एक कानून, दो फैसले- हसदेव अरण्य और थारू समुदाय के बीच वन अधिकार कानून की बदलती न्यायिक तस्वीर
भारत में वन अधिकार कानून, 2006 को एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है। एक ऐसा कानून जो औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक शासन के दौरान चले आ रहे अन्यायों को सुधारने का दावा करता है। इस कानून ने पहली बार आदिवासी और अन्य परंपरागत वनवासियों को उनके निवास, आजीविका और वन संसाधनों पर अधिकारों की विधिक मान्यता दी।
लेकिन कानून का वास्तविक अर्थ केवल उसके प्रावधानों में नहीं बल्कि कई बार उसकी न्यायिक व्याख्याओं में भी सामने आता है। हाल के दो उच्च न्यायालयों के फैसले छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का हसदेव अरण्य क्षेत्र के घाटबर्रा से जुड़ा निर्णय जो 21 अप्रैल 2026 को आया और 18 अप्रैल 2026 को आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का थारू समुदाय से संबन्धित निर्णय जो इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि कमोबेश एक जैसे मामले में न्यायालयों का रुख अलग-अलग और लगभग विरोधाभासी हो सकता है।
इस विरोधाभासी नजरिये को महज न्यायिक समझ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे यहाँ देश के निवर्तमान प्रमुख न्यायाधीश जस्टिस गवई के उस कथन की ध्वनि साफ-साफ सुनी जानी चाहिए, जिसमें वो कहते हैं कि ‘आर्थिक विचारों से जुड़े नीतिगत मामलों में सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करता और सर्वोच्च न्यायालय लगातार आर्थिक स्वतंत्रता, नियामक अनुशासन और निष्पक्षता के बीच एक नाजुक संतुलन को बनाए रखता है।‘
ताज्जुब नहीं कि दो उच्च न्यायालय लगभग एक ही समय में कमोबेश एक ही मामले में दो अलग-अलग और लगभग विरोधाभासी निर्णय देते हैं। समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ? जहां छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयले की खदानों को और वाणिज्यिक हितों को तवज्जो देना आर्थिक विकास की नीति है वहीं उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी में अभी आर्थिक विकास की कोई बड़ी परियोजना नहीं है इसलिए अधिकारों को प्राथमिकता देना है।
यही वह नाज़ुक संतुलन है जिसकी प्रतिध्वनि देश के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश के कथन में सुनाई देती है। इसलिए ये दोनों फैसले न केवल अलग-अलग परिणामों तक पहुँचते हैं बल्कि वे यह भी दिखाते हैं कि एक ही कानून को दो बिल्कुल भिन्न दृष्टिकोणों से पढ़ा जा सकता है। यह विरोधाभास केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक, प्रशासनिक और नैतिक प्रश्नों को भी जन्म देता है।
दो मामले, एक साझा धुरी
दोनों मामलों की पृष्ठभूमि अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक संदर्भों में है, लेकिन उनकी केंद्रीय धुरी वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिए जिला स्तरीय समिति द्वारा लिए गए निर्णय हैं। जो दोनों मामलों में केंद्रीय सवाल है।
हसदेव अरण्य के मामले में, छत्तीसगढ़ के घाटबर्रा गांव में 3 सितंबर 2013 को वन अधिकार कानून की धारा 3 (1) ग के तहत जिला स्तरीय समिति द्वारा ग्राम सभा को समुदायिक वन संसाधनों के (प्रबंधन, संरक्षण और पुनरुत्पादन ) अधिकार दिए गए थे।
बाद में, 3 सितंबर 2014 को जिला कलेक्टर, सरगुजा ने एक पत्र के माध्यम से बताया कि सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार दिये नहीं गए हैं क्योंकि इस संबंध में सरकार से मार्गदर्शन मांगा गया है और संबंधित क्षेत्र (कम्पार्टमेंट) पहले ही कोयला खनन के लिए आवंटित किया जा चुका है।
इस निरस्तीकरण को स्थानीय समुदायों ने चुनौती दी लेकिन पहले उच्च न्यायालय बिलासपुर की एकल पीठ और अब हालिया निर्णय में खंडपीठ ने भी जिला स्तरीय समिति के सामुदायिक दावों को निरस्त करने के निर्णय को बरकरार रखा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मामले में सरियापारा गांव के समुदाय द्वारा प्रस्तुत सामुदायिक वन अधिकार के दावों को जिला स्तरीय समिति ने 15 मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट के 2020 के एक अंतरिम आदेश का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था।
न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण माना और स्पष्ट किया कि वन अधिकार कानून, एक अधिकार-आधारित कानून है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना और जंगल में निवासरत समुदायों के पूर्व-विद्यमान अधिकारों को मान्यता देना है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अधिनियम की धारा 4 में निहित अन्य कानूनों या प्रावधानों के ऊपर प्राथमिकता के प्रावधान इसे अन्य कानूनों और पूर्व आदेशों पर प्राथमिकता देता है इसलिए ऐसे किसी भी आदेश को आधार बनाकर वर्तमान दावों को खारिज नहीं किया जा सकता।
इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने पाया कि जिला स्तरीय समिति ने न तो याचिकाकर्ताओं के दावों का समुचित मूल्यांकन किया और न ही एक ग्राम सभा को दावे निरस्त होने के संबंध में कोई पत्राचार किया। इसकी वजह से प्रक्रियात्मक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
परिणामस्वरूप, अदालत ने जिला स्तरीय समिति के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः विचार के लिए भेजा और यह सुनिश्चित किया कि तब तक समुदाय के अधिकार संरक्षित रहें। न्यायालय ने राज्य स्तरीय निगरानी समिति को भी सवालों में खड़ा किया।
हसदेव अरण्य: प्रशासनिक विवेक और विकास का पक्ष
हसदेव अरण्य के फैसले में अदालत का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से प्रशासनिक निर्णयों के प्रति सम्मानजनक है। न्यायालय ने यह माना कि: (i) जिला स्तरीय समिति एक वैधानिक प्राधिकरण है जिसे अधिकारों की समीक्षा और निरस्तीकरण का अधिकार प्राप्त है (ii) यदि अधिकारों का निर्धारण त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया पर आधारित पाया जाए, तो उन्हें वापस लिया जा सकता है(iii) इस कानून में ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन उसके निर्णय अंतिम या बाध्यकारी नहीं हैं और (iv) वन अधिकार कानून, 2006 राज्य के खनिजों पर, राज्य के संप्रभु अधिकारों (एमिनेंट डोमेन) को सीमित नहीं करता।
यहां न्यायालय ने वन अधिकार कानून, 2006 को एक ऐसे कानून के रूप में देखा जो मुख्यतः प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान करता है न कि ऐसा ढांचा जो विकास परियोजनाओं को रोकने का पूर्ण अधिकार देता हो।
निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत ने परियोजना के “उन्नत चरण” को विशेष महत्व दिया। अदालत ने कहा कि यदि परियोजना काफी आगे बढ़ चुकी है, तो शेष दावों को मौद्रिक/आर्थिक मुआवज़े के माध्यम से तय किया जा सकता है। इस तर्क के साथ अदालत ने यह भी जोड़ा कि भले ही पारिस्थितिक क्षति की भरपाई पूरी तरह संभव न हो लेकिन एक बार जब किसी परियोजना को तमाम कानूनी स्वीकृतियाँ दी जा चुकी हों और परियोजना लागू हो चुकी हो तब न्यायालय को व्यापक सार्वजनिक हितों के बीच संतुलन बनाना होता है।
यह दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि विकास परियोजनाएँ, यदि कानूनी प्रक्रिया से गुजर चुकी हैं, तो उन्हें बाद में चुनौती देना कठिन होगा, भले ही समुदायिक अधिकारों पर उसका प्रत्यक्ष और दीर्घकालीन नकारात्मक प्रभाव क्यों न पड़े।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय: अधिकारों की केंद्रीयता
इसके विपरीत, थारू समुदाय के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपनाया। यहाँ अदालत ने वन अधिकार कानून, 2006 को एक अधिकार-आधारित कानून के रूप में पढ़ा, जिसका उद्देश्य मौजूदा अधिकारों को मान्यता देना है न कि उन्हें प्रशासनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सीमित करना।
अदालत ने कहा कि (i) जिला स्तरीय समिति बिना समुचित प्रक्रिया अपनाए दावों को खारिज नहीं कर सकता (ii) केवल तकनीकी आधारों या पूर्व आदेशों का हवाला देकर समुदायों के अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता (iii) वन अधिकार कानून, 2006 का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि समुदायों को न्यायपूर्ण प्रक्रिया के माध्यम से उनके अधिकार मिलें।
इन मुख्य तर्कों को आधार पर न्यायालय ने जिला स्तरीय समिति के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए भेजा और यह सुनिश्चित किया कि तब तक समुदाय के अधिकार सुरक्षित रहें। यहाँ अदालत का रुख स्पष्ट रूप से अधिकार-केंद्रित है जिसमें प्रशासनिक निर्णयों की गहन समीक्षा की जाती है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि कानून की मूल भावना प्रभावित न हो।
व्याख्या का टकराव: प्रक्रिया बनाम अधिकार
इन दोनों फैसलों को साथ पढ़ने पर सबसे बड़ा अंतर वन अधिकार कानून, 2006 की प्रकृति को लेकर सामने आता है।
हसदेव अरण्य में वन अधिकार कानून, 2006 को एक प्रक्रियात्मक ढांचे के रूप में देखा गया, जहाँ मुख्य ध्यान इस बात पर है कि क्या प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन हुआ। वहीं, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में वन अधिकार कानून, 2006 को एक सारभूत अधिकार (सब्स्टेंटिव राइट्स) देने वाले कानून के रूप में समझा गया जहाँ प्रक्रिया का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा करना है न कि उन्हें सीमित करना।
यह अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं है। इसका सीधा असर समुदायों के जीवन पर पड़ता है। यदि वन अधिकार कानून, 2006 को केवल प्रक्रियात्मक माना जाए, तो प्रशासनिक निर्णयों को चुनौती देना कठिन हो जाता है। लेकिन यदि इसे अधिकार-आधारित कानून माना जाए तो हर निर्णय को इस कसौटी पर परखा जाएगा कि वह समुदायों के अधिकारों की रक्षा करता है या नहीं।
ग्राम सभा की भूमिका: केंद्र या परिधि?
इन दोनों निर्णयों में एक और महत्वपूर्ण अंतर ग्राम सभा की भूमिका को लेकर है।
हसदेव अरण्य के घाटबर्रा के फैसले में ग्राम सभा को प्रक्रिया का हिस्सा माना गया लेकिन उसकी सहमति को अंतिम नहीं माना गया। गौरतलब है कि खनन परियोजना के लिए ग्राम सभा द्वारा यह दावा किया गया कि स्वीकृति गलत तरीके से ली गयी है जिस पर उच्च न्यायालय ने ध्यान नहीं दिया।
इसके विपरीत, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में समुदायिक अधिकारों और उनकी प्रक्रिया को गंभीरता से लिया गया जिससे यह संकेत मिलता है कि ग्राम सभा की भूमिका केवल औपचारिक नहीं है बल्कि वह अधिकार निर्धारण की प्रक्रिया का केंद्र है। हालाँकि यह निर्णय वन अधिकार कानून की एक स्पष्ट और अधिकार-केंद्रित व्याख्या प्रस्तुत करता है, फिर भी अधिनियम की मूल भावना के आलोक में देखा जाए तो न्यायालय कुछ और कदम आगे बढ़ा सकता था। विशेष रूप से, ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका को और अधिक स्पष्ट और निर्णायक रूप से स्थापित किया जा सकता था जो वन अधिकार कानून के ढाँचे का मूल आधार है ताकि यह स्पष्ट हो कि वह केवल एक औपचारिक संस्था नहीं बल्कि अधिकार निर्धारण की प्रक्रिया का केंद्र है।
प्रशासनिक विवेक बनाम न्यायिक निगरानी
इन दोनों फैसलों के बीच एक और स्पष्ट अंतर प्रशासनिक विवेक के प्रति न्यायालय के दृष्टिकोण में है।
हसदेव के मामले में अदालत का झुकाव प्रशासनिक निर्णयों के प्रति है और उन्हें तब तक वैध मानती है जब तक स्पष्ट रूप से अवैधता साबित न हो।
थारू जनजाति के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख प्रशासनिक निर्णयों की गहन समीक्षा करने की तरफ है और प्रक्रियात्मक खामियों को गंभीरता से लिया गया है।
यह अंतर इस बात को भी दर्शाता है कि न्यायपालिका किस हद तक प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप करने को तैयार है।
विकास बनाम अधिकार: संतुलन या प्राथमिकता?
हसदेव के फैसले में “सार्वजनिक हित” और “विकास” को प्रमुख स्थान दिया गया। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि परियोजना पहले से लागू हो चुकी है और अब यह बंद नहीं की जा सकती है। इसके विपरीत, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया कि विकास या प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समुदायों के अधिकारों को दरकिनार न किया जाए।
यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि- एक दृष्टिकोण में विकास प्राथमिक है जबकि दूसरे में अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।
अनिश्चितता का संकेत
इन दोनों फैसलों का तुलनात्मक अध्ययन एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष की ओर इशारा करता है। वन अधिकार कानून की न्यायिक व्याख्या अभी भी सार्वभौमिक नहीं है और इसे सरकार की आर्थिक नीति के संदर्भ में ही देखा जा रहा है।
एक ही कानून, एक ही प्रकार के प्रशासनिक निर्णय, लेकिन दो बिल्कुल अलग न्यायिक प्रतिक्रियाएँ। यह केवल कानूनी अंतर नहीं बल्कि एक व्यापक संस्थागत अनिश्चितता का संकेत है।
यह अनिश्चितता केवल अदालतों तक सीमित नहीं है; इसका असर सीधे उन समुदायों पर पड़ता है, जिनके अधिकार इस कानून के केंद्र में हैं।
अंततः, सवाल यह नहीं है कि कौन सा फैसला सही है बल्कि यह है कि क्या हम एक ऐसे न्यायिक ढांचे की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ अधिकारों की व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहेगी, या फिर कोई स्थिर सिद्धांत विकसित होगा जो वन अधिकार कानून, 2006 की मूल भावना को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सके।
(लेखक भारत सरकार के आदिवासी मंत्रालय के मामलों द्वारा गठित हैबिटेट राइट्स व सामुदायिक अधिकारों से संबन्धित समितियों में नामित विषय विशेषज्ञ के तौर पर सदस्य रहे हैं। जंगल-ज़मीन और आदिवासियों के अधिकारों पर काम करते हैं।)


