आहार संस्कृति: सरसों के पीले फूलों की थाली तक यात्रा, चटनी की खुशबू और खेतों की विरासत

बसंत में खेतों में छा जाने वाली सरसों के फूल भोजन में शामिल करने लायक एक अद्भुत खाद्य सामग्री है
आहार संस्कृति: सरसों के पीले फूलों की थाली तक यात्रा, चटनी की खुशबू और खेतों की विरासत
फोटो: विभा वार्ष्णेय/सीएसई
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वसंत ऋतु में सरसों के लहलहाते खेत एक ऐसा नजारा पेश करते हैं जिसे शब्दों में कह पाना मुश्किल है। अमीर खुसरो की सरसों के खेतों पर लिखी प्रसिद्ध पंक्तियां (सकल बन फूल रही सरसों…...) भी प्रत्यक्ष नजारे के सामने फीकी लगती हैं। सरसों के खेत में आप सिर्फ रंग नहीं देखते, उसे महसूस करते हैं। ये फूल जितने सुंदर दिखते हैं, खाने में उतने ही स्वादिष्ट भी होते हैं। इनका स्वाद हल्का तीखा (मिर्च जैसा) होता है और मसलने पर सरसों की विशिष्ट खुशबू आती है।

पश्चिम बंगाल के कोलकाता की गृहिणी मौसुमी दास ने सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की “माय फूड स्टोरी” रेसिपी प्रतियोगिता में सरसों के फूल की चटनी की रेसिपी साझा की। इस प्रतियोगिता में प्रतिभागियों को सर्दियों के विशेष व्यंजन साझा करने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने बताया कि यह चटनी उन्हें ग्रामीण बंगाल की सादगी और गर्माहट की याद दिलाती है, जहां भोजन कुदरत की गहराई से जुड़ा होता है। उन्हें इस चटनी में स्वादों का संतुलन बहुत पसंद है। सरसों के फूलों की हल्की कड़वाहट, हरी मिर्च का तीखापन, गुड़ की सौम्य मिठास और कच्चे सरसों के तेल की अनोखी खुशबू, इसे खास बनाती है। यह चटनी गरम भात (चावल) के साथ बेहद स्वादिष्ट लगती है (देखें, रेसिपी)। इन फूलों को कच्चा या पकाकर दोनों तरह से खाया जा सकता है। ये इतने सुंदर होते हैं कि सजावट के लिए प्लेट पर साबुत छिड़कने पर भी बेहद आकर्षक लगते हैं।

सरसों पौधों की ब्रासिका वंश से संबंध रखती है, जो ब्रासिकेसी परिवार के अंतर्गत आती है। यह एक बड़ा पौधा परिवार है, जिसमें लगभग 350 वंश और 3,500 से अधिक प्रजातियां शामिल हैं। इस सरसों परिवार में कई महत्वपूर्ण खाद्य फसलें आती हैं, जैसे पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकली, केल, शलजम और मूली।

ब्रासिका वंश में कई कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं। ब्रासिका जुनसिया (भारतीय सरसों या ब्राउन मस्टर्ड) भारत में सबसे अधिक उगाई जाने वाली सरसों की किस्म है। इसके बीज भूरे रंग के होते हैं और मुख्य रूप से इसे तिलहन फसल के रूप में उगाया जाता है। सर्दियों में इसकी कोमल हरी पत्तियां सब्जी के रूप में खाई जाती हैं, लेकिन फूल आने के बाद यह प्रथा आमतौर पर बंद हो जाती है क्योंकि तब पौधा बीज बनाने में ऊर्जा लगाने लगता है। यही कारण है कि फूलों का उपयोग व्यंजनों में कम होता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भरतपुर स्थित सरसों अनुसंधान संस्थान के अनुसार, तिलहन फसलों के रूप में सरसों की खेती में आठ प्रमुख प्रजातियां और रूप शामिल हैं। भारतीय सरसों, तोरिया और पीली सरसों, भूरी सरसों, गोभी सरसों, करन राई, काली सरसों और तारामीरा इनमें शामिल हैं।

जहां एक ओर भारत में ब्रासिका जुनसिया प्रमुख है, वहीं अब कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भी इसका महत्व बढ़ रहा है। वहां इसे रेपसीड (ब्रासिका नेपस) के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यह सूखा, गर्मी और कुछ कीटों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के अनुसार, भारत में 2025-26 में रेपसीड-सरसों की खेती लगभग 87.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की गई।

सरसों के फूल गुच्छों में खिलते हैं जिन्हें अम्बल कहा जाता है और हर छोटा फूल मुश्किल से एक सेंटीमीटर व्यास का होता है। ये नाजुक फूल ताजा ही सबसे अच्छे लगते हैं। कली बनने से पूर्ण खिलने तक इन्हें लगभग 10 से 15 दिन लगते हैं। एक फूल लगभग 3 से 7 दिन तक खिला रहता है। 2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंस एंड नेचर में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, फूल आने की पूरी अवधि लगभग 38 दिनों की होती है।

ताजा उपयोग के अलावा सरसों के फूलों को सुखाकर पीस कर मसाले की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है, कुछ हद तक सरसों पाउडर की तरह। ये फूल पार्सले, तुलसी, लेमनग्रास और पुदीना जैसी जड़ी-बूटियों के साथ तथा जीरा, सौंफ और धनिया जैसे मसालों और खट्टे फलों के साथ अच्छी तरह मेल खाते हैं। हालांकि, यह भारत की इतनी महत्वपूर्ण फसल है कि इसके फूल के रासायनिक संघटन या पोषण मूल्य पर बहुत कम शोध उपलब्ध है।

ब्रासिका प्रजातियां मानव द्वारा शुरू की गई सबसे शुरुआती फसलों में शामिल हैं। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इनकी खेती लगभग 5000 ईसा पूर्व से की जा रही थी। हड़प्पा सभ्यता से जुड़े स्थलों, जैसे मोहनजोदड़ो से इनके बीज मिले हैं, जो दक्षिण एशिया की कृषि में इनके लंबे इतिहास को दर्शाते हैं।

ब्रासिका जुनसिया की उत्पत्ति को लेकर लंबे समय तक बहस जारी रही, लेकिन अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि यह काली सरसों (ब्रासिका निगरा) और पीली सरसों (ब्रासिका रापा) के प्राकृतिक संकरण से बनी है। आनुवंशिक, जैव-रासायनिक और आणविक प्रमाण बताते हैं कि यह संकरण एक से अधिक भौगोलिक क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से हुआ जिनमें भारत भी शामिल है।

संस्कृत में सरसों के बीज को सर्षप कहा जाता है। हिंदू और बौद्ध तांत्रिक परंपराओं में सरसों के बीजों का उपयोग नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए अनुष्ठानों में किया जाता रहा है। बसंत पंचमी का पर्व पीले सरसों के फूलों के खिलने का उत्सव भी है। अब यह फसल खतरे में है क्योंकि इनकी जेनेटिकली मोडिफाइड किस्म तैयार कर ली गई है और वह असली सरसों की जगह ले सकती है। तब भी फूल तो पीले ही रहेंगे पर बाकी सब बदल जाएगा।

व्यंजन : सरसों के फूल की चटनी

सामग्री

  • सरसों के फूल: 1 कप (अच्छी तरह धोए हुए)

  • हरी मिर्च: 2–3

  • सरसों के बीज का पेस्ट: 1 बड़ा चम्मच

  • कद्दूकस किया नारियल: 2 बड़े चम्मच

  • इमली का पानी: 1-2 बड़े चम्मच

  • (या नींबू का रस)

  • नमक, चीनी या गुड़ स्वादानुसार

विधि: फूलों को थोड़ा-सा पानी और चुटकी भर नमक डालकर 2-3 मिनट उबाल लें, फिर कड़वाहट कम करने के लिए पानी निकाल दें। उबले फूल, हरी मिर्च, सरसों का पेस्ट और नारियल को पीसकर चिकना पेस्ट बना लें। इसमें नमक, चीनी अथवा गुड़ और इमली का पानी मिलाएं। अंत में ऊपर से कच्चा सरसों का तेल डालकर अच्छी तरह मिलाएं। इसे गरम चावल के साथ परोसें।

लेखिका पाठकों को साधारण सी दिखने वाले रोटी के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराती हैं। वह रोटी से जुड़ी अपने बचपन की यादें साझा करती हैं। उन्होंने 90 से अधिक स्वादिष्ट रेसिपी भी पेश हैं जो रोटी को एक आकर्षक, खास व्यंजन में बदल देती हैं।

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