लाख में बदलाव के संकेत
दुनिया में केवल कुछ ही एशियाई देश लाख का उत्पादन करते हैं; इनमें भारत सबसे आगे है। देश में लाख का रेजिन (राल) लगभग पूरी तरह भारतीय लाख कीट (केरिया लाक्का) को पालकर प्राप्त किया जाता है। यह कीट बेर, कुसुम और पलाश जैसे पौधों की रसधार (सैप) पर भोजन करता है।
भारतीय लाख कीट के दो आनुवंशिक रूप रंगीनी और कुसमी पाए जाते हैं। दोनों में जीवन-चक्र, पोषक पौधों और उनसे मिलने वाली लाख की गुणवत्ता जैसी कई बातों में अंतर होता है। कुसमी लाख का रंग हल्का होने के कारण इसका बाजार मूल्य अधिक होता है।
परंपरागत रूप से देश के कुल लाख उत्पादन में रंगीनी लाख का योगदान लगभग 80 प्रतिशत था, जबकि शेष कुसुमी लाख का हिस्सा था। लेकिन 2000 के दशक के अंत तक स्थिति बदल गई और कुसमी लाख का उत्पादन रंगेनी लाख से अधिक हो गया। वर्ष 2019-20 में कुल उत्पादन में कुसमी लाख की हिस्सेदारी 68 प्रतिशत थी।
रांची के लंबे समय के मौसम संबंधी आंकड़ों (1984-2007) के वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चला कि नवंबर और फरवरी, यानी सर्दी से पहले और सर्दी के बाद के महीनों में तापमान में धीरे-धीरे लेकिन महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
आगे की जांच में वैज्ञानिकों ने पाया कि रंगेनी लाख के उत्पादन में भारी गिरावट का कारण सर्दी के बाद के महीनों में लाख कीटों पर हमला करने वाले एक खतरनाक छोटे परजीवी ततैया (एप्रोस्टोक्टस परप्यूरस) की संख्या में तेज वृद्धि थी।
इसके बाद कुसमी लाख कीट को बढ़ावा दिया गया, क्योंकि उसका जीवन-चक्र अलग था और वह इस परजीवी कीट के हमले से बच सकता था। यह जलवायु परिवर्तन के कारण किसी परजीवी कीट की आबादी बढ़ने और उसके कारण उसके आश्रित जीव (मेजबान) के अस्तित्व पर खतरा पैदा होने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
(लेखक आर. रमानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरल रेजिन्स एंड गम्स के पूर्व निदेशक हैं। इस संस्थान का नाम 2022 में बदलकर इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च -नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सेकंडरी एग्रीकल्चर कर दिया गया।)

