भारत के मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक बुजुर्ग व्यक्ति महुआ के फूल इकट्ठा करता है। वह उन्हें अपने गांव के एक स्थानीय महुआ व्यापारी को बेचता है। फोटो श्रीकांत चौधरी/सीएसई
भारत के मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक बुजुर्ग व्यक्ति महुआ के फूल इकट्ठा करता है। वह उन्हें अपने गांव के एक स्थानीय महुआ व्यापारी को बेचता है। फोटो श्रीकांत चौधरी/सीएसई

वैश्विक बाजार में चमकता महुआ: आदिवासियों का अपनी जड़ों से बढ़ता फासला

महुआ का भविष्य न्याय, गरिमा और समावेशन पर आधारित होना चाहिए—वरना जंगलों से इसके विदा होने के बाद भी सांस्कृतिक और आर्थिक विश्वासघात लंबे समय तक गूंजता रहेगा
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अगर भारत के विकास मॉडल की अंतर्विरोधी सच्चाइयों को कोई वन-फूल उजागर करता है, तो वह है महुआ (Madhuca latifolia)-- पीढ़ियों से यह माखनी रंगत, सुगंधित फूल आदिवासी जीवन की धड़कन रहा है—भोजन, औषधि, स्मृतियों, अनुष्ठानों और सामुदायिक एकता में गहराई से रचा-बसा। झारखंड के मुंडा, संथाल, हो और उरांव समुदायों से लेकर ओडिशा के कोंध और साओरा समुदायों तक, महुआ केवल एक वन-उत्पाद नहीं, बल्कि उनकी पहचान, जिजीविषा और परंपरा का जीवंत इतिहास है। फिर भी, पिछले दो वर्षों में जब महुआ ने वैश्विक बाजारों को चकाचौंध किया है, तब सदियों से इसे संजोने वाली ये ही समुदाय लाभ की हर संरचना से लगभग बाहर कर दिए गए हैं।

गुमला की ललिता मुंडा (40) याद करती हैं कि कैसे वह भोर में ऊँचे महुआ के पेड़ों के नीचे बिखरे फूलों को चुनती थीं —कंधों में दर्द और हाथों में छाले लेकर घर लौटतीं, और फिर भी अपने फूलों को बिचौलियों को मात्र 50 रुपये प्रति किलो में बेचने को मजबूर होतीं, जबकि व्यापारी और निर्यातक विदेशों में इन्हीं फूलों से सैकड़ों रुपये प्रति किलो कमाते हैं।

पश्चिमी सिंहभूम के संजय उरांव (28) तपती गर्मी में दिन-भर जंगलों में भटकते हैं; उनके बच्चे स्कूल से वंचित रह जाते हैं, और उनकी कमाई बस इतनी होती है कि दिन में एक वक्त का भोजन जुट सके। वहीं कालाहांडी की कोंध महिलाएं, जो स्थानीय अनुष्ठानों के लिए महुआ की मदिरा तैयार करती हैं, बढ़ती कीमतों के कारण अब अपनी ही पवित्र परंपराओं को निभाने में असमर्थ हो रही हैं—और बेबस होकर देख रही हैं कि कैसे बाहरी लोग उसी महुआ से मुनाफा कमा रहे हैं, जो उनके जीवन का आधार है।

साल 2022 में छत्तीसगढ़ से 7.5 टन खाद्य-ग्रेड महुआ फूलों का निर्यात यूनाइटेड किंगडम को किया गया, जिसने अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं। 2023 तक, मध्य प्रदेश ने एक ब्रिटिश कंपनी के साथ 200 टन महुआ निर्यात का समझौता कर लिया। सरकारों ने इन सौदों को आदिवासी-नेतृत्व वाली समृद्धि की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया; लेकिन जो लोग वास्तव में पेड़ों पर चढ़कर इन फूलों को इकट्ठा करते हैं, उनके लिए हकीकत बिल्कुल अलग बनी हुई है।

जहां एक ओर महुआ की वैश्विक पहचान तेजी से बढ़ी है, वहीं पीढ़ियों से इसे संजोने वाले स्थानीय संग्राहक आज भी गहरी गरीबी में जकड़े हुए हैं। कीमतें 30–35 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 100–110 रुपये तक पहुंची हैं, जिसे ऐतिहासिक बढ़त बताया जा रहा है; लेकिन संग्रहकर्ताओं के लिए महुआ केवल 10–20 दिनों की मौसमी आय देता है, जो एक परिवार की सालाना कमाई का महज 10–15 प्रतिशत ही बन पाती है।

ऊबड़-खाबड़ जंगल के रास्ते, टूटी-फूटी सड़कें और सरकारी खरीद केंद्रों तक सीमित पहुंच के कारण, अधिकांश संग्राहकों को अपनी मेहनत से जुटाए फूल बिचौलियों को 45–60 रुपये प्रति किलो में बेचने पड़ते हैं। पेड़ भले ही आदिवासी जमीन पर उगते हों, लेकिन मुनाफा सरकारी दफ्तरों, वन महासंघों, परिवहनकर्ताओं, व्यापारियों और निजी निर्यातकों की ओर बह जाता है।

गुमला की ललिता मुंडा या पलामू के संजय उरांव जैसे परिवारों के लिए, वर्षों की कठिन मेहनत आज भी महज़ गुज़ारे लायक आय में सिमट जाती है—छाले पड़े हाथ, दर्द से झुकी पीठ और खाली पेट ही उनके श्रम की कीमत बनकर रह जाते हैं। तस्वीर बेहद साफ है—जहां व्यापारी और कॉरपोरेट मुनाफा बटोर रहे हैं, वहीं वे लोग जो इन फूलों को जीवित रखते हैं, उनके हिस्से सिर्फ टुकड़े भर आते हैं। यह एक निर्मम दोहरी अर्थव्यवस्था को उजागर करता है, जिसमें बाहरी लोगों के लिए प्रचुरता है और जंगल के असली संरक्षकों के लिए अभाव।

महुआ के बाजार मूल्य में आई अचानक बढ़ोतरी ने आदिवासी जीवन की जड़ों को ही हिला दिया है। ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल व बिहार के कुछ हिस्सों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए महुआ की मदिरा केवल एक पेय नहीं, बल्कि एक पवित्र तत्व है—त्योहारों, फसल उत्सवों और उन आत्मीय मिलनों का अभिन्न हिस्सा, जो समुदायों को एक सूत्र में बांधते हैं। कालाहांडी के मदनपुर रामपुर प्रखंड की लक्ष्मी कोंध (26), जो भोर से पहले महुआ चुनने निकलती हैं, कंधों के दर्द के साथ घर लौटने के बाद भी वह अपने बच्चों के फसल उत्सव नुआखाई के लिए वही पवित्र पेय खरीद पाने में असमर्थ रहती हैं। गुमला के भोला मुंडा (40) तपती धूप में दिन-भर जंगल में खटते हैं, उनके हाथों में छाले पड़ जाते हैं, लेकिन महुआ मदिरा की बढ़ती कीमतों ने गांव के उत्सवों को भी लगभग असंभव बना दिया है। दुमका की रेखा संथाल (26) देख रही हैं कि बचपन से जिन अनुष्ठानों को उन्होंने संजोया था, वे धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं और उनकी जगह सस्ते, मिलावटी विकल्प ले रहे हैं, जिन पर वह भरोसा भी नहीं कर पातीं।

जहां एक लीटर महुआ मदिरा कभी 70–90 रुपये में मिल जाती थी, वहीं अब इसकी कीमत 200–250 रुपये तक पहुंच गई है, और कई राज्यों में खुदरा दाम इससे भी अधिक हो चुके हैं। दूर-दराज़ शहरों में हुए निर्यात समझौतों से अनजान आदिवासी संग्राहक आज भी उसी मासूमियत और उम्मीद के साथ कठिन परिश्रम में जुटे हैं, लेकिन उनके श्रम का फल दूर के बाजारों में गुम हो जाता है। मौसमी खेती या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर परिवारों के लिए अब पारंपरिक अनुष्ठानों में इसका उपयोग भी एक ऐसी विलासिता बन गया है, जो उनकी पहुंच से बाहर है।

जैसे-जैसे असली महुआ मदिरा स्थानीय चौपालों और घरों से गायब होती जा रही है, वैसे-वैसे उसकी जगह मिलावटी विकल्प ले रहे हैं—जल्दीबाजी में चीनी, यीस्ट और रसायनों से तैयार किए गए खतरनाक पेय गांव के बाजारों में भर गए हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में ऐसी शराब पीकर हुई मौतें इस कठोर सच्चाई की गवाही देती हैं कि कैसे एक ऐसी व्यवस्था में, जहां सांस्कृतिक विरासत की कीमत बढ़ाकर उसे लोगों की पहुंच से बाहर कर दिया गया है, उसकी जगह मुनाफाखोरी से प्रेरित, जानलेवा विकल्पों ने ले ली है। जो पेय कभी सावधानी, श्रद्धा और गरिमा के साथ तैयार किया जाता था, वह अब एक घातक नक़ल में बदल चुका है—और इसे संजोने वाले लोग खुद को असहाय और शोकाकुल पाते हैं।

सरकारी नीतियां केवल महुआ के साथ असफल नहीं हुई हैं—उन्होंने असंगतता, नौकरशाही उदासीनता और भटकी हुई महत्वाकांक्षाओं के मिश्रण से इस संकट को और गहरा किया है। मध्य प्रदेश में 2021 की बहुचर्चित “हेरिटेज लिकर” पहल, जिसे आदिवासी महिलाओं के सशक्तिकरण की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया था, अपने ही बोझ तले ढह गई। प्रमुख ब्रांड ‘मॉन्ड’ दुकानों की शेल्फ़ पर धूल फांक रहा है, जबकि अलीराजपुर और डिंडोरी की सूक्ष्म आसवन इकाइयां खामोश पड़ी हैं—खराब मशीनरी, लाइसेंस संबंधी अड़चनों और प्रशासनिक देरी ने इन्हें पंगु बना दिया है। जिन स्वयं सहायता समूहों को कभी आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना दिखाया गया था, वे अब विश्वासघात की कहानियां सुनाते हैं—दो वर्षों में महज 13,000–14,000 रुपये की मामूली कमाई, बकाया भुगतान, और अंततः उनका विघटन। गुजरात की ओर पलायन अब जीवन बचाने की रणनीति बन गया है, और करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन एक ऐसी नीति की चेतावनी कथा में बदल गया है, जिसकी जमीन पर कोई पकड़ नहीं थी।

छत्तीसगढ़ और झारखंड में कहानी उतनी नाटकीय नहीं, लेकिन उतनी ही विनाशकारी है—यहां अचानक पतन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे होता क्षरण दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ की खरीद प्रणाली, भले ही 30 रुपये प्रति किलो का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन वह अनियमित और अविश्वसनीय बनी हुई है, जिससे संग्राहकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है या फिर मजबूरी में बिचौलियों को औने-पौने दामों पर बेच देना पड़ता है। झारखंड में, जहां हर साल लगभग दो लाख टन महुआ का उत्पादन होता है और बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार इस पर निर्भर हैं, वहां बुनियादी ढांचे—जैसे खरीद केंद्र, भंडारण सुविधाएं या बाजार से जुड़ाव—की कमी ने आदिवासी संग्राहकों को असुरक्षित और बेबस छोड़ दिया है। यहां राज्य की खामोशी भी उतनी ही नुकसानदेह है जितनी सक्रिय विफलता, क्योंकि यह शोषणकारी निजी व्यापारियों को मनमानी करने और पहले से ही कमजोर आय को और खोखला करने की छूट देती है।

महाराष्ट्र इस उपेक्षा के पैटर्न को पूरा करता है, जहां महुआ को कठोर आबकारी श्रेणियों में बांधकर प्रस्तुत किया गया है—जिससे प्रभावी रूप से कॉरपोरेट कब्जे को रास्ता मिलता है और पीढ़ियों से इसे संजोने वाले समुदाय हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। सुधारों ने केवल सतही स्तर पर छेड़छाड़ की है, लेकिन मूल समस्या जस की तस बनी हुई है: आदिवासी नियंत्रण वाली मूल्य शृंखलाओं का अभाव। अलग-अलग राज्यों में एक स्पष्ट विरोधाभास उभरता है—नीतिगत विमर्श में महुआ को विरासत और विकास के प्रतीक के रूप में महिमामंडित किया जाता है, लेकिन ज़मीन पर वही महुआ असुरक्षा के चक्र को बनाए रखता है। जिसे प्रगति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह आदिवासी संग्राहकों के लिए एक भ्रम से अधिक कुछ नहीं—जहां गरिमा टलती रहती है, सुरक्षा अनिश्चित है, और सशक्तिकरण केवल सरकारी भाषणों तक सीमित है।

कीमतों को संतुलित करने और सांस्कृतिक उपयोग को वैश्विक बाजार के दबावों से बचाने के लिए किसी ठोस तंत्र का अभाव इस पूरे संकट की सबसे बड़ी विफलता है। सरकारें महुआ को एक प्रीमियम निर्यात उत्पाद के रूप में बढ़ावा देती हैं, लेकिन वहीं स्थानीय उपभोग को सख्त लाइसेंसिंग, छापों और दंडात्मक पुलिस कार्रवाई के जरिए अपराध की तरह देखती हैं। यहां लोगों से अधिक निर्यात के आंकड़ों को महत्व दिया जाता है, और संस्कृति से अधिक बाजार को। विदेशों में महुआ का महिमामंडन होता है, लेकिन देश के भीतर उसे कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश किया जाता है। इस विरोधाभास पर नीति-निर्माताओं के पास कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।

यद्यपि आदिवासियों के पास महुआ पर सांस्कृतिक अधिकार हैं, उनके आर्थिक अधिकार बिखरे हुए, कड़े नियंत्रण में और हाशिये पर हैं। जैसे-जैसे वैश्विक मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे नए निर्यात समझौते भी सामने आएंगे; लेकिन यदि स्थानीय समुदायों को ही इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया, तो महुआ का यह उभार उसी सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को खोखला कर देगा, जिसने सदियों से इसे जीवित रखा है। यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि उत्सव के नाम पर की जा रही बेदखली है।

समाधान मौजूद हैं, लेकिन वे राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक स्पष्टता की मांग करते हैं। निर्यात और घरेलू उपभोग के लिए अलग-अलग मूल्य व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए, ताकि वैश्विक व्यापार स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को निगल न जाए। आदिवासी सहकारी समितियों और महिलाओं के समूहों द्वारा संचालित सामुदायिक प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की जा सकती हैं, जिससे मूल्य संवर्धन दूर-दराज़ के औद्योगिक केंद्रों के बजाय स्थानीय स्तर पर ही हो सके। अपराधीकरण की जगह आवश्यक सुरक्षा प्रावधानों के साथ वैधीकरण को अपनाया जाना चाहिए, ताकि महुआ मदिरा को एक पारंपरिक खाद्य उत्पाद के रूप में मान्यता मिले, न कि अवैध वस्तु के रूप में। इससे मिलावट पर रोक लगेगी, गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत होगा और लोगों की जान की रक्षा हो सकेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदिवासी संग्राहकों को मूल्य शृंखला के केंद्र में लाया जाए—हाशिये पर नहीं—ताकि वे उस फूल के आर्थिक लाभों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी पा सकें, जिसे उन्होंने सदियों से सुरक्षित रखा है।

महुआ केवल एक वस्तु नहीं है—यह संस्कृति, पहचान और जिजीविषा का जीवंत भंडार है। आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। महुआ की मांग का वैश्विक उभार उसके स्थानीय जड़ों को काटने का खतरा पैदा कर रहा है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सराहना तब तक खोखली है, जब तक उसके लाभ उन समुदायों तक नहीं पहुंचते जो महुआ के पेड़ों की छाया में अपना जीवन बिताते हैं। विकास को निर्यात की टनों मात्रा, किए गए समझौतों या मीडिया की सुर्खियों से नहीं आँकी जा सकती। उसे न्याय की उपलब्धता, गरिमा की पुनर्स्थापना और सांस्कृतिक जीवन की निरंतरता के आधार पर परखा जाना चाहिए। फूल, जंगल और उन्हें संजोने वाले लोग—इन सबको मुनाफे की दौड़ में केवल एक साधन या ‘कोलेटरल’ के रूप में नहीं देखा जा सकता।

आख़िरकार, महुआ की कहानी सत्ता की कहानी है—किसके हाथ में है, कौन उससे वंचित होता है, और किसे उसका हक मिलना चाहिए। भारत को यह तय करना होगा कि महुआ एक ऐसा बाज़ारी माल बनकर रह जाएगा जिसे बाजार अपने कब्ज़े में लेकर उसके असली संरक्षकों को हाशिये पर धकेल दे, या फिर यह उन लोगों के लिए न्यायपूर्ण समृद्धि का स्रोत बन सकेगा जिन्होंने सदियों से इसे बचाया और संजोया है।

इसी बीच, भारत से बाहर महुआ के निर्यात ने भले ही रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी हो, लेकिन पिछले 12–13 वर्षों में महुआ फूलों के उत्पादन में लगातार गिरावट की खबरों ने जंगल पर निर्भर समुदायों—खासकर आदिवासियों—को गहरे संकट में डाल दिया है। मध्य प्रदेश में, जहां आदिवासी समुदाय पारंपरिक रूप से गिरिजन कोऑपरेटिव कॉरपोरेशन और मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के माध्यम से महुआ बेचते थे, वहां पिछले दो वर्षों से व्यापार सुस्त बना हुआ है। विशेषज्ञ इस गिरावट के लिए जलवायु परिवर्तन और महुआ के पेड़ों की घटती संख्या को जिम्मेदार मानते हैं। फूल आने के मौसम में बदलाव ने उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, और पिछले एक दशक में लगभग 25 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। अनियमित तापमान—दिन में अधिक गर्मी और सुबह-रात में अधिक ठंड— इन परिस्थितियों ने फूल आने के चक्र को बाधित कर दिया है।

बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में लघु वनोपज से होने वाली आय परिवारों की कुल आमदनी का 10 से 55 प्रतिशत तक योगदान देती है, जबकि लगभग 80 प्रतिशत वन-निवासी अपनी खाद्य आवश्यकताओं के 25–50 प्रतिशत के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में महिलाएं हैं। फिर भी, संग्राहकों, बिचौलियों और बाजारों के बीच फैला जटिल जाल आदिवासियों के खिलाफ ही काम करता है। भंडारण सुविधाओं के अभाव में उन्हें कर्ज चुकाने के लिए महुआ कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और बाद में अपने ही उपयोग के लिए उसे ऊंची कीमतों पर वापस खरीदना पड़ता है।

जैसे-जैसे निर्यात की मांग बढ़ रही है, एक गंभीर सवाल सामने खड़ा होता है-- क्या आदिवासी अपने ही महुआ तक पहुंच बनाए रख पाएंगे? बिहार के कैमूर और रोहतास जिलों में लगभग सौ आदिवासी गांवों को पिछले चार दशकों से वन विभाग द्वारा महुआ संग्रह की अनुमति नहीं दी गई है—जिससे अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह के प्रतिबंधों की आशंका बढ़ रही है। पिछले वर्ष न तो गुणवत्तापूर्ण उत्पादन हुआ और न ही बाजारों में कोई विशेष सक्रियता दिखी। बिक्री घटने के बावजूद घरेलू जरूरतें बनी हुई हैं—ऐसे में सवाल यह है कि क्या आदिवासी बढ़ती कीमतों के बीच महुआ खरीद पाने में सक्षम होंगे, या फिर कर्ज के दुष्चक्र में और गहरे फंसते चले जाएंगे?

यदि यह सुगंधित फूल, जिसने अनुष्ठानों को जीवंत रखा, जीवन का उत्सव मनाया और समुदायों को जोड़े रखा, उन्हीं आदिवासी लोगों को लाभ नहीं पहुंचाता जिन्होंने सदियों से इसे संजोया है, तो वैश्विक पहचान की चमक महज खोखली साबित होगी—एक ऐसा दूर का तमाशा, जो मुनाफे का जश्न मनाता है, लेकिन उन जीवनों को नजरअंदाज करता है जिन्होंने इसे संभव बनाया। महुआ का भविष्य न्याय, गरिमा और समावेशन पर आधारित होना चाहिए, अन्यथा यह सांस्कृतिक और आर्थिक विश्वासघात जंगल से फूलों के चले जाने के बाद भी लंबे समय तक बना रहेगा।

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