मध्य प्रदेश के डिंडोरी वनमंडल में करीब 1.5 लाख साल बोरर प्रभावित बेशकीमती साल पेड़ों को काटने की अनुमति मिलने के बाद पेड़ों की कटाई शुरू हो गई है। डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) उत्पादन भारती ठाकरे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि करीब 1.46 लाख साल बोरर प्रभावित पेड़ों में अब तक 2,000 पेड़ों की कटाई हो गई है।
उनका कहना है कि अभी बारिश हो रही है, इसलिए कम पेड़ कटे हैं। भारती ठाकरे के अनुसार, हमने अगले साल मार्च तक साल बोरर प्रभावित पेड़ों की कटाई पूरी करने का टाइम प्लान बनाया है। उन्होंने बताया कि काटे गए पेड़ों के लिए गाढ़ारसई के पास एक अस्थायी डिपो का निर्माण किया गया है।
मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) एवं नब्बे के दशक में साल बोरर प्रभावित पेड़ काटने की सिफारिश करने वाली केंद्र सरकार की समिति की रिपोर्ट में हस्ताक्षर से इनकार करने वाले तत्कालीन आईआईएफएम (भारतीय वन प्रबंध संस्थान) निदेशक राम प्रसाद पेड़ों की कटाई पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि पेड़ों की कटाई को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया है। सरकार ने बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी है, लेकिन इसमें पर्याप्त कंसल्टेशन दिखाई नहीं देता। वह बताते हैं कि पहले भी जब इस विषय पर टीमें बनाई गई थीं, तब अलग-अलग विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से बात की गई थी। इस बार भी ऐसी टीम बननी चाहिए और स्थिति का स्वतंत्र आकलन होना चाहिए।
रामप्रसाद के अनुसार, सिर्फ इसलिए कि किसी अधिकारी के पास निर्णय लेने की शक्ति है, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा निर्णय उसी स्तर पर हो जाना चाहिए। दूसरे विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से भी बात करनी चाहिए। पहले स्थिति को समझना चाहिए, जांच करनी चाहिए और उसके बाद पेड़ों की कटाई का फैसला होना चाहिए।
उनका कहना है कि अगर कटाई का निर्णय लिया गया है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि स्वतंत्र जांच किसने की, कौन-कौन लोग मौके पर गए, उन्होंने क्या देखा और उनकी रिपोर्ट क्या है। बाद में यह कहना पर्याप्त नहीं है कि जांच कर ली गई थी। जांच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक होने चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर किसी क्षेत्र में साल बोरर का इतना बड़ा प्रकोप है तो आसपास के जुड़े हुए जंगलों में भी उसका असर दिखाई देना चाहिए। अगर एक जगह बहुत अधिक प्रकोप है और दूसरी जगह उतना नहीं है, तो इसके कारणों की जांच होनी चाहिए। वहां क्या बदलाव हुआ है, वन की संरचना में क्या अंतर है और प्रकोप एक खास क्षेत्र में ही क्यों केंद्रित है, इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे।
रामप्रसाद के अनुसार, इस पूरे मामले को केवल आर्थिक नुकसान के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। निश्चित रूप से पेड़ काटकर बेचने से आर्थिक मूल्य निकलेगा, लेकिन जंगल का मूल्य केवल लकड़ी की कीमत नहीं है। अगर वन विभाग यह कहता है कि दूसरे पेड़ों को बचाने के लिए प्रभावित पेड़ों को हटाया जा रहा है, तो इसे क्लियरिंग ऑपरेशन के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इकोसिस्टम के नजरिए से तस्वीर अलग है।
उन्होंने आगे बताया कि साल का जंगल कई स्तरों यानी लेयर में विकसित होता है। इसमें तीन से पांच तक वनस्पति की अलग-अलग लेयर हो सकती हैं। नीचे छोटी वनस्पतियां और झाड़ियां होती हैं, फिर छोटे पेड़ और उसके ऊपर बड़े पेड़। लेकिन यहां बड़े पेड़ तो खड़े हैं और नीचे का हिस्सा लगभग साफ है।
इसके पीछे लगातार लगने वाली आग और अत्यधिक चराई जैसे कारण हैं। हमने इन समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं। जब जंगल का इकोसिस्टम नीचे से ऊपर तक लगातार प्रभावित होता है तो उसकी पानी को सोखने और मिट्टी को रोककर रखने की क्षमता भी कम हो जाती है। यही कारण है कि यहां मिट्टी का क्षरण बहुत ज्यादा हो रहा है।
वह सवाल उठाते हैं कि हमने निवारक उपाय क्या किए? अगर समस्या को पहले से पहचाना जा रहा था तो उसकी रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए गए? केवल प्रकोप बढ़ने के बाद पेड़ काटना समाधान नहीं हो सकता। यह भी देखना होगा कि जंगल में प्राकृतिक पुनर्जनन क्यों कम हो रहा है। जो छोटे पौधे नीचे उगते थे और पानी को रोकने में मदद करते थे, वे अब खत्म हो रहे हैं। इससे इकोसिस्टम कमजोर होता है।
उनका मानना है कि यहां का इकोसिस्टम मैनेजमेंट की प्राथमिकताओं के कारण कमजोर हुआ है। मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी पर भी सवाल उठता है। यह देखना जरूरी है कि मिट्टी और जल संरक्षण के लिए वन विभाग क्या कर रहा है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां साल बोरर का प्रकोप बार-बार सामने आता है, वहां क्या निवारक और संरक्षण संबंधी काम किए जा रहे हैं।
रामप्रसाद के अनुसार, दूसरे क्षेत्रों में पांच या पचास हेक्टेयर में काम करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जिन क्षेत्रों में समस्या बार-बार सामने आ रही है, वहां विशेष रूप से काम करने की जरूरत है। यहां जंगल धीरे-धीरे लगभग शुद्ध साल फॉरेस्ट में बदलता जा रहा है। साल के जंगल में दूसरी कई प्रजातियां भी होती हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या घटती गई है। इस बदलाव की भी जांच होनी चाहिए।