साल बोरर की वापसी: ध्यान न देने पर बन सकते हैं महामारी जैसे हालात
2025 में साल बोरर का प्रकोप सामान्य से अधिक है। अब इसे रोकने के लिए हमें सतर्क रहना होगा। हमें जागरुकता अभियान चलाना होगा और अगले वर्ष से उपचार पद्धति को गंभीरता से अपनाना होगा। हमें डिंडोरी के करंजिया के आसपास और छत्तीसगढ़ की कुछ बेल्ट से भी जानकारी मिलती रहती है। लेकिन फिलहाल हमें केवल अमरकंटक से ही पुख्ता जानकारी मिली है। मैं स्वयं वहां गया था। हमारे स्टाफ ने सर्वे के दौरान केवल उन्हीं जगहों पर सैंपल प्लॉट डाला जहां संक्रमण पहले से मौजूद था। फिर उसी डेटा को पूरे क्षेत्र पर लागू कर दिया गया, जिसकी वजह से यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादा दिख रहा है। अब उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि कम से कम 5 प्लॉट रैंडम तरीके से लगाएं, तभी वास्तविक आंकड़ा सामने आएगा। साल बोरर की महामारी तब होती है जब हम ध्यान नहीं देते। यदि समय रहते कार्रवाई की जाए तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
अभी महामारी जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन अगर हमने ध्यान नहीं दिया और यही परिस्थितियां बनी रहीं, तो आने वाले एक-दो वर्षों में ऐसी स्थिति बन सकती है। यह बारिश पर भी निर्भर करेगा। इसके अलावा जंगलों में लगने वाली आग और अन्य मानवजनित गतिविधियां जैसे बारिश के मौसम में लोग कुल्हाड़ी से पेड़ों पर निशान लगाते हैं, पेड़ों को घायल करते हैं, इन सब पर भी गंभीरता से रोक लगानी होगी। बरसात के मौसम में जब कीड़े बाहर निकलते हैं, तब उन्हें सबसे पहले रस की आवश्यकता होती है। यदि इस दौरान कोई व्यक्ति जंगल में जाकर पेड़ को घायल करता है, तो वह कीड़ा उसी घाव से रस चूसता है और वहीं अंडे भी दे सकता है। इससे संक्रमण फैल सकता है। इसीलिए हमने फील्ड स्टाफ को निर्देश दिए हैं कि बरसात के मौसम में ऐसी गतिविधियों को सख्ती से रोकें। साल का जंगल सदाबहार होता है, जो जैव-विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी लकड़ी को “ग्रीन स्टील” भी कहा जाता है। यदि इसमें बोरर लग जाए तो लकड़ी कमजोर हो जाती है और उसका मूल्य घट जाता है।
(उदय होमकर जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान में एंटोमॉलोजिस्ट एवं वरिष्ठ शोध अधिकारी हैं)

