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सालूमरदा थिमक्का और तुलसी गौड़ा: कर्नाटक की वनदेवियों की प्रेरणादायक कहानी

मजदूरी करते-करते ये महिलाएं पेड़ पौधाें की जानकारी संजोती रहीं और एक दिन उन्हें वनदेवियों के समान माना जाने लगा
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दो जन मजदूरी करते हुए जीवन यापन करते । थिमक्का व उसका पति चिकाय्या। ऐसे ही दिन व्यतीत होते एक छोटे से गांव हुलिकल मे, जो की रामनगर ज़िला, कर्नाटक में हैं। कोई औलाद ना हुई, थिमक्का उदास सी रहती।

यह कोई सन 1950 के आस पास की बात हैं। थिमक्का कोई छत्तीस साल की रही होंगी।  फिर उन्होंने सोचा कि वो पेड़ लगाएंगे , उनको ही अपनी औलाद मान लेंगे।  जमीन तो थी नहीं, वो ख़ुद दूसरो के खेत खलियानों, खदानों वग़ैरह में काम  करके पेट पालते थे, कहां पेड़ लगाते?  

चिकाय्या को थिमक्का का उदास रहना  नागावर था, उसने सोचा दोनों जन कहीं भी  पेड़ लगाकर उनको अपने बच्चों के तरह पालेंगे,  ज़िंदगी को एक मकसद मिल जायेगा, थिमक्का की  उदासी चली जाएगी। ऐसा ही हुआ। अपनी जमीन नहीं तो क्या? सड़क के आस पास जमीन तो हैं, जहां पोधें लगाये जा सकते हैं।

फिर क्या था , उन दोनों ने बरगद के  पोधें रोपने शुरू कर दिये, उस सड़क पर जो उनके गांव से निकलती थी। चिकाय्या गढ्ढा खोदता, थिमक्का पोधारोपण करती, पानी देती। हर बारिश में नये पौध लगते, पुराने पोधों का ध्यान रखते, पानी ले जा जा कर पौधों को सींचते।  

ऐसा हर साल करते करते, थिमक्का ने अपने गांव हुलिकल से लेकर करीब चार किलोमीटर सड़क के आस पास  तीन सौ ऊपर पेड़ तो बरगद के ही लगा दिये, एक लंबी पंक्ति में, और यह जा पहुंची कुदूर तक। यह जगह तकरीबन अस्सी किमी की दूरी पर हैं,  बैंगलोर  से। 

बहुत सारे दूसरे पेड़ भी लगाए। सब मिला कर  करीब आठ हज़ार से ज़्यादा  वृक्ष लगाये अपने जीवन काल में।  जिस तरह से एक लाइन में पेड़ लगाये तो थिमक्का का नाम पड़ गया, सालूमरदा थिमक्का, यानी की एक लाईन से पेड़ लगाने वाली थिमक्का! पति के 1991 में  गुजर जाने के बाद भी थिमक्का अनवरत लगी रही अपने वृक्षारोपण के काम में।

2019 में थिमक्का को पदमश्री से नवाज़ा गया। सौ साल से भी ज़्यादा की आयु में जब थिमक्का, 2025 में इस दुनिया से गई तो इस संतोष के साथ के उनके बच्चे, बरगद के बड़े बड़े वृक्ष व अन्य वृक्ष जीते रहेंगे। इस तरह एक साधारण सी मजदूरी करनी वाली एक महिला ने  पर्यावरण के लिए असाधारण काम कर दिखाया।  

तुलसी गौढ़ा की कहानी

ऐसी ही एक और वनदेवी थी, कर्नाटक की,  तुलसी गौढ़ा।  एक आदिवासी परिवार में जन्मी तुलसी गौढ़ा, होनाली गांव में रहती थी। उत्तर कर्नाटक में यह गांव ग्रामीण व शहरी क्षेत्र के बीच का सा गांव था, और तुलसी का परिवार बहुत ही गरीब था।

पिता की मृत्यु बचपन में हो गयी, बचपन से ही तुलसी माँ के साथ दिहाड़ी पर काम करती। दोनों जन वन विभाग की एक नर्सरी में बीजों के संरक्षण व बीज़ारोपण से संबंधित कार्य करते। 

रोज की मजदूरी का पैसा लेते हुए जीवन यापन करते। यही बन गया तुलसी का स्कूल, उसकी शिक्षा जो जमीन से जुड़ने से खुद-ब-खुद आती गई। बीजों व पेड़ो के बारे में वो स्वतः ही इतनी विदुषी हो गई कि उसकी जनजाति के लोग उसे पेड़ों की देवी बुलाने लगे।

करीब पैंतीस साल नर्सरी में  दिहाड़ी पर काम करने के बाद वन विभाग ने उसको पक्की नौकरी दे दी। तुलसी गौड़ा थी ही इतनी विशारद ज़ंगलात की वनस्पती के बारे में, बिना किसी स्कूल गए।

वह तो पढ़े लिखे वनाधिकारियों को और बॉटनी पढ़ कर आये स्कालरों को बता सकती थी  की फला-फला बीज किस वृक्ष का हैं या कौन मदर ट्री ( मातृ वृक्ष्)  हैं, यानी कौन से ऐसे स्वस्थ पेड़ हैं जिन्होंने सम्भाल रखा हैं जंगल के इको-सिस्टम को।

अपने जीवन काल मे  करीब एक लाख पेड़ लगाये होंगे उन्होंने!  2021 में उन्हें पदमश्री से नवाज़ा गया। तुलसी गौड़ा यह पता लगाने में सक्षम थी कि कब  बीज लेना हैं मदर ट्री से कि पका हुआ बीज  मिले जो की उग जाए। औषधि पोधों के बारे में भी  उनकी समझ अद्भुत  थी। दो वर्ष पहले, 2024 में उनका देहांत हो गया, मगर अपने पीछे वो बहुत बड़ी विरासत छोड़ गई हैं। कैसे पारम्परिक ज्ञान जो की जमीन से जुड़े रहने व अपने अनुभव से आता हैं और एक राह पर चलते चलते  महिलायें विषम परिस्थितियों में भी कैसे  विदुषि बन कर उभरती हैं ।

कर्नाटक की यह दोनों वन देवियां एक मिसाल हैं भारत वर्ष की बच्चियों व महिलाओं के लिए कि-

“ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूं हर चीज मुक़ाबिल आ जाए

मंजिल के लिए दो-गाम चलूँ और सामने मंजिल आ जाए”

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर  ऐसी वनदेवियों  को शत शत प्रणाम, जो अभी भी बहुत से गांवो व शहरों में बीज बचाने, जंगल बचाने व पेड़ लगाने का काम अपने अपने स्तर पर कर रही हैं।

वनिता सुनेजा 

Down to Earth- Hindi
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