

अनुकूल वातावरण मिलने पर पारिस्थितिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद उपयोगी साल के वनों पर साल बोरर कीट पनप गया है। विशेषज्ञों को आशंका है कि साल बोरर कहीं 30 साल बाद अपना प्राकृतिक चक्र न दोहरा दे। इस कीट ने 1996-2001 में भीषण तबाही मचाते हुए 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में करीब 35 लाख पेड़ों को प्रभावित किया था। साल के जंगल के लिए चर्चित मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक क्षेत्र और डिंडोरी जिले में हुए शुरुआती वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर कहा जा सकता है कि साल बोरर वनों को गंभीर क्षति पहुंचाने लगा है और इसका लार्वा बड़ी संख्या में पेड़ों के अंदर मौजूद है। वैज्ञानिकों को छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी इनके पनपने की रिपोर्ट्स मिली हैं। चिंता की बात यह है कि एक प्रतिशत साल के पेड़ों पर भी यह कीट लग जाए तो एपिडेमिक (प्रकोप) हो जाता है और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों पर इसका प्रभाव इससे कहीं ज्यादा है। ऐसे में अगर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। अमरकंटक और डिंडोरी से भागीरथ की ग्राउंड रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के सोनतीरथ गांव के जंगल की खामोशी अचानक पेड़ों पर चलने वाली कुल्हाड़ी की आवाज से भंग होती है। इस घने जंगल में चारों ओर से आती इन आवाजों को सुनकर एक बार तो लगा कि शायद पेड़ों की अवैध कटाई करने वाला कोई गिरोह सक्रिय है। जंगल में कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर सुस्ता रहे 70 साल के मजदूर सुकाल ने हमारी यह गलतफहमी मिनटों में दूर कर दी। उन्होंने जानकारी दी कि वह पेड़ काट नहीं रहे हैं बल्कि उनकी पहचान कर रहे हैं। सुकाल कुल्हाड़ी की मदद से साल के पेड़ के तने को छीलकर आयताकार शक्ल दे रहे हैं। इस काम में उन्हें जरा भी खुशी नहीं मिल रही है। माथे पर शिकन लिए सुकाल ने केवल इतना ही कहा, “पूरा जंगल रो रहा है। यह बहुत तेजी से सूख रहा है।”
सुकाल का इशारा साल (शोरिया रोबस्टा) के पेड़ों पर लगने वाले तना छेदक कीट (साल बोरर अथवा होप्लोसिराम्बिक्स स्पाईनिकॉर्निस) की तरफ था। यह साल के जंगल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला कीट है। लगभग 30 साल पहले (1996-2001) इसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में जमकर तबाही मचाई थी। सुकाल के साथ करीब 35 मजदूर थे जो साल के उन पेड़ों को चिन्हित कर रहे थे जिन पर साल बोरर का प्रभाव था। इन्हीं में से एक 45 वर्षीय मजदूर सोहनलाल बैगा ने पेड़ के चारों तरफ फैले क्रीमी बुरादे की ओर उंगली से इशारा करते हुए बताया, “ये सभी पेड़ साल बोरर से सूख रहे हैं।”
सोनतीरथ गांव के इस घने जंगल में 30 नवंबर 2025 से पेड़ों की पहचान और उनकी मार्किंग का काम शुरू हुआ है। एक मजदूर रोजाना साल बोरर प्रभावित करीब 100 पेड़ों की छाल निकालकर उन्हें मार्किंग के लिए तैयार कर रहा है। इस काम में लगे मजदूर एकसुर में स्वीकार करते हैं कि इस वर्ष साल बोरर ने जंगल को काफी नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार, पिछले 4-5 वर्षों से साल बोरर का हल्का असर था, लेकिन इस वर्ष हालात ज्यादा ही खराब हैं। उन्होंने माना कि मार्किंग किए गए पेड़ों को काटा जा सकता है क्योंकि साल बोरर पेड़ों का रस चूसकर सुखा देता है और इन पेड़ों को काटना ही पड़ता है।
वन विभाग ने गांव के इस 119.25 हेक्टेयर जंगल को एससीआई (सिलेक्शन कम इंप्रूवमेंट) कूप संख्या 776 में सूचीबद्ध किया है। 3 दिसंबर 2025 तक केवल 3 हेक्टेयर में ही मार्किंग का काम हुआ था और तब तक साल बोरर प्रभावित 3,113 पेड़ों को गिना गया था। मजदूरों ने बताया कि पूरे 119.25 हेक्टेयर जंगल की मार्किंग में एक महीना तक लग सकता है और केवल इसी गांव के जंगल में प्रभावित पेड़ों की संख्या 1 लाख तक पहुंच सकती है। हालांकि 14 नवंबर को मार्किंग के काम में लगे एक मजदूर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि बाद में पहुंचे वन विभाग के अधिकारियों ने साल बोरर प्रभावित बहुत से पेड़ों को गणना से बाहर कर दिया है। इसके बावजूद सोनतीरथ के 119.25 हेक्टेयर के जंगल में साल बोरर प्रभावित पेड़ों की संख्या करीब 5,000 पहुंच गई।
साल के पेड़ पारिस्थितिकी और आर्थिक दृष्टि से सागौन के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण वृक्ष है। जबलपुर स्थित उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान (टीएफआरआई) के एक दस्तावेज के अनुसार, भारत में साल वन लगभग 1,05,790 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसमें 28,800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के हिस्से में है। यह पूरे देश में साल वन क्षेत्र का 25 प्रतिशत है।
वनों में पाए जाने वाले अन्य वृक्षों की तुलना में साल में सबसे अधिक कीट पाए जाते हैं। इनमें लगने वाली करीब 339 कीट प्रजातियों की पहचान की गई है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साल वनों में वृक्ष की सभी अवस्थाओं में साल बोरर का सर्वाधिक प्रकोप पाया जाता है जो वृक्ष को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। यह कीट साल के तने को भेदकर उसे खाता और अंदर सुरंग बनाकर रहता है।
सबसे खतरनाक कीट
टीएफआरआई के एक वैज्ञानिक ने बताया कि इस कीट ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। उन्हें मध्य प्रदेश के डिंडोरी और अमरकंटक के अलावा छत्तीसगढ़ के चिल्पी, गरियाबंद और नारायणपुर क्षेत्र में इसके फैलने की सूचनाएं मिल रही हैं। डिंडोरी के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) पुनीत सोनकर डाउन टू अर्थ से बातचीत में स्वीकार करते हैं कि पिछले दो वर्षों से साल बोरर प्रभावित पेड़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले वर्ष भी साल बोरर प्रभावित लगभग 5,000 से 6,000 पेड़ों को चिन्हित किया गया था। उनका कहना है, “इस वर्ष अभी चिन्हांकन की प्रक्रिया जारी है। जब आंकड़े आ जाएंगे, तब हम निश्चित रूप से कह पाएंगे कि कितने प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सोनकर के अनुसार, “स्थानीय स्टाफ और ग्रामीण पूर्व करंजिया रेंज, पश्चिम करंजिया रेंज और दक्षिण समनापुर क्षेत्र में इसके प्रभाव की बात कर रहे हैं। हालांकि जब तक आंकड़े नहीं आ जाते, तब तक इसे गंभीर या चिंताजनक नहीं कहा जा सकता। लेकिन हां, साल के पेड़ मध्यम स्तर पर प्रभावित हैं। पेड़ों के नीचे लगातार बुरादा मिल रहा है।” वह आगे कहते हैं, “पूर्व और पश्चिम करंजिया, दक्षिण समनापुर, उत्तरी समनापुर, बजाग, अमरपुर, डिंडोरी और शाहपुर रेंज में साल के जंगल अधिक हैं। इसलिए सभी जगह गणना की जा रही है।” साल बोरर का पहला संकेत गांवों से मिलता है। ये कीट घरों की रोशनी के पास जमा होने लगते हैं। सोनकर के अनुसार, इससे हमें पता चलता है कि संख्या बढ़ रही है। पांच साल पहले ऐसा नहीं होता था। इसका मतलब है कि संख्या में वृद्धि हो रही है।
पुनीत सोनकर के अनुसार, नवंबर में वन विभाग का पुनर्जनन सर्वे होता है। हर 4–5 वर्षों में यह सर्वे किया जाता है। इस बार निर्देश है कि वृद्धि के साथ-साथ यह भी बताया जाए कि कितने पेड़ इस वर्ष प्रभावित हुए हैं। इससे हमें अधिक सटीक आंकड़े मिलेंगे। अभी कोई निश्चित आंकड़ा बताना कठिन है, क्योंकि ऐसा कोई आंकड़ा अभी आया नहीं है। जो भी हम कह रहे हैं, वह संकेतों के आधार पर है। सोनकर के अनुसार, अध्ययन बताते हैं कि इसका एक प्राकृतिक चक्र है जो लगभग 30 वर्षों का होता है। 1997 में इसका प्रभाव बहुत अधिक था। उससे पहले 1967–68 के आसपास था। इसलिए 30 वर्षों बाद 2026–27 में इसके बढ़ने की आशंका है।
सोनकर आगे कहते हैं, यदि परिपक्व पेड़ हैं तो हमारी सिल्वीकल्चर प्रक्रिया में एससीआई कूप के तहत मार्किंग और फेलिंग (कटाई) की जाती है। कार्ययोजना में पहले से यह निर्धारित है कि सभी परिपक्व पेड़ों में से 33 प्रतिशत पेड़ों को काटकर डिपो में बेचा जाता है। हमारा पहला काम यह है कि सभी परिपक्व और साल बोरर से प्रभावित पेड़ों को पहले चिह्नित कर काटा जाए। स्वस्थ पेड़ों को काटने की बजाय प्रभावित पेड़ों को काटा जाएगा। इससे 33 प्रतिशत का लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा। योजना में यह भी है कि यदि किसी कूप में अन्य साल बोरर प्रभावित पेड़ हैं, तो उन्हें भी चिन्हित कर अनुमति लेकर काटा जाए, ताकि संक्रमण न फैले। दूसरा कदम मॉनसून के मौसम में होता है, जिसे ट्रैप ट्री विधि कहते हैं। यह केवल तब की जाती है जब साल बोरर की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है। 2025 के जुलाई-सितंबर में यह किया जाएगा, क्योंकि उस समय कीट अधिक निकलते हैं। इससे 80–90 प्रतिशत साल बोरर नष्ट हो जाते हैं। हम नहीं चाहते कि संख्या इतनी बढ़ जाए कि 2-3 वर्षों में बहुत अधिक पेड़ प्रभावित हों।
डिंडोरी जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में 40.45 प्रतिशत हिस्सेदारी अधिसूचित वन क्षेत्र की है। जिले के 80,263 हेक्टेयर क्षेत्र में साल के जंगल हैं। इनमें 76,230.60 हेक्टेयर में साल के सघन वन और 4,032.42 हेक्टेयर में विरल वन हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि साल बोरर में वन क्षेत्र को तहस-नहस करने की क्षमता है। अगर शीघ्र ही इसके फैलाव को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह बहुत जल्द साल वनों के बड़े हिस्से को अपनी जद में ले सकता है।
जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) में वरिष्ठ शोध अधिकारी (एसआरओ) एवं एंटोमॉलोजिस्ट (कीटविज्ञानी) उदय होमकर ने डाउन टू अर्थ से हुई लंबी बातचीत में माना कि इस बार हमें सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि संक्रमण अन्य वर्षों की तुलना में थोड़ा ज्यादा है। उन्हें अमरकंटक से रिपोर्ट मिली है। अन्य स्थानों का आकलन अभी पूरा नहीं हुआ है (दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक आकलन रिपोर्ट नहीं मिली थी)। उन्होंने कहा, “जब हम अमरकंटक गए तो देखा कि कुछ पुराने क्षेत्र जहां पहले भी संक्रमण था, उसके आसपास के क्षेत्रों में इसका ज्यादा प्रभाव पड़ा है, इसलिए हम कह सकते हैं कि फिलहाल संक्रमण स्थानीय है।”
होमकर के अनुसार, हमें जागरुकता अभियान चलाना होगा और 2026 से उपचार पद्धति को गंभीरता से अपनाना होगा। हमें डिंडोरी के करंजिया के आसपास और छत्तीसगढ़ की कुछ बेल्ट से भी जानकारी मिलती रहती है। लेकिन फिलहाल हमें केवल अमरकंटक से ही पुख्ता जानकारी मिली है। मैं स्वयं वहां गया था। हमारे स्टाफ ने सर्वे के दौरान केवल उन्हीं जगहों पर सैंपल प्लॉट डाला जहां संक्रमण पहले से मौजूद था। फिर उसी डेटा को पूरे क्षेत्र पर लागू कर दिया गया, जिसकी वजह से यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादा दिख रहा है। अब उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि कम से कम 5 प्लॉट रैंडम तरीके से लगाएं, तभी वास्तविक आंकड़ा सामने आएगा। साल बोरर की महामारी तब होती है जब हम ध्यान नहीं देते। यदि समय रहते कार्रवाई की जाए तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
होमकर का मानना है कि अभी महामारी जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन अगर हमने ध्यान नहीं दिया और यही परिस्थितियां बनी रहीं, तो आने वाले एक-दो वर्षों में ऐसी स्थिति बन सकती है। यह बारिश पर भी निर्भर करेगा। इसके अलावा जंगलों में लगने वाली आग और अन्य मानवजनित गतिविधियां जैसे बारिश के मौसम में लोग कुल्हाड़ी से पेड़ों पर निशान लगाते हैं, पेड़ों को घायल करते हैं, इन सब पर भी गंभीरता से रोक लगानी होगी। बरसात के मौसम में जब कीड़े बाहर निकलते हैं, तब उन्हें सबसे पहले रस की आवश्यकता होती है। यदि इस दौरान कोई व्यक्ति जंगल में जाकर पेड़ को घायल करता है, तो वह कीड़ा उसी घाव से रस चूसता है और वहीं अंडे भी दे सकता है। इससे संक्रमण फैल सकता है। इसीलिए हमने फील्ड स्टाफ को निर्देश दिए हैं कि बरसात के मौसम में ऐसी गतिविधियों को सख्ती से रोकें। साल का जंगल सदाबहार होता है, जो जैव-विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी लकड़ी को “ग्रीन स्टील” भी कहा जाता है। यदि इसमें बोरर लग जाए तो लकड़ी कमजोर हो जाती है और उसका मूल्य घट जाता है।
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