ग्राउंड रिपोर्ट: अबूझमाड़ के “अबूझ” गांव

अबूझ यानी जिसको बूझना संभव न हो और माड़ यानी गहरी घाटियां व पहाड़। अबूझमाड़ एक अत्यंत दुर्गम इलाका है। यहां आदिवासी आज भी अपने आदिम स्वरूप में जी रहे हैं। यहां की दुर्गम घाटियों के बीच गुमनाम 237 गांव में से चार गांव में डाउन टू अर्थ टीम पहुंची और आदिवासियों के जनजीवन की टोह लेने की एक अदद कोशिश की है
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित अबूझमाड़ के गेड़ा बेड़ा गांव में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत आदिवासी अपने-अपने हिस्से का अनाज ले जाते हुए
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित अबूझमाड़ के गेड़ा बेड़ा गांव में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत आदिवासी अपने-अपने हिस्से का अनाज ले जाते हुए (सभी फोटो: अंकुर तिवारी)
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कोटरी नदी (नारायणपुर) के लंबे-चौड़े सूनसान किनारे दोपहर के बारह बजने वाले हैं और इतने बड़े इलाके में यहां केवल तीन लोग ही नजर आ रहे हैं। इनमें दो तो सुरक्षा कर्मी सिविल कपड़े में टहल रहे हैं और एक आदिवासी डोंगी के इंतजार में बैठा है। नदी पार करते ही अबूझमाड़ की सीमा शुरू हो जाती है। अबूझमाड़ क्षेत्र को अबूझमाड़ या अबूझमाड़िया शब्द बाहरी समाज द्वारा दिया गया है। इस संबंध में अबूझमाड़ आदिवासी छात्र संगठन के अध्यक्ष लक्ष्मण मंडावी ने बताया, “हम अपने को ‘मेटा कोईतोर’ या ‘पर्वतीय भूमि के निवासी’ कहते हैं और अपने क्षेत्र को ‘मेटाभूम’ कहते हैं।”

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में अबूझमाड़ 4,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला एक घना-दुर्गम पहाड़ियों का जंगली क्षेत्र है। इस जंगल में माड़िया, गोंड, मुरिया गोंड और पहाड़ी मुरिया आदिवासी समुदाय रहते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ के 7 विशेष रूप से कमजोर जनजातियों (पीवीटीजी) को मान्यता प्राप्त है। इस जंगल को अपनी रहस्यमयी भौगोलिक परिस्थितियों और समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए जाना गया है। नदी किनारे दूर-दूर तक फैले इस सूनसान इलाके से ही पता चलता है कि अबूझमाड़ का अधिकांश हिस्सा आज भी बाहरी दुनिया से कटा हुआ है। यही कारण है कि बाहरी व्यक्तियों के आने जाने पर लगातार निगरानी होती है। ध्यान रहे कि मध्य प्रदेश सरकार ने 1980 में इस इलाके में बाहरी व्यक्तियों के आने जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसे छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने 2009 में हटाया। रायपुर स्थित आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान ने 2015-16 में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार अबूझमाड़िया जनजाति की जनसंख्या 23,330 है, जिसमें 11,456 पुरुष और 11,874 महिलाएं हैं।

सहचर जीवन शैली

कोटरी नदी पार करने के लिए कोई भी जब डोंगी (आदिवासियों द्वारा निर्मित छोटी नाव) पर चढ़ता है तो डोंगी खेने वालों में से एक की आवाज कानों में सुनाई पड़ती है। आपको तैरना आता है? हां कहने पर निर्देश मिलता है कि आप दोनों डोंगी (लकड़ी की दो छोटी डोंगी को रस्सी से बांध कर बनाई गई एक डोंगी) के बीचों बीच खड़े हो जाएं। तैरने की जानकारी नाविक इसलिए लेता है कि यह नाव 20 साल पुरानी है और इसमें कई स्थानों पर सुराख होने के साथ-साथ इस पर गाय, बकरी, साइकिल, बाइक सहित आधा दर्जन से अधिक आदिवासी बैठ कर नदी पार करते हैं। नदी के बीचो बीच जाकर कई बार डोंगी अपना संतुलन खो देती है, ऐसे हालात में नाविकों के साथ-साथ दूसरे भी नदी तैर कर ही पार कर पाते हैं।

अबूझमाड़ के गांवों से हाटबाजार के लिए आए आदिवासी दो छोटी डोंगी को बांध कर बनाई गई एक डोंगी से कोटरी नदी पार करते हुए
अबूझमाड़ के गांवों से हाटबाजार के लिए आए आदिवासी दो छोटी डोंगी को बांध कर बनाई गई एक डोंगी से कोटरी नदी पार करते हुए(सभी फोटो: अंकुर तिवारी)

स्वतंत्रता के 78 साल बाद भी इस नदी पर पुल तो दूर अब तक एक कच्चा रप्टा तक नहीं बना है। जबकि इस डोंगी से नदी पार बसे अबूझमाड़ के 237 गांवों में से लगभग 20 गांव के आदिवासी रोजाना आते-जाते रहते हैं। विकास की किरणों ने भले ही इस इलाके को न छुआ हो लेकिन आदिवासियों की सहचर (सहकारिता) जीवन शैली इसी डोंगी को खेने वाले दोनों नाविकों की आजीविका से पता चल जाती है। डोंगी के नाविक लक्ष्मण ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इस डोंगी को प्रतिदिन कौन चलाएगा, इस बात का निर्णय ग्राम सभा करती है। वह कहते हैं कि इससे गांव के हर परिवार को पैसा कमाने का मौका मिलता है। इस डोंगी से नदी पार करने के रेट अलग-अलग हैं। एक आदमी का दस, मवेशी का बीस, बाइक का 50 और साइकिल का दस रुपए शुल्क है। इस संबंध में डोंगी से ही नदी पार कर रहे सुनील ने बताया कि कोटरी नदी पर पुल नहीं होने से बारिश के दौरान पांच महीने तक ग्रामीण नदी पार नहीं कर पाते हैं। इस इलाके के आदिवासी पुल की मांग करते-करते थक चुके हैं।

नदी पार करते ही अबूझमाड़ के घने जंगलों से आ रही जीव-जंतुओं की आवाजों के बीच जंगलों की ओर जाने वाली सर्पिली आकार लिए पगडंडियां और भी बाहरी लोगों को दिशा भ्रम करती हैं। इस बियाबान जंगल में बसे कंदाड़ी गांव के मुंहाने पर ही खाली पड़ा घोटुल (आदिवासियों का सांस्कृतिक हाल) मंडप है। घोटूल के पास से गुजर रहे मकराम ने बताया कि यहां शाम को बहुत लोग एकत्रित होते हैं। ध्यान रहे कि यह घोटुल अविवाहित आदिवासी युवक-युवतियों के लिए मनोरंजन, सह शिक्षा केन्द्र, अतिथि गृह तथा सभागार के रूप में उपयोग किया जाता है। गांव के अविवाहित युवक-युवतियां प्रतिदिन शाम को घोटुल में एकत्रित होते हैं। इन युवायों को गांव के बुजुर्गों द्वारा जीवनोपयोगी शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जाता है। गांव में रहने वाले बच्चे जैसे ही 8 से 10 वर्ष के होते है, उन्हे घोटुल भेजा जाता है और इनकी सदस्यता तब तक चलती है, जब तक इन युवाओं की शादी ना हो जाए।

आदनार गांव में आदिवासी महिला आम की चटनी के साथ मडिया पेज (पेय) पी रही है
आदनार गांव में आदिवासी महिला आम की चटनी के साथ मडिया पेज (पेय) पी रही है

गांव के अंदरूनी इलाके में सड़क जैसा एक बड़ा ढर्रा (चौड़ा कच्चा रास्ता) दिखाई पड़ा। पूछने पर पता चला कि 2024 में गांव का यह कच्चा रास्ता प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत इस कच्ची सड़क का निर्माण किया गया था। हालांकि इसकी लंबाई कुछ दूरी के बाद जंगलों में खो गई है। ध्यान रहे कि इस योजना के तहत देशभर में बनाई गई सड़कें पक्की होती हैं लेकिन यहां बस एक कच्चा छोटा सा रास्ता बना कर खानापूर्ति कर दी गई है। हालांकि एक नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री ने राज्य के रजत जयंती समारोह के दौरान दिए गए भाषण में दावा किया था कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में 40 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है। कंदाड़ी गांव के युवा सोम मंडावी ने इस सड़क निर्माण की प्रक्रिया को एक पाखंड करार दिया और डाउन टू अर्थ से कहा, “हमें बड़ी सड़क की जरूरत नहीं है, हमें तो पहले इस घनघोर जंगल में पक्की पगडंडी चाहिए।” वह कहते हैं कि यह एक जमीनी हकीकत है कि चौड़ी सड़कें इस इलाके में नहीं बनाई जा सकतीं क्योंकि हर पांच-सात मीटर की दूरी पर नाले बह रहे हैं और उबड़-खाबड़ इस पहाड़ी इलाके में सरकार की इतनी क्षमता नहीं है कि यहां दर्जनों छोटी पुलिया का निर्माण कर सके।

दोपहर खत्म होने वाली है लेकिन कंदाड़ी गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है। कारण कि गांव के अधिकांश आदिवासी जंगलों में लघुवनोपज एकत्रित करने गए हुए हैं। इसके अलावा आदिवासी क्षेत्रों में बसे गांवों का क्षेत्रफल बहुत बड़ा होता है और एक घर से दूसरे घर के बीच अच्छी-खासी दूरी (5 से 7 किलोमीटर) होती है। सोमा ने कहा है कि ये जंगल इतने घने हैं कि बाहरी आदमी यदि एक घर से दूसरे घर के लिए निकलेगा तो वह अवश्य रास्ते में ही गुम हो जाएगा। चूंकि यह गांव अबूझमाड़ के प्रवेश द्वार की तरह है इसलिए यहां पर सरकार ने कुछ ऐसे आधारभूत संरचनाएं तैयार कर दी हैं, जिससे यह लगे कि सरकार की यहां तक पहुंच हैं। गांव में संरचनाएं इसलिए बना दी गईं ताकि सरकारी आंकड़ों में दिखाया जा सके कि यहां शौचालय बन गए, पेयजल की व्यवस्था हो गई और गांव की सड़कें बन गई हैं। लेकिन जब डाउन टू अर्थ ने गांव का चक्कर लगाया तो पाया कि शौचालय किसी भी घर में नहीं है। बस घोटुल के पास ही जीर्णशीर्ण अवस्था में एक शौचालय दिखा। यह भी इसलिए पता चला कि टूटे-फूटे एक कमरे के बाहर शौचालय लिखा हुआ पढ़ने को मिला। इसी प्रकार से पेयजल के नाम पर एक टूटा-फूटा बिना हैंडल का हैंडपंप दिखाई पड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि यह एक साल पहले लगाया था, लेकिन इसमें कभी पानी नहीं आया। यह हैंडपंप गांव के एक कोने में ठूठ बन कर खड़ा है और इस बात की कथित गवाही दे रहा है कि इस आदिवासी गांव में पेयजल की व्यवस्था हो गई है। हालांकि डाउन टू अर्थ ने गांव की सरपंच के घर जाकर इस संबंध में हकीकत जाननी चाहिए लेकिन उनके घर पर ताला जड़ा हुआ था। सोम ने बताया कि अबूझमाड़ के अधिकांश गांव के सरपंच गांव में नहीं रहते, वे जिला मुख्यालय में परिवार के साथ रहने लगे हैं।

अबूझमाड़ के चारामा इलाके में एक आदिवासी महिला सीताफल बेचते हुए
अबूझमाड़ के चारामा इलाके में एक आदिवासी महिला सीताफल बेचते हुए

विकास पर सवाल

कंदाड़ी गांव से लगे दूसरे खैरीपदा गांव की दूरी पगडंडियों के सहारे पहुंचने में डेढ़ से दो घंटे लग जाते हैं। क्योंकि रास्तों में 11 लबालब पानी से भरे हुए नालों को तैर कर या फिर लकड़ी के बड़े टुकड़े का सहारा ले कर पार करना होता है। खैरीपदा गांव में कुल 33 आदिवासी परिवार रहते हैं और जनसंख्या लगभग 200 है। कहने के लिए इस गांव के लोग नदी पार हाट बाजार जाते हैं। लेकिन इनकी दुनिया अभी भी गांवों तक ही सीमित है। उनके लिए विकास खंड, तहसील, जिला, राज्य और देश जैसे भौगोलिक नाम अपरिचित हैं। इसी गांव के मंगू मंडावी से जब पूछा कि देश का सबसे बड़ा आदमी कौन है? तो उनका उत्तर था, सरपंच। वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जैसे शब्दों से अनभिज्ञ हैं। हालांकि वह बताते हैं कि बहुत बरस पहले एक बड़ा आदमी आया था, उनका नाम जोगी था (राज्य के पहले मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी) वह नदी पार पखांजूर आए थे। हमें वहां ले जाया गया था। जब पूछा गया कि वह क्या थे तो उन्होंने कहा कि यह तो नहीं मालूम।

मंगू के रिश्तेदार सोमू ने बताया कि खेती तो हम केवल एक बार ही कर पाते हैं और खेती जून से अक्टूबर-नवंबर तक चलती है। ध्यान रहे कि इस इलाके के अधिकांश आदिवासी कोसरा, कोदो-कुटकी, चावल, मक्का, मूंग, उड़द दाल की खेती होती है। क्षेत्र में सिंचाई नहीं होने के कारण आदिवासी साल में एक ही फसल ले पाते हैं। इसके बाद खेत ऐसे ही खाली पड़े रहते हैं। मंगू ने बताया कि हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मई माह में तेंदूपत्ता से हो जाता है। हालांकि उसका कहना था कि काम तो 10-15 दिन का ही होता है लेकिन पैसे ठीक मिल जाते हैं। हां उसने शिकायत भरे स्वर में यह अवश्य कहा कि अब ठेकेदार पैसा हमें तुरंत न देकर हमारे खाते में डलवा देते हैं। वह कहते हैं कि यह कई हफ्तों बाद ही मिल पाता है और ऊपर से बैंक वाले पता नहीं कितना देते हैं, हम तो ठेठ अनपढ़ ठहरे पता ही नहीं चलता कि हमारे खाते में कितना पैसा आया है और कितना बैंक वाला दे रहा है। मंगू के घर में दर्जनभर से अधिक गाय व बकरियां मंडरा रही हैं लेकिन वे इनका दूध नहीं निकालते। इस संबंध में मंगू ने बताया कि इन मवेशियों का दूध हम कभी नहीं निकालते, बस कभी-कभार किसी दवा आदि बनाने के लिए उपयोग कर लेते हैं। उसका कहना है कि आखिर इनके दूध पर उसके बछड़ों का पहला हक है, हम कैसे निकाल सकते हैं? ऐसे में इनको पालने का लाभ क्या है? उन्होंने कहा कि इनके बछड़े जो पैदा होते हैं, उन्हें बेचकर हम लाभ कमाते हैं।

अबूझमाड़ के आमाटोला गांव में आदिवासी महिलाएं और पुरुष  मिलकर परंपरागत आदिवासी  नृत्य करते हुए
अबूझमाड़ के आमाटोला गांव में आदिवासी महिलाएं और पुरुष मिलकर परंपरागत आदिवासी नृत्य करते हुए

मंगू के आंगन के चारों तरफ घर है लेकिन इन कच्चे घरों के बीच एक आधी-अधूरी ईंट की बनी बनी हुई एक काली दीवार दिखाई पड़ी। इसके बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि सरकारी लोग पिछले साल (2024) आए थे और कहा कि हम आपके लिए घर बनाएंगे। ऐसे में उन्होंने ही यह दीवार बनाई लेकिन उसके बाद अब तक नहीं आए। वास्तव में यहां प्रधानमंत्री आवासीय योजना के तहत आधा-अधूरा निर्माण कार्य किया गया है। ग्रामीणों ने बताया कि एक-एक कमरे का घर निर्माण के लिए गांव के 7 घरों को चुना गया था लेकिन इस आधे-अधूरे घर के निर्माण के बाद अब तक सरकारी लोग नहीं लौटे हैं। हालांकि मंगू ने सवाल किया कि सरकार हमें एक कमरे का घर क्या सोच कर दे रही है? क्या उसे पता नहीं कि हमारे आदिवासी परिवारों का गुजर-बसर एक कमरे के घर से होने वाला नहीं। वह कहते हैं कि हम कई दर्जन मवेशी पालते हैं और अनाज आदि रखने के लिए घर और रहने के लिए अलग से घर बनाते हैं, ऐसे में हमारे लिए यह एक कमरे का घर किस काम का? साथ ही सोम ने कहा, आखिर जब ये पक्के घर समय के साथ टूटेंगे तो हम कहां से ईंट- गारा या लोहे की सरिया लाएंगे? अभी तो हम अपने घर की मरम्मत स्वयं ही जंगल से पूरी कर लेते हैं। सोम के इस यक्ष सवाल का जवाब तो सरकार ही दे पाएगी।

वन अधिकार बस कागजों पर

खैरीपदा गांव से आमाटोला गांव तक पहुंचने के लिए कोई भी राहगीर अंधेरी रात में चमकती पगडंडियों के सहारे दो से ढाई घंटे में पहुंच जाता है। आमाटोला गांव में रात के पौने दस बज चुके हैं। जिस घर में डाउन टू अर्थ टीम पहुंची, उस वक्त घर के बुजुर्ग-युवा और गांव के कई बुजुर्ग बड़े-बड़े लकड़ी के लट्ठों को जलाकर ठंड कम करने की कोशिश में जुटे हुए थे। कारण कि अबूझमाड़ के बाहर अच्छी खासी गर्मी है लेकिन जैसे ही जंगल में प्रवेश करते हैं ठंड शुरू हो जाती है। आदिवासी डाउन टू अर्थ से बातचीत करने के लिए इतने उतावले थे कि वे इतनी रात तक जाग रहे थे। अन्यथा उनकी कोशिश होती है कि जितना जल्दी हो सके सो जाएं। आखिर इनमें अधिकांशत: सुबह मुर्गे की बांग से पहले उठने वालों में शामिल हैं। यहां के मुर्गें भी बहुत ढीठ हैं, सुबह-सुबह बांग आखिर कहीं मैदान या आंगन में जाकर दें लेकिन ये जहां-जहां लोग सोए रहते हैं, उनके सिरहाने जा कर ही बांग देना पसंद करते हैं। चाह कर भी कोई इन इलाकों में देर सुबह तक नहीं सो सकता।

अधिकांश आदिवासियों का एक ही बड़ा सवाल था कि अब इतने लोग हमारे इस जंगल में क्यों आ रहे हैं? विगत सालों में तो हम कभी- कभार किसी शहरी को देख पाते थे या कोटरी नदी के पार जाते थे जब हम आप जैसे लोगों को देख पाते थे। जब डाउन टू अर्थ ने अपने आने का उद्देश्य बताया तो उनमें एक आदिवासी मंगेरु ने टूटी-फूटी छत्तीसगढ़ी में बोलते हुए पूछा कि छत्तीसगढ़ राज्य कब बना? बताने पर उसने पूछा कि हमें तो अब तक पता ही नहीं कि हम किस राज्य में रहते हैं। एक अन्य ग्रामीण मनका ने कहा कि हम तो बांस काटते हैं लेकिन उसका पैसा हमें बहुत कम मिलता है। उन्होंने बताया कि एक बांस की कटाई पर ठेकेदार हमें केवल सात रुपए देता है। ध्यान रहे कि एक बांस की कटाई केवल इतनी भर नहीं है कि उसे काट कर रख दिया। बल्कि उसे बकायदा काटछांट कर तैयार किया जात है।

आदिवासियों के अनुसार एक बांस की छंटाई में दो से ढाई घंटे लग जाते हैं। ऐसे में एक आदिवासी दिनभर मेहनत करने के बाद मुश्किल से 3-4 बांस ही तैयार कर पाता है। इस हिसाब से उसकी रोजी 28 रुपए ही बैठती है। ग्रामीणों ने कहा कि हमने तो बीते साल सरकार द्वारा दिए जाने वाले कम रेट होने के कारण बांस की कटाई ही नहीं की। गांवोंं में कहीं भी स्वास्थ केंद्र नहीं दिख पड़ रहे हैं। हालांकि लक्ष्मण के घर के आंगन में दो बुजुर्ग आमने सामने बैठ कर एक चौकड़ी बना कर कुछ मनन कर रहे हैं। पूछने पर बताया गया कि यह हमारी परंपरागत विधि है बीमारी का पता लगाने की। आंगन में ही एक बुजुर्ग आदिवासी अमिल मंडावी एक बच्चे का पेट दबा कर कुछ जानने की कोशिश कर रही हैं। ये ही क्षेत्र की सबसे बड़ी “डॉक्टर” हैं और जब डाउन टू अर्थ ने पूछा वह कहां-कहां इलाज के लिए जाती हैं तो उन्होंने बताया कि मैं तो आसपास के आठ से दस गांवों तक इलाज करने पैदल ही आती-जाती हूं।

अबूझमाड़ के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले कंदाड़ी गांव में आदिवासी बच्चे अपने घर के सामने जंगलों में लघुवनोज एकत्रित करने गए अपने मातापिता के लौटने का इंतजार करते हुए
अबूझमाड़ के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले कंदाड़ी गांव में आदिवासी बच्चे अपने घर के सामने जंगलों में लघुवनोज एकत्रित करने गए अपने मातापिता के लौटने का इंतजार करते हुए

ध्यान रहे कि वन अधिकार अधिनियम 2006 आदिवासियों समुदायों को विशेष अधिकार प्रदान करता है। लेकिन इलाके के एक मात्र पढ़े लिखे ग्रेजुएट लक्ष्मण मंडावी ने कहा कि वर्ष 2019 में जब अबूझमाड़िया समुदाय ने इन अधिकारों का दावा करने का प्रयास किया तो उन्हें माओवादी धमकियों व प्रशासनिक मदद नहीं मिली। वह कहते हैं, “यहां भी पुराने हालात बने हुए हैं।”

अबूझमाड़ के आमा टोला गांव के बुजुर्ग मंगड़ू मंडावी ने तो अपनी शोषण व्यथा की एक श्रृंखला ही गिना दी। उन्होंने कहा, “हमें तो पहले राजा-महाराजाओं ने रौंदा, फिर अंग्रेजों ने लूटा, फिर वन विभाग ने घर जलाए, फिर माओवादियों ने डराया-धमकाया और अब उद्योगपतियों द्वारा हमारा अस्तित्व ही खत्म करने की तैयारी हो रही है।” मंडावी की बात सही भी है क्योंकि गत 16 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री नेअबूझमाड़ को नक्सल मुक्त घोषित किया है। इसके बाद यहां नई सड़कें, सुविधाएं व मुख्य वन क्षेत्रों में लौह अयस्क खनन के विस्तार के माध्यम से केंद्र सरकार की कनेक्टिविटी को बढ़ाए जाने की योजना है।

अबूझमाड़ के जंगलों से निकल जब कोटरी नदी पार कर रहे थे तब एक बुजुर्ग आदिवासी महिला एक मुर्गा लिए हुए थीं। पूछने पर कहा कि इसे 4-5 सौ में बेचने की कोशिश करुंगी लेकिन हताशा भरे स्वर में कहा कि कोचिया (ब्रोकर) हमें लूट लेता है। डोंगी में ही बैठे विनीगुंडा गांव के आइतू पड्डा ने बताया कि उन्हें दसवीं 34 साल की उम्र में पास की क्योंकि गांव में स्कूल नहीं है, पखांजूर पढ़ने आया लेकिन यहां तो हिंदी बोली जाती है। मुझे इसे सीखने-पढ़ने में ही 12 साल लग गए। तब दसवीं पास की लेकिन अब शिक्षा विभाग मूल निवास प्रमाण पत्र मांग रहा है। वह कहता है, बताइए मैं यह कहां से लाऊं? अबूझमाड़ के आदिवासी इंतजार में हैं कि कब उनके लिए हर प्रकार की पाबंदियां हट पाएंगी और वे अपने ढंग से अपने जंगलों में जी पाएंगे।

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