रिपोर्टर डायरी-13: शिक्षा की कमी से जूझते अबूझमाड़ के आदिवासी: आइतू पड्डा की पहल से उम्मीदें जागीं

ज्यादातर आदिवासी पढ़े-लिखे नहीं होते तो उन्हें पता ही नहीं चलता कि कितना पैसा उनके खाते में है
रिपोर्टर डायरी-13: शिक्षा की कमी से जूझते अबूझमाड़ के आदिवासी: आइतू पड्डा की पहल से उम्मीदें जागीं
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अबूझमाड़ के आदिवासी समुदाय के लिए औपचारिक शिक्षा अभी भी दूर की बात है।यहां एक-दो लोग ही ऐसे मिलेंगे जिन्होंने कुछ शिक्षा ग्रहण की है। एक बात यहां के हर युवा के दिलोदिमाग में बैठ सी गई है कि बिना शिक्षा के हमारा विकास संभव नहीं है।

यही कारण है कि अबूझमाड़ के विनीगुंडा गांव के 19 साल के युवा आइतू पड्डा ने कहा कि कुछ भी हो जाए, मैं पढ़ाई करके रहूंगा। अब आदिवासियों के लिए अक्षर को अनजान नहीं रखना है।

अबूझमाड़ के विनीगुंडा गांव के आइतू पड्डा से मुलाकात कोटरी नदी  के किनारे ही हुई। वह नदी पार कर हाट जा रहे थे। डाउन टू अर्थ को उन्होंने बताया कि वे बीए पास कर अपने गांव में स्कूल खोलना चाहते हैं।

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वे कहते हैं, "शिक्षा से अबूझमाड़ की अबूझ पहेली को हल करने की पूरी कोशिश करूंगा। मैं पढ़-लिख कर सरकार की मदद से ही स्कूल खोलना चाहता हूं।"

हमारे लोग ठीक से पढ़े-लिखे नहीं हैं। यही कारण है कि हर सरकारी या बाहरी आदमी आकर हमें ठग लेता है। हम अपनी आंखों के सामने अपनों को ठगे जाते देखते हैं, और कुछ कर भी नहीं पाते। अब अक्षर अनजान रहेंगे तो हम अपनी लड़ाई कैसे लड़ेंगे?

विनीगुंडा गांव में गोंड जनजाति के कुल 28 परिवार रहते हैं। इनकी खेती साल भर में एक बार ही होती है। बाकी समय ये परिवार लघुवनोपज एकत्रित कर अपनी आजीविका चलाते हैं। पड्डा ने बताया कि विकास के नाम पर गांव में एक पानी टंकी बनी है, लेकिन उसमें पानी नहीं रहता है।

इसके अलावा एक हैंडपंप भी बीते साल लगा था, लेकिन उससे पानी कभी निकला ही नहीं। वह हमेशा खराब ही रहा। हम सभी गांव के आसपास बहने वाली बरसाती नदी का पानी पीते हैं। जब यह  नहीं होता है, तब आसपास के किसी पानी के स्रोत से जरूरत पूरी करते हैं।

सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर गांव का सरपंच होता है। लेकिन ग्रामीण अपने सरपंच को चार-पांच महीने में एक बार ही गांव में देख पाते हैं।

गांव में तेंदुपत्ता और बांस की कटाई का काम मिलता है। इसमें भी आदिवासियों को इस बात की सबसे बड़ी शिकायत रहती है कि हमारी मेहनत का पैसा जनधन खाते में आता है, और हमारे गांव से बैंक जाने का मतलब है, पूरे दो दिन का नुकसान होना।

इस संबंध में पड्डा का कहना है कि कई आदिवासी तो बस इसी खुन्नस में बांस की कटाई नहीं करते हैं कि पैसा तो तुरंत मिलने से रहा, फिर इसमें मेहनत करने का क्या लाभ?

उन्होंने यह भी बताया कि आदिवासी बैंक पहुंच भी जाएं तो जरूरी नहीं है कि उन्हें सही पैसे मिल जाएं। चूंकि ज्यादातर आदिवासी पढ़े-लिखे नहीं होते तो उन्हें पता ही नहीं चलता कि कितना पैसा उनके खाते में है और निकालने के बादकितना बचा है।

वे कहते हैं कि सरकार को इस संबंध में विशेष ध्यान देने की जरूरत है कि आदिवासी को अपनी मेहनत का पैसा नहीं मिल पा रहा है।

यह सही है कि सरकार ने भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जनधन खाते खोले हैं, लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि इसके लिए आदिवासियों को शिक्षित भी तो होना चाहिए।  शिक्षा के बिना जनधन योजना मुसीबत ही है।

पड्डा कहते हैं कि यही कारण है कि जितनी जल्दी हो सके मैं पढ़कर गांव में ही स्कूल खोल कर अपने ग्रामीण भाई-बहनों को हर हाल में शिक्षित करना चाहता हूं।

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