“गुनहगार पीढ़ी का हिस्सा हैं हम”
आपकी फिल्मों में पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों को लेकर एक सजग चुनाव दिखता है। आपको इन विषयों की ओर क्या खींचता है?
मेरी सिनेमा की दुनिया मेरे अपने जीवन के साथ धीरे-धीरे गढ़ी गई है। जीवन के पहले दस-ग्यारह साल मैंने एक गांव में बिताए, जहां जिंदगी बहुत साधारण थी। वहां न पक्की सड़कें थीं, न हवाई अड्डे और न ही रेल लाइन। लगभग बारह साल का था जब मैंने पहली बार डीजल या पेट्रोल की गंध महसूस की। प्रकृति लगभग अछूती थी। बीस तीस साल के भीतर मैंने देखा कि वही दुनिया कैसे तेज रफ्तार गाड़ियों से भरे शहरों में बदल गई, जिनमें हम आज रहते हैं।
साल 2005 में हिंदुस्तान टाइम्स में मैंने सतभाया के एकमात्र हैंडपंप की तस्वीर देखी। ओडिशा के भीतर कनिका राष्ट्रीय उद्यान में स्थित सतभाया ग्राम पंचायत कभी सात गांवों का समूह हुआ करती थी। इन गांवों में से लगभग सभी गांव समुद्र में समा चुके थे। बस एक गांव का छोटा सा हिस्सा बचा था, जहां वह हैंडपंप खड़ा था। उस तस्वीर ने मुझे भीतर तक बेचैन कर दिया और तेजी से बदलते पर्यावरण के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।
मुझे लगा कि अब जीवन के बुनियादी तत्वों पर कहानियां कहने की जरूरत है। यही वजह है कि पानी, हवा और आग मेरे लिए सिर्फ विषय नहीं रहे, वह भावनाएं बन गए।
सतभाया में समुद्र द्वारा हो रहा तट कटाव इतना डरावना था कि मैं लगातार इन गांवों को देखने समझने लगा। 2005 में वहां तीन गांव ही बचे थे। हमने स्थानीय लोगों, सरकारी अधिकारियों और वैज्ञानिकों से बात की, ताकि इस संकट की वजह समझी जा सके। इसी प्रक्रिया से मेरी डॉक्यूमेंट्री फिल्म “क्लाइमेट्स फर्स्ट ऑर्फन” बनी। मैं फिल्में इसलिए बनाता हूं क्योंकि मुझे भीतर से चोट पहुंचती है। और इसलिए भी क्योंकि मुझे लगता है कि जिन पीढ़ियों ने इन पारिस्थितिक तंत्रों को नष्ट किया, उनमें मैं भी शामिल हूं। यह हमने किया है।
क्या आपकी किसी फिल्म का कोई दृश्य किसी ऐसे असली अनुभव या घटना से प्रेरित है जिसने आप पर गहरी छाप छोड़ी हो?
मेरी फिल्मों के ज्यादातर दृश्य किसी न किसी रूप में मेरे अपने अनुभवों से ही निकले हैं। लेकिन कड़वी हवा का एक दृश्य ऐसा है, जिसका जिक्र मैं खास तौर पर करना चाहूंगा। यह एक क्लासरूम का दृश्य है, जहां शिक्षक बच्चों से मौसमों की गिनती करने को कहते हैं। बच्चे आपस में बहस करने लगते हैं। कोई कहता है मौसम एक है और कोई दो व कोई तीन। बच्चों को उलझन में देखकर शिक्षक उन्हें डांटते हैं और कहते हैं कि किताब में साफ लिखा है कि चार मौसम होते हैं। लेकिन कुछ बच्चे अड़े रहते हैं कि अब सिर्फ दो ही मौसम हैं। गर्मी और मॉनसून। अगले दृश्य में कक्षा की एक लड़की घर आकर यह पूरी बात अपने दादाजी को सुनाती है। दादाजी फिल्म के मुख्य पात्र हैं और वो यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि अब हम सच में सिर्फ दो ही मौसम महसूस करते हैं।
यह दृश्य मेरे अपने बेटे के साथ हुई बातचीत से प्रेरित था, जब वह आठ या नौ साल का था। उस समय वह स्प्रिंटर था और हम दिल्ली में रहते थे। एक बार डॉक्टर ने हमें बताया कि शहर की प्रदूषित हवा के कारण अब वह दौड़ नहीं सकता क्योंकि इससे उसके फेफड़ों को नुकसान होगा। मेरा बेटा यह सुनकर टूट गया। उसने मुझसे पूछा कि क्या आपको भी बचपन में ऐसी पाबंदियां झेलनी पड़ी थीं। उसी पल मुझे समझ आया कि जो हवाएं कभी जीवन देने वाले मौसम लेकर आती थीं, आज वही हवाएं एक अभिशाप बन गई हैं। और यह सब हमने खुद किया है।
फिल्मों ने आपको निजी तौर पर कैसे बदला है?
मेरी फिल्में पर्यावरण के नुकसान से जुड़ी भावनाओं के बारे में हैं। मैं कार्बन फुटप्रिंट या कचरे के ढेर जैसे कच्चे आंकड़े दिखाने के बजाय स्थानीय लोगों के साथ जुड़ना पसंद करता हूं और उनकी कहानियां सामने लाता हूं। लेकिन इस रास्ते में कई विरोधाभास हैं, जिनसे मैं खुद जूझता हूं। हम ऐसी खूबसूरत फिल्में बनाते हैं जो लोगों को हंसाती हैं, रुलाती हैं और सोचने पर मजबूर करती हैं, लेकिन फिल्म बनाना खुद पर्यावरण पर बहुत बड़ा बोझ डालता है। सच कहूं तो यह उलझन पैदा करता है। मेरी फिल्मों के विषय भी बेचैन करने वाले हैं। कई बार मुझे लगता है कि मैं अंधों को पढ़ने का चश्मा बेच रहा हूं। यानी चाहे मैं जागरुकता फैलाने के लिए कितनी भी कोशिश कर लूं, अगर हम अपनी आदतें और जीवनशैली नहीं बदलते तो यह सब नाकाफी होगा।
पर्यावरण के क्षरण का कौन सा पहलू आपको सबसे ज्यादा परेशान करता है?
मुझे अपने आसपास दिखने वाली बर्बादी सबसे ज्यादा परेशान करती है। हम एक ऐसी उपभोक्तावादी दुनिया में रहते हैं, जहां हर चीज इस तरह बनाई जाती है कि उसे जल्दी फेंक दिया जाए। बार-बार बदला जाए और लगातार अपग्रेड किया जाए। मसलन, मोबाइल फोन को ही देख लीजिए। हर साल या दो साल में उसका नया मॉडल आ जाता है। वही फोन, बस कुछ छोटे बदलावों के साथ और वही लोग लाइन में खड़े होकर उसे खरीदते हैं। सोचिए, यह सिलसिला कितना अंतहीन है।
हम तकनीक के असली इस्तेमाल से दूर होते जा रहे हैं और उसे फैशन का हिस्सा बना रहे हैं। इससे जो कचरा बढ़ रहा है, वह और भी चिंता की बात है। चाहे वह पैकेजिंग हो या बड़ी कंपनियों के कपड़ों पर लगे कई कई टैग। जब मैं अपने गांव को याद करता हूं तो सब कुछ कितना अलग लगता है। मुझे पहला जूता सत्रह साल की उम्र में मिला था और वह करीब पांच साल तक चला। हम बिना बर्बादी के जीते थे। खाने की बर्बादी तो होती ही नहीं थी। मैं परिवार में सबसे छोटा था और कई साल तक दूसरों के पुराने कपड़े पहनता रहा। आज यह सब कल्पना से बाहर लगता है। और मुझे साफ दिखता है कि जरूरत पर टिकी हमारी पुरानी जिंदगी आज की उपभोक्ता आधारित दुनिया से कहीं ज्यादा खुशहाल थी।
क्या आपको लगता है कि पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी फिल्मों ने किसी तरह का बदलाव लाने में मदद की है?
जागरुकता एक मंद गति से चलने वाली प्रक्रिया है। कम से कम अब मुझे यह दिखता है कि लोग इन विषयों से जुड़ने लगे हैं। वह मेरी कही कहानियों और सामने रखे विचारों को समझ रहे हैं। दरअसल बातचीत की शुरुआत ऐसे ही होती है।
मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था। मेरा बड़ा भाई जब भी घर आता और जाते वक्त मेरी चारपाई के पास एक किताब रख देता और कहता, “एक दिन यह किताब काम आएगी।” अचानक छह महीने बाद मैंने वह किताब उठाकर पढ़ना शुरू कर दिया। इसलिए मेरा तरीका बहुत सीधा है। लगातार बात करते रहो और कहते रहो। किसी न किसी दिन समझ आएगी, चेतना बनेगी और फिर बदलाव होगा।

