोषण कर रहे हैं तथा पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। उन्हें केवल इस आधार पर नहीं काट देना चाहिए कि उनमें कभी संक्रमण के लक्षण मिले थे। हमें यह भी देखना चाहिए कि क्या पेड़ को बचाया जा सकता है। अगर वह पूरी तरह सूख जाता है या मर जाता है, तब अलग बात है। लेकिन जब तक उसके जीवित रहने की संभावना है, तब तक उसे बचाने के प्रयास होने चाहिए।
उनका कहना है कि कान्हा में हम इसका सफल उदाहरण देख चुके हैं। 1990 के दशक में कान्हा क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़ों को संक्रमण के कारण काटने की बात सामने आई थी। उस समय हमने हस्तक्षेप किया था। दिल्ली में मंत्रालय के स्तर पर भी इस मामले को उठाया गया। इसके बाद करीब 14-15 लाख पेड़ों को काटने से बचाया जा सका था। लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है कि पहले पेड़ों की मार्किंग कर दी गई और अब बिना पर्याप्त पुनर्मूल्यांकन के उनकी कटाई की जा रही है। उनके अनुसार, हमें यह समझना होगा कि जंगल में अपनी एक प्राकृतिक पुनर्जीवन क्षमता होती है। हर प्रभावित पेड़ को काट देना ही इसका समाधान नहीं है। वह बताते हैं कि यह अध्ययन होना चाहिए कि जिन पेड़ों को पहले बचाया गया था, उनकी आज क्या स्थिति है। क्या वे दोबारा स्वस्थ हो गए हैं? क्या उनमें संक्रमण खत्म हो गया है? क्या वे फिर से सामान्य रूप से विकसित हो रहे हैं? ऐसे उदाहरणों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करके ही आगे की रणनीति बननी चाहिए।
आर्थिक पहलू से ज्यादा पर्यावरणीय पहलू पर ध्यान देने की जरूरत
रामप्रसाद आगे बताते हैं कि साल के जंगल अपनी पारिस्थितिक सेवाओं के लिए जाने जाते हैं, इसलिए इसकी कटाई में आर्थिक पहलू से अधिक पर्यावरणीय पहलू पर ध्यान देने की जरूरत है। उनका मांग हैं कि वरिष्ठ अधिकारियों, वैज्ञानिकों और सेवानिवृत्त वन अधिकारियों की एक टीम गठित की जाए। यह टीम मौके पर जाकर चिह्नित पेड़ों की दोबारा जांच करे और कटाई के फैसले की समीक्षा करे। अगर कटाई को 10-15 दिन या एक महीने के लिए रोककर पुनर्मूल्यांकन किया जाता है तो इससे कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। साल बोरर के कीटों का सक्रिय मौसम मुख्य रूप से मई-जून के आसपास शुरू होता है। इसलिए अभी हमारे पास समय है कि वैज्ञानिक तरीके से स्थिति का आकलन किया जाए। अगले 15 दिनों के भीतर विशेषज्ञों और अधिकारियों की टीम को जंगल में भेजकर यह काम किया जा सकता है। इसके बाद प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर कटाई के फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए।
किया जा सकता है पुन: निरीक्षण
अन्नागिरी भी मानते हैं कि कटाई से पहले एक बार फिर जांच की जा सकती है। अगर दोबारा निरीक्षण में यह पता चलता है कि कुछ पेड़ों को बचाया जा सकता है तो उन्हें बचाने में कोई दिक्कत नहीं है।
वह कहते हैं कि सरकार से जितने पेड़ों की कटाई की अनुमति मिली है, इसका मतलब यह नहीं है कि उन सभी को हर हाल में काटना ही पड़ेगा। अगर निरीक्षण में कुछ पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं मिलती है तो उन्हें छोड़ा जा सकता है। हमारे पास इसका उचित कारण होना चाहिए कि हमने किन पेड़ों की कटाई नहीं की और क्यों नहीं की।