

केन्या में कई लोकप्रिय ब्रैंड के मक्के के आटे में भारी मात्रा में एफ्ला टॉक्सिन नाम के जहरीले पदार्थ की मौजूदगी का खुलासा हुआ है। मक्के का आटा केन्या के अधिकतर लोगों के मुख्य भोजन का हिस्सा है। ऐसे में यह ज्यादा चिंताजनक बात है। सवाल यह है कि देशभर में मक्के का परिष्क रण और वि तरण किस तरह से हो रहा है?
एफ्ला टॉक्सिन एक विशेष प्र कार के जहरीले तत्व हैं, जो एस्प रगि लस फ्ले वस नाम के फंगस से नि कलते हैं। यह फंगस गर्म, शुष्क परिस्थिति यों में मि ट्टी में प्राकृतिक रूप से पैदा होता है और विभिन्न प्रकार की फसलों को अपनी चपेट में ले सकता है। मक्का और मूंगफली ये वे दो फसलें हैं, जो खासतौर पर एफ्लाटॉक्सिन के संपर्क को लेकर अति संवेदनशील हैं। वहीं, एफ्लाटॉक्सिन कैंसर पैदा करने वाला तत्व है, जिस की बड़ी खुराक लोगों के लिए घातक हो सकती है। लंबे समय तक इसकी हल्की मात्रा के सेवन के अन्य स्वा स्थ्य संबंधी परिणामों का अभी तक कुछ खास पता नहीं लगाया जा सका है।
मौसम के आधार पर प्रत्येक वर्ष एफ्ला टॉक्सिन से प्रभावित होने वाली फसल की मात्रा बदलती रहती है। खेती के दौरान या तो बहुत कम बारिश (जो फंगस के संक्रमण के खिलाफ फसलों के प्राकृतिक बचाव की क्षमता को कमजोर करती है), या फिर फसल के आसपास बहुत अधिक बरसात (जिससे भंडारण से पहले फसलों को सुखाना कठिन हो जाता है), फसल में उच्च एफ्लाटॉक्सिन की मौजूदगी का कारण बन सकती है।
पौधों में पोषक तत्वों की कमी भी इसका जोखिम बढ़ा देती है, उदाहरण के तौर पर सूखे जैसी स्थिति में फसलें कमजोर हो जाती हैं और आसानी से फंगस की चपेट में आ जाती हैं। अगर फसलों का भंडारण ठीक से न कि या गया हो और उन्हें नमी मिलती रहे या फिर वे अच्छी तरह से सूखी न हों तो उनमें फफूंद की समस्या बढ़ सकती है। केन्या में छोटे किसानों द्वारा संग्रहित मक्का, खरीदे गए मक्के की तुलना में कहीं अधिक दूषित पाया
गया है और यह समय-समय पर होने वाले एफ्ला टॉक्सिन विषाक्त ता के प्र कोप की सबसे बड़ी संभावित वजह है।
केवल केन्या ही इस चुनौती से नहीं जूझ रहा, दुनि याभर के देश अनाज के एफ्ला टॉक्सिन से दूषि त होने की समस्या को झेल रहे हैं। केन्या के अलावा दक्षि णी अमेरिका, ग्वा टेमाला, भारत और चीन के कुछ हि स्से एफ्ला टॉक्सिन संदूषण के लि हाज से काफी संवेदनशील हैं।
समस्या का समाधान
केन्या में कई खाद्य प्रस ंस्क रण कंपनि यां अपने उत्पा दों को एफ्ला टॉक्सिन से दूषि त से बचाने के लि ए खरीदने से पहले मक्का जैसे उत्पा दक सामग्री का परीक्षण करती हैं, लेकि न सटीक परीक्षण कर पाना मुश्कि ल है, क्योंकि मक्के की बोरियों के स्तर पर भी एफ्लाटॉक्सिन में विविधता पाई जाती है। यहां तक कि एक बोरी के अंदर रखे मक्के के दानों के एफ्लाटॉक्सिन में भी अंतर होता है।
मक्के और मूंगफलियों की वैसी फसलें, जि नमें प्रति बिलि यन एफ्ला टॉक्सिन के क्रमश: 10 और 15 से अधिक हि स्से हों, केन्या में कानूनी रूप बेचीं नहीं जा सकतीं, लेकि न परीक्षण प्रक्रि याएं अक्स र नि यमि त तौर पर नहीं की जातीं।
वैसे भी, फैक्ट्री के गेट पर एफ्ला टॉक्सिन के परीक्षण से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जब एक कंपनी द्वारा मक्का या मूंगफली की खेप को अस्वीकार कर दिया जाता है तो इसे किसी कम कठोर नियमों वाली कंपनी को या फिर अनौपचारिक बाजार में बेच दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि सबसे सस्ता भोजन अक्सर सबसे अधिक दूषित होता है। कम से कम खर्च में गुजारा करने वाले गरीब लोग इस असुरक्षित भोजन को ग्रहण के खतरे को झेलते हैं। अनुसंधान के दौरान मैंने पाया कि केन्या में उपभोग में शामिल मक्के के एक बड़े हिस्से का एफ्लाटॉक्सिन के लिए कभी परीक्षण ही नहीं किया जाता। इसकी वजह शायद यह है कि इसकी खरीद-फरोख्त अनौपचारिक बाजार में होती है या फिर इसका उपभोग इसे उपजाने वाले कर लेते हैं।
जनता क्या करे?
केन्या में मक्के के आटे पर अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्था न के शोध से पता चला है कि महंगे ब्रां ड के आटे के एफ्ला टॉक्सि न मानक के अनुरूप होने की आशंका अधि क है। इसलि ए अधि क कीमत वा ले आटे का उपभोग करके खुद को बचाया जा सकता है। यदि आप खुद मक्का या मूंगफली उगाते हैं, तो फसलों को मि ट्टी के संपर्क में आने दिए बि ना अच्छी तरह सुखाएं और एक साफ, सूखे स्था न पर उनका संग्रहण करें। आमतौर पर मूंगफली युक्त प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ साबुत दा नों की तुलना में अधि क दूषित होते हैं। ऐसा इसलि ए है, क्योंकि क्षति ग्रस्त दा नों में एफ्ला टॉक्सिन के मौजूद होने की ज्यादा आशंका होती है और सबसे अच्छे दा नों को प्रसंस्कृत करने की बजाय साबुत बेचा जाता है। अपने उपभोग के लि ए खुद उच्च गुणवत्ता वा ली मूंगफलियों से मूंगफली का मक्खन बनाया जाए तो भी एफ्लाटॉक्सिन से बचा जा सकता है।
आखिर में मैं यह कहूंगा कि एफ्लाटॉक्सिन से बचने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण काम आप कर सकते हैं वो है एक संतुलि त आहार लेना और मक्के और मूंगफली पर अत्यधि क निर्भ रता से बचना।
कैसे खत्म हो समस्या?
एफ्ला टॉक्सिन की समस्या को जड़ से मि टाने के लि ए अधि क संसाधनों की आवश्य कता है और ये उपाय खेत पर होने चाहिए। केन्याई सरकार ने हाल ही में अफ्ला सेफ (एफ्लाटॉक्सिन पर नियंत्रण रखने वाला उत्पाद, जिसे किसान खेतों में लगी हुई फसलों पर छिड़कते हैं) पर 200 मिलियन केन्याई शिलिंग खर्च करने की योजना की घोषणा की है। यह एक बेहतरीन खबर है, लेकिन इसे कारगर बनाने के लिए किसानों को इसे सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित करना बहुत जरूरी है।
प्लास्टिक की चादरों पर फसलों को सुखाने, भंडारण से पहले फफूंद लगे हुए या क्षति ग्रस्त फसलों को अलग करने और भली-भांति सूखने वा ली फसलों को हवा -बंद बोरों में रखने करने जैसी अन्य पद्धतियां भी एफ्लाटॉक्सिन को कम करने में बहुत प्रभावी हैं। 15 वर्ग मीटर की प्लास्टिक की चादर लगभग 400 केन्याई शिलिंग (लगभग 4 यूएस डॉलर) में उपलब्ध है। इसकी कई मौसमों तक काम में आ सकने की खूबी इसे सबसे अधिक किफायती समाधानों में से एक बनती है। विशेष गैर-खाद्य उपयोगों के लिए दूषित अनाज के इस्तेमाल को वैध बनाने के लिए केन्या के एफ्लाटॉक्सिन विनियमन में भी बदलाव की आवश्यकता है। मक्के के लिए केन्या पूर्वी अफ्रीकी मानक का अनुसरण करता है, जि सके अनुसार मक्के की सभी फसलें, चाहे वो किसी भी इस्तेमाल में लाई जाती हों, के लिए एफ्लाटॉक्सिन की एक ही सीमा निर्धारित है। इस मानक के हिसाब से मक्के की किसी भी इस्तेमाल में लाई जाने वाली फसल के लिए एफ्लाटॉक्सिन की एक ही सीमा निर्धारित है।
चूंकि एफ्लाटॉक्सिन चारे से मांस में बहुत कम मात्रा में पहुंचता है इसलिए, जिन फसलों को मानव उपभोग के लिए असुरक्षित माना जाता है, उनका मांस के लिए पाले जा रहे जानवरों के चारे में आराम से इस्तेमाल किया जा सकता है। संयुक्त राज्य और यूरोपीय संघ के सदस्यों सहित कई देशों में मांस के लिए पाले जा रहे पशुओं के चारे में काफी ज्यादा , यहां तक कि केन्याई सीमा से 30 गुना अधिक, एफ्लाटॉक्सिन स्वीकृत है। मानव उपभोग के लिए निर्धारित सीमा से अधिक एफ्लाटॉक्सिन वाले खाद्य पदार्थ को मांस के लिए पाले जा रहे पशुओं को खिलाने की अनुमति देना, इस जहर को खाद्य आपूर्ति से बाहर निकालने का एक तरीका है।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान में अर्थशास्त्री हैं। यह लेख द कन्वरसेशन से विशेष समझौते के तहत प्रकाशित किया गया है)