
चीनी नॉटवीड को असमिया भाषा में मधु सोलेंग के नाम से जाना जाता है और भले ही यह एक खरपतवार है, लेकिन इसका स्वाद निराला है। मधु सोलिंग सोलेंग के पत्ते खट्टे होते हैं और कच्चे पत्तों का उपयोग आमतौर पर सलाद बनाने के लिए किया जाता है। 2007 में प्रकाशित “वाइल्ड एडीबल प्लांट्स ऑफ असम” नामक किताब में ब्रह्मानंद पतीरी और अनंत बोरा ने लिखा है कि पत्ते मछली के साथ स्वादिष्ट लगते हैं और अच्छे से मेल खाते हैं। रचनात्मक रसोइये इन पत्तों का उपयोग दाल, करी, चटनी और यहां तक कि अचार बनाने के लिए भी कर सकते हैं।
यह पौधा आमतौर पर आक्रामक (इनवेसिव) माना जाता है। असम के चाय बागानों में ये पौधे चाय की झाड़ियों को ढक सकते हैं और जल निकासी को ब्लॉक कर सकते हैं। इसका आक्रामक स्वभाव महाराष्ट्र के कास पठार रिजर्व फॉरेस्ट जैसे संरक्षित क्षेत्रों में भी चिंता का विषय है। यह क्षेत्र मॉनसून सीजन में अगस्त से अक्टूबर के दौरान नीलकुरिंजी के सामूहिक रूप से फूलने के लिए प्रसिद्ध है। पर इसका यह आक्रामक स्वभाव इसे उगाने में आसान बनाता है। दिल्ली में रहने वाली खाद्य और पोषण विशेषज्ञ व जंगली खाद्य पदार्थों की पैरोकार संगीता खन्ना कहती हैं कि यह पौधा उनके बगीचे में अच्छे से उग रहा है। इसे वह कुछ वर्ष पहले असम से लाई थीं। मैंने भी कुछ शाखाएं उनके बगीचे से लीं और उन्हें एक फूलदान में रख दिया। एक सप्ताह के भीतर कटे हुए हिस्सों के पास जड़ें साफ दिखाई दे रही थीं और वे टहनियां अच्छी तरह से बढ़ने लगीं।
इस पौधे का 2012 में प्रकाशित “ग्लोबल कम्पेडियम ऑफ वीड्स” में उल्लेख है। यह तेजी से बढ़ता है और विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों को आराम से सहन कर लेता है। इसकी वृद्धि दर अधिक है और यह बीज और तनों के माध्यम से आसानी से फैल सकता है। इसकी खरपतवार जैसी विशेषता के कारण यह जलवायु संकट से प्रभावित दुनिया में जरूरी खाद्य सामग्री बन सकता है।
यह लताओं वाला एक सदाबहार पौधा है जो 1 मीटर तक बढ़ सकता है। बेरी जैसे इसके फल भी खट्टे होते हैं। यह भारत के विभिन्न हिस्सों में आसानी से उगता है और समुद्र स्तर से लेकर 3,000 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह अनुकूलित हो जाता है। मणिपुरी में इसे अंगोम येंसिल, मराठी में पैराल, मलयालम में पूवल्लिकोडी, कन्नड़ में सोराले, तेलुगू में मल्ले मुत्यम और मिजो में ताहम कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम पर्सिकेरिया चिनेंसिस है। इस नाम का मोटे तौर पर अर्थ है कि यह पौधा चीन से है और इसके पत्ते आड़ू जैसे हैं।
मधु सोलेंग के पत्तों को 4 से 5 दिन तक फ्रिज में संग्रहीत किया जा सकता है। फूल और बीज भी खाने योग्य होते हैं, लेकिन ये मॉनसून के मौसम में कुछ ही दिनों के लिए उपलब्ध होते हैं। संगीता खन्ना कहती हैं कि वह इसे खटाई की जगह प्रयोग करने का सुझाव देंगी क्योंकि यह एक एंटी-इंफ्लेमेटरी है और आंतों के स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है। खन्ना आमतौर पर इसे दाल में टमाटर या कच्चे आम के बदले डालती हैं। वह पत्तों का उपयोग असमिया पारंपरिक व्यंजन “फिश तेंगा” बनाने में भी करती हैं।
इसके पत्ते न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि इनमें कई औषधीय गुण भी होते हैं। इन्हें स्कर्वी के इलाज और घावों को ठीक करने के लिए खाया जाता है। कर्नाटक के मालनाड क्षेत्र में नरम पत्तों का नियमित रूप से उपयोग मॉनसून के दौरान अपच, सामान्य सर्दी और फ्लू के इलाज के लिए किया जाता है।
पारंपरिक चीनी चिकित्सा पद्धतियों में पत्तों के अर्क का उपयोग कानों की खुलजी (एक्जिमा) और आंखों की बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। पत्तियों का पेस्ट पेट दर्द को दूर करने के लिए अक्सर पेट पर लगाया जाता है। सूखे पत्तों का काढ़ा फुंसी और दस्त के इलाज के लिए उपयोगी माना जाता है। यहां तक कि सांप के काटने का इलाज ताजे पत्तों का रस पीने से किया जा सकता है। इसे प्लास्टर के तौर पर भी उपयोग में लाया जाता है। दक्षिण कोरिया और बांगलादेश के शोधकर्ताओं ने इस पौधे के मेथानोलिक अर्क के सूजन-रोधी प्रभाव का अध्ययन किया। जब चूहों को मेथानोलिक अर्क दिया गया, तो सूजन में कमी देखने को मिली। लेखक कहते हैं कि यह मेथानोलिक अर्क एक एंजाइम्स को दबाता है, जो सूजन का कारण हैं। यह अध्ययन जर्नल ऑफ एथनोफार्माकोलॉजी में जनवरी 2015 में प्रकाशित हुआ।
एक अन्य अध्ययन में भारतीय बोटैनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पौधों के रासायनिक विभाग के शोधकर्ताओं ने 5 जंगली पौधों में से इस पौधे के एंटीऑक्सिडेंट और हाइड्रोजन पेरोक्साइड प्रेरित डीएनए क्षति संरक्षण गतिविधि का मूल्यांकन किया। उन्होंने पाया कि पर्सिकेरिया के पानी में बने अर्क में ऐसे अम्ल होते हैं और यह डीएनए क्षति को रोकने में प्रभावी होता है। यह अध्ययन फूड कैमिस्ट्री एडवांसेस में अक्टूबर 2022 में प्रकाशित हुआ।
सामग्री
उड़द की दाल: ½ कप
मधु सोलिंग पत्ते: 2 कप (कटे हुए)
हल्दी पाउडर: ½ चम्मच
सरसों: ½चम्मच
साबुत लाल मिर्च: 1
लहसुन: 4-5 कलियां
नमक स्वादानुसार
बोरा को तलने के लिए तेल
चीनी का एक चुटकी
विधि: दाल को 2-3 घंटे तक पानी में भिगोकर रखें। पानी निकालकर दाल को नमक और मिर्च डालकर पीस लें। एक पैन में तेल गर्म करें और बोरा को तल लें। दूसरे पैन में थोड़ा सरसों का तेल गर्म करें, उसमें सरसों के बीज, लहसुन, हल्दी पाउडर, मिर्च और नमक डालें। कटे हुए मधु सोलिंग पत्तों को डालें। एक चुटकी चीनी डालें और 5 मिनट तक पकाएं। अब एक गिलास पानी डालें और उबलने के लिए छोड़ दें। फिर बोरा को इसमें डालकर कुछ मिनट पकने दें। इसे पके चावल के साथ परोसें।
किताब उपेक्षित खेती-किसानी और अन्नदाताओं की रोजमर्रा की परेशानियों का लेखा जोखा है। लेखक ने आजादी से पहले और बाद की स्थिति पर भी विहंगम दृष्टि डाली है