2030 तक 51 से 52 करोड़ लोगों को करना पड़ सकता है भुखमरी का सामना, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों में सुधार के बावजूद दुनिया के 64.5 करोड़ लोग अब भी भूख से प्रभावित है। संघर्ष, महंगी ऊर्जा-उर्वरक और जलवायु घटनाएं सुधार की रफ्तार धीमी कर रही हैं
फाइल फोटो: सोमा बसु/सीएसई
फाइल फोटो: सोमा बसु/सीएसई
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दुनिया में भूख से जूझ रहे लोगों की संख्या लगातार तीसरे साल कम हुई है। यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर हालात में सुधार हो रहा है। लेकिन, इस सुधार की रफ्तार अभी भी धीमी है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, अगर मौजूदा चुनौतियां बनी रहीं तो वर्ष 2030 तक भी करोड़ों लोग भूख का सामना करते रहेंगे।

संयुक्त राष्ट्र की पांच एजेंसियों खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ), इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट (आईएफएडी ), संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2026 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया की 7.8 प्रतिशत आबादी यानी करीब 64.5 करोड़ लोग भूख से प्रभावित रहे।

यह संख्या 2024 की तुलना में लगभग 1.4 करोड़ और 2022 की तुलना में 4.3 करोड़ कम है। यह निरंतर तीसरा वर्ष है जब वैश्विक भूख में गिरावट दर्ज की गई है।हालांकि, यह सुधार दुनिया के सभी हिस्सों में समान नहीं है।

रिपोर्ट बताती है कि एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भूख की स्थिति में लगातार सुधार हुआ है, हालांकि अफ्रीका अब भी सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बना हुआ है। यहां लगभग 30.9 करोड़ (309 मिलियन) लोग भूख का सामना कर रहे हैं। जहां करीब 20 फीसद आबादी आज भी पर्याप्त भोजन नहीं जुटा पा रही है।

तेजी से बढ़ती आबादी के कारण अफ्रीका में भूख की चुनौती और गंभीर होती जा रही है। इसके अलावा रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2025 में दुनिया के लगभग 2.1 अरब लोग ऐसे थे जिन्हें कभी न कभी भोजन की मात्रा या गुणवत्ता से समझौता करना पड़ा। यानी कई परिवारों को या तो कम खाना पड़ा या फिर पौष्टिक भोजन की जगह सस्ता और कम पोषण वाला भोजन चुनना पड़ा।

यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कम जरूर हुई है, लेकिन अभी भी कोविड-19 महामारी से पहले के स्तर से अधिक है। संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां इस सुधार को धीमा कर सकती हैं।

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष, ऊर्जा और उर्वरकों की बढ़ती कीमतें,अल नीनो जैसी घटनाएं आने वाले वर्षों में खाद्य संकट को और बढ़ा सकती हैं। जिससे वर्ष 2030 तक भी 51 से 52 करोड़ लोग भूख से जूझते रह सकते है।

रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में युवाओं में मोटापे की दर लगातार बढ़ रही है। 2012 जो दर 12.1 प्रतिशत था वह 2024 में 16.1 प्रतिशत हो गया। साथ ही छह महीने से दो साल तक के केवल 30.8 प्रतिशत बच्चों को ही न्यूनतम विविध आहार मिल पा रहा है, जबकि 15 करोड़ बच्चे ठिगनापन (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं। स्वस्थ भोजन की बढ़ती कीमत भी एक बड़ी चुनौती है। 

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