

यह खरबों डॉलर का सवाल है कि आखिर दुनिया के सबसे गरीब लोग एक फलती-फूलती अर्थव्यवस्था से घिरे होने के बावजूद गरीबी में क्यों जीते रहते हैं?
वन क्षेत्र दुनिया की कामकाजी आबादी के लगभग 1 प्रतिशत लोगों को रोजगार देते हैं और इसकी अनुमानित वार्षिक आर्थिक कीमत 1.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है।
लेकिन प्रतिदिन 3 डॉलर से भी कम पर जीवन यापन करने वाली दुनिया की सबसे गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा इन्हीं जंगलों में निवास करता है। इससे स्पष्ट होता है कि आजीविका का स्रोत होने के बावजूद जंगल इन लोगों की गरीबी कम करने में उल्लेखनीय योगदान नहीं दे पा रहे हैं।
27 अप्रैल 2017 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने “यूएन स्ट्रैटेजिक प्लान फॉर फॉरेस्ट्स 2017-2030” को अपनाया था। इस योजना के तहत सदस्य देशों के लिए वर्ष 2030 तक, यानी अगले चार वर्षों के लिए छह वैश्विक वन लक्ष्य (ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स- जीएफजी) निर्धारित किए गए।
इनमें दूसरा लक्ष्य वन आधारित आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभों को बढ़ाना है। इस लक्ष्य के अंतर्गत पहला उपलक्ष्य (जीएफजी टारगेट 2.1) है- “जंगलों पर निर्भर सभी लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकालना।”
इसे भी अन्य वैश्विक वन लक्ष्यों की तरह वर्ष 2030 तक हासिल किया जाना है।
इन लक्ष्यों की प्रगति का आकलन करने वाली “ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026” 11 मई 2026 को जारी की गई। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र वन मंच (यूएन फोरम ऑन फोरेस्ट- यूएनएफएफ21) के 21वें सत्र के दौरान जारी हुई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि “जीएफजी लक्ष्य 2.1 अभी सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है और सभी वन-निर्भर लोगों की अत्यधिक गरीबी समाप्त करने के लिए नए और अधिक प्रभावी प्रयासों की आवश्यकता है।”
आकलन में यह भी कहा गया है,, “देशों ने इस लक्ष्य के समर्थन में कई कदम उठाने की जानकारी दी है, लेकिन वन-निर्भर लोगों की आजीविका सुधारने के संदर्भ में अब भी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।”
जीएफजी 2.1 को हासिल करना वर्ष 2030 तक दुनिया द्वारा कई महत्वपूर्ण सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने से भी जुड़ा हुआ है।
वानिकी क्षेत्र तथा उससे मिलने वाले सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ एसडीजी-1 (गरीबी उन्मूलन), एसडीजी 2 (भुखमरी समाप्त करना), एसडीजी 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता तक पहुंच), एसडीजी 7 (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा), एसडीजी 8 (सम्मानजनक रोजगार और आर्थिक विकास) और एसडीजी 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) की प्रगति को प्रभावित कर सकते हैं।
जीएफजी का यह आकलन वन-निर्भर समुदायों में गरीबी की स्थिति को समझने के लिए वैश्विक अत्यधिक गरीबी में गिरावट की दर को एक संकेतक (प्रोक्सी) के रूप में इस्तेमाल करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि, “उप-सहारा अफ्रीका, जहां बड़ी संख्या में वन-निर्भर गरीब आबादी रहती है, वहां स्थिति में बहुत कम बदलाव आया है और अत्यधिक गरीबी अब भी लगभग 46 प्रतिशत के करीब बनी हुई है।”
वहीं दूसरी ओर, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों में बढ़ती अत्यधिक गरीबी की स्थिति में “आंशिक सुधार” देखने को मिला है।
कोविड-19 महामारी के दौरान अत्यधिक गरीबी में वृद्धि हुई थी, हालांकि उसके बाद इसमें सुधार के संकेत दिखाई दिए हैं। यह दर वर्ष 2020 में 11.4 प्रतिशत से घटकर 2024 में लगभग 10.3 प्रतिशत हो गई।
जीएफजी आकलन के अनुसार, “इस सुधार में वन-आधारित आजीविका का योगदान सीमित रहा। सामुदायिक वानिकी, कृषि-वृक्षारोपण (एग्रोफॉरेस्ट्री) और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के भुगतान (पीइएस) कार्यक्रमों ने भाग लेने वाले परिवारों की आय में मामूली वृद्धि की। हालांकि यह स्थानीय स्तर पर ही रहा।”
रिपोर्ट आगे कहती है, “आंकड़े बताते हैं कि जंगल अब भी ग्रामीण आजीविका को सहारा देने और गरीबी कम करने में सीमित योगदान दे रहे हैं, लेकिन वर्ष 2020 के बाद गरीबी उन्मूलन में जंगलों के योगदान में किसी उल्लेखनीय वैश्विक वृद्धि के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते हैं।”
रिपोर्ट स्पष्ट रूप से कहती है कि गरीबी कम करने में वन क्षेत्र का योगदान इसलिए महत्वपूर्ण नहीं बन पाया क्योंकि “जंगलों से मिलने वाले आर्थिक और सामाजिक लाभों का पूरा उपयोग नहीं हो सका। इसका मुख्य कारण यह है कि लोगों की बाजार तक पहुंच नहीं है। खासकर लघु वन उपज (गैर-काष्ठ वन उत्पाद) को बेहतर बनाकर बेचने और उससे अधिक कमाई करने के अवसर बहुत कम हैं।”
दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी किसी न किसी रूप में गैर-काष्ठ वन उत्पादों का उपयोग करती है। जीएफजी आकलन में बताए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में इनका मूल्य 9.4 अरब अमेरिकी डॉलर था।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "अन्य समस्याओं में जरूरी व्यावसायिक सेवाओं की कमी, सही मानकों का अभाव और विपणन से जुड़ी दिक्कतें शामिल हैं। इसके कारण वन उत्पाद बनाने वाले लोग और समुदाय सप्लाई चेन के केवल कम मुनाफे वाले हिस्से तक ही सीमित रह जाते हैं। साथ ही, खराब बुनियादी ढांचा और परिवहन संबंधी समस्याएं लागत बढ़ा देती हैं और उत्पादकों को बाजार से दूर कर देती हैं।”
इस आकलन में कहा गया है कि वन क्षेत्र में रोजगार की हिस्सेदारी वर्ष 2011 से 2022 के बीच लगभग 3.1 प्रतिशत घट गई।