Narasimha Reddy Donthi
नरसिम्हा रेड्डी डोंथी सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ हैं और पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क इंडिया में सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं

भारत में राष्ट्रीय खाद मिशन की जरूरत

वर्तमान में रासायनिक उर्वरकों की जिम्मेदारी तो सरकार उठाती है, लेकिन मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति को काफी हद तक उसके हाल पर छोड़ दिया गया है
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भारत हर साल रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी पर ₹1.68 लाख करोड़ रुपए खर्च करता है, जबकि जैविक उर्वरकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ ₹150 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। यह कुल खर्च का 0.1 प्रतिशत से भी कम है। यह असंतुलन काफी कुछ कहता है। रासायनिक उर्वरता की गारंटी तो सरकार लेती है, लेकिन मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति को काफी हद तक उसके हाल पर छोड़ दिया गया है। यह अनदेखी तब और चौंकाती है, जब इतने बड़े पैमाने पर संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद उनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। भारत में गाय-भैंसों और अन्य पशुओं से हर साल 160 करोड़ टन से ज्यादा गोबर पैदा होता है, जिसमें से लगभग 57 करोड़ टन को इकट्ठा करके खाद बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

यहां हर साल लगभग 6.2 करोड़ टन शहरी ठोस कचरा निकलता है। इसमें से करीब आधा जैविक यानी गलने वाला कचरा होता है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, इस कचरे से 54 लाख टन शहरी कंपोस्ट तैयार की जा सकती है। लेकिन हकीकत यह है कि अभी हम सिर्फ 2 लाख टन खाद ही बना पा रहे हैं। करीब 700 खाद प्लांट, जिनकी कुल क्षमता 1.89 करोड़ टन है, अपनी पूरी क्षमता से काफी कम पर काम कर रहे हैं। समस्या तकनीक की नहीं है। नए और तेज तरीकों से अब सिर्फ 4 से 8 हफ्तों में खाद तैयार की जा सकती है।

देश में कच्चा माल भी उपलब्ध है और बुनियादी ढांचा भी है। कमी है तो बस स्पष्ट नीतियों और इच्छाशक्ति की। “राष्ट्रीय खाद मिशन” के जरिए मौजूदा प्लांट की क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना और सभी बड़े शहरों में गीले कचरे को अलग करना अनिवार्य करना होगा। इसके साथ ही गोबर के निर्यात पर लगाम लगाने जैसे कड़े फैसले भी लेने होंगे। सबसे जरूरी है खाद को सब्सिडी के दायरे में लाना, ताकि किसानों को इसे अपनाने का ठोस आर्थिक आधार मिले, जो वर्तमान में नदारद है।

खरीफ सीजन के ठीक पहले का यह समय इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए सबसे अनुकूल है। सिर्फ खाद या तकनीक बदलना काफी नहीं होगा। इन प्रयासों के साथ फसलों में विविधता लाना भी उतना ही जरूरी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद के दायरे को बढ़ाकर उसमें मृदा-संवर्धक फसलों, दालों और नाइट्रोजन-स्थिरीकरण करने वाली फसलों को शामिल करना खेती के भविष्य को बदल सकता है। लागत पर दी जाने वाली सब्सिडी में अक्सर भ्रष्टाचार की गुंजाइश रहती है, जबकि इसके उलट उपज आधारित खरीद सीधे किसान को उसकी मेहनत का फल देती है। यह रणनीति खाद के इस्तेमाल को भी अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करती है। उदाहरण के तौर पर, जैसे-जैसे धान की खेती का रकबा कम होगा, पराली जलाने की समस्या भी खुद ही घटेगी। यह धान से जुड़ी एक ऐसी चुनौती है जो तमाम दंडात्मक कार्रवाइयों के बावजूद अब तक बेअसर रही है।

अगर फसलों में विविधता लाने के लिए कदम तेजी से उठाए जाएं तो यूरिया की किल्लत को लेकर किसानों की बेचैनी अगले ही सीजन से दूर हो सकती है। सरकारी प्रोत्साहनों में यह बुनियादी बदलाव मिट्टी की उर्वरता में सुधार आने से पहले ही किसानों के व्यवहार और खेती के तरीकों में सकारात्मक परिवर्तन लाना शुरू कर देगा।

(नरसिम्हा रेड्डी डोंथी सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ हैं और पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क इंडिया में सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं)

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