राम प्रसाद

साल बोरर की महामारी का अंतराल हो सकता है कम

मध्य भारत के शुष्क और आर्द्र पर्णपाती वन मानवजनित दबाव और जलवायु तनाव के कारण संवेदनशील हो रहे हैं - राम प्रसाद
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मध्य प्रदेश में साल के जंगलों में साल बोरर के प्रकोप से जुड़ी रिपोर्टें लगभग तीन दशक बाद फिर से उभर रहे एक बड़े पारिस्थितिक संकट को दर्शाती हैं। इससे पहले 1996-2001 के दौरान इसी प्रकार की साल बोरर महामारी देखी गई थी।

वैज्ञानिक तथा क्षेत्रीय साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि साल बोरर का प्रकोप सामान्यतः हर 25-30 वर्षों में दोहराया जाता है और वर्तमान प्रकोप इसी चक्र का अनुसरण करता है। 1996-2001 की अवधि में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और भारतीय वन प्रबंध संस्थान (आईआईएफएम) जैसे संस्थानों के वानिकी वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों के बीच उपयुक्त नियंत्रण उपायों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए थे। उस समय लाखों पेड़ प्रभावित हुए थे और संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए लगभग एक लाख पेड़ों को काटना पड़ा था। नियंत्रण उपायों में संक्रमित पेड़ों को हटाना तथा स्थानीय समुदायों को प्रति लार्वा 50 पैसे की दर से कीट लार्वा एकत्र करने के लिए प्रोत्साहित करना शामिल था। इन प्रयासों से प्रकोप को दबाने और मूल्यवान साल लकड़ी को बचाने में मदद मिली, लेकिन यह भी सामने आया कि मृत या मरते हुए पेड़ों को हटाने के बहाने अनावश्यक कटाई भी हुई। सख्त निगरानी और प्रशासनिक मजबूती के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई के दौरान संचार संबंधी खामियां अपरिहार्य थीं।

इसके बाद मध्य प्रदेश वन विभाग ने कई सुधारात्मक कदम उठाए। इनमें प्रभावित क्षेत्रों में साल बीज संग्रह पर प्रतिबंध लगाना, ताकि प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा मिल सके तथा गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त क्षेत्रों में पुनर्स्थापन कार्यों को प्राथमिकता देना शामिल था। साल बोरर नियंत्रण के लिए संभावित रासायनिक उपायों की पहचान हेतु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच-पड़ताल भी की गई, लेकिन कोई प्रभावी उपचार नहीं मिल सका। भविष्य को लेकर यह चिंता बढ़ रही है कि जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी तंत्र के सूखने के कारण बोरर की महामारियां कम अंतराल में दोहराई जा सकती हैं। अब केवल साल ही नहीं, बल्कि सागौन (टीक) के जंगलों में भी शीर्ष सूखने (टॉप ड्राइंग) जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं। मध्य भारत के शुष्क और आर्द्र पर्णपाती वन मानवजनित दबाव और जलवायु तनाव के कारण लगातार अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं। इसलिए, वन क्षरण से निपटने के लिए जलागम आधारित (वाटरशेड) और परिदृश्य-स्तरीय (लैंडस्केप लेवल) दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन टू कॉम्बैट डिजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) ढांचे के अंतर्गत कई देश और भारतीय राज्य विश्व बैंक और यूएनडीपी (यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम) के सहयोग से सतत भूमि प्रबंधन (एसएलएम) परियोजनाएं लागू कर रहे हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को भी पारिस्थितिकी तंत्र की शीघ्र बहाली के लिए इसी तरह के हस्तक्षेपों की तत्काल आवश्यकता है।

अतीत की वानिकी (सिल्वीकल्चर) प्रथाएं, विशेषकर कॉपिस पुनर्जनन पर आधारित एकरूप प्रणालियों की ओर झुकाव ने बीज-उत्पत्ति वाले पुनर्जनन को कम करके वनों की सहनशीलता को कमजोर किया है। इससे भूमि सतह की वनस्पतियां घटती गईं, सतही बहाव बढ़ा और मिट्टी की नमी धारण क्षमता कम हुई। भूमि सतह की अधिकांश वनस्पतियां गैर-काष्ठ वन उत्पाद (एनटीएफपी) प्रदान करती हैं, किंतु स्थल क्षरण के कारण ये संसाधन घट रहे हैं, जिससे वन-आश्रित समुदायों की आय और आजीविका प्रभावित हो रही है। मध्य प्रदेश में ग्रीन इंडिया मिशन के अंतर्गत की गई पहलों ने यह दिखाया है कि एकीकृत उपचारों के माध्यम से क्षरित पारिस्थितिक तंत्रों को सफलतापूर्वक पुनर्स्थापित किया जा सकता है। साल बोरर के प्रभाव को दीर्घकाल में कम करने के लिए यूएनडीपी और अन्य दाताओं के सहयोग से लाखों हेक्टेयर में फैले क्षरित वन परिदृश्यों को शामिल करते हुए एक मेगा एसएलएम परियोजना शुरू करने की ठोस आवश्यकता है। इसमें समुदाय की भागीदारी केंद्रीय भूमिका निभाएगी, जिसके लिए निष्क्रिय पड़ी संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (जेएफएमसी) को पुनर्जीवित और सशक्त करना होगा।

अंततः टीएफआरआई, एसएफआरआई, आईआईएफएम तथा अनुभवी वन अधिकारियों के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक वैज्ञानिक मूल्यांकन समिति गठित की जानी चाहिए जो प्रकोप की व्यापकता, प्रभावित पेड़ों की संख्या और उससे जुड़े पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का आकलन करे। इसके साथ ही, यूएनसीसीडी के अंतर्गत एक एसएलएम परियोजना की समानांतर योजना बनाना आवश्यक है, ताकि इस समस्या का सतत और दीर्घकालिक समाधान सुनिश्चित किया जा सके।

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक हैं। उन्होंने नब्बे के दशक में पेड़ काटने की सिफारिश करने वाली केंद्र सरकार की समिति की रिपोर्ट में हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। उस समय वह आईआईएफएम में निदेशक के पद पर थे)

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