छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साव
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साव

"आदिवासी अस्मिता विकास की नींव"

डाउन टू अर्थ के अनिल अश्विनी से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साव की बातचीत
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आदिवासी समुदाय मुख्यधारा की राजनीति में अभी भी अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर पाए हैं। वर्चस्ववादी शक्तियां हीं उनके लिए नीतियां निर्धारित करती हैं। नक्सलवाद प्रभावित इलाकों के आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आपकी क्या योजना है?

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यह बिल्कुल ही तथ्यहीन बात है कि आदिवासी समुदाय मुख्यधारा की राजनीति में अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर पाए हैं। आपको पता है कि देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु आसीन हैं, वे आदिवासी समाज की हैं। जिन पर सभी को गर्व है। मैं भी आदिवासी समाज से हूं और मुख्यमंत्री हूं। तब यह कहना गलत है कि आदिवासी समुदाय राजनीति में अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर पाया है। देश के प्रधानमंत्री ने आदिवासी समुदाय को केवल योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माता के रूप में स्थापित किया है। आदिवासी अस्मिता ही विकास की नींव है। इसलिए हम उनके पर्व, परंपरा और जीवन-मूल्यों को नीति का हिस्सा बना रहे हैं।

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एक नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री के बस्तर दौरे के कई निहितार्थ निकाले गए हैं। केंद्र सरकार ने बस्तर के लिए 14,260 करोड़ की परियोजनाओं का एलान किया है। प्रधानमंत्री का दौरा और परियोजनाओं का एलान क्या इस बात का प्रतीक है कि यहां अब सरकार का शासन स्थापित हो चुका है। क्या सत्ता पक्ष के दावों के अनुसार लाल आतंक, हरे विकास में तब्दील होगा?

A

प्रधानमंत्री का छत्तीसगढ़ के प्रति जो विशेष लगाव और आत्मीयता है वह आज से नहीं है। जब वह संगठन का कार्य देखते थे उस समय भी वह यहां निरंतर प्रवास करते थे। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वह हमारे यहां राज्योत्सव कार्यक्रम में भी आए थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ से जुड़े विकास कार्यों से और भी प्राथमिकता दी। लोगों की अपेक्षाओं और उम्मीद से अधिक वह हमारे राज्य को देते हैं। छत्तीसगढ़ के स्थापना के रजत जयंती महोत्सव में प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने इसे और भी ऐतिहासिक बना दिया। इस दौरान उन्होंने 14,260 करोड़ रुपये की अलग-अलग परियोजनाओं की सौगात दी है। इससे पहले मार्च महीने में भी उन्होंने बिलासपुर के कार्यक्रम में 33 हजार करोड़ रुपए से अधिक के विकास कार्यों की सौगात दी थी। निश्चित रूप से केंद्र और राज्य की जनकल्याणकारी नीतियों से सुशासन का राज स्थापित हुआ है। एक ओर हम विकास के मोर्चे पर नक्सलवाद को पराजित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय गृह मंत्री के दृढ़ संकल्प से नक्सलवाद को पूरी तरह उखाड़ फेंकने की ओर अग्रसर हैं।

Q

नक्सलवाद और जंगल का एक सह-संबंध है। आरोप है कि सरकार नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर आदिवासी समुदाय से प्राकृतिक संसाधनों पर उनका प्राकृतिक हक छीनना चाहती है, जो समुदाय जंगल पर आधारित जीवन जीता था, उसे भी सरकारी नियंत्रण में आना होगा?

A

ऐसा सोचना भी गलत है। यह आरोप पूरी तरह निराधार है। हमारी सरकार का उद्देश्य कभी भी आदिवासी समाज से उनका हक छीनना नहीं रहा, बल्कि उन्हें उनका वास्तविक अधिकार और सम्मान लौटाना है। वन धन केंद्र, वनोपजों के लिए प्रसंस्करण केंद्र, इको टूरिज्म आदि हमारी नीतियों से आप समझ सकते हैं कि हमारी सरकार किस तरह से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रोजगार को स्थानीय स्तर पर ही बढ़ावा दे रही है। हमने जंगलों को केवल संसाधन नहीं माना, बल्कि जीवंत संस्कृति के रूप में देखा है। इसलिए वन अधिकार पट्टों का वितरण, लघु वनोपज का बेहतर मूल्य निर्धारित किए, वन समितियों को अधिकार संपन्न बनाए, यह सब आदिवासी स्वावलंबन की दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं।

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2014 के बाद अर्बन नक्सल शब्द अस्तित्व में आया। भाजपा से जुड़े विचार मंचों ने इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया। क्या आप मानते हैं कि अरबन नक्सल जैसी कोई विचारधारा अस्तित्व रखती है? अगर हां तो उसकी पहचान के क्या निशान हैं? सरकार उस पर नियंत्रण कैसे करेगी?

A

“अर्बन नक्सल” एक विचारधारा है। यह उस विचारधारा और नेटवर्क की पहचान है, जो शहरों में बैठकर जंगलों की हिंसा को दिशा और प्रश्रय देता है। आपने देखा होगा कि जब ताड़मेटला कांड (6 अप्रैल 2010) में हमारे जवान शहीद होते हैं, एक यूनिवर्सिटी में उत्सव मनाया जाता है। माओवादियों के न्यूट्रलाईज होने पर ये मानवाधिकार की दुहाई देते फिरते हैं और हमारे जवानों की शहादत पर जश्न मनाते हैं। ये लोग बंदूक नहीं उठाते, लेकिन बंदूक उठाने वालों को बौद्धिक और आर्थिक रूप से मदद करते हैं, वही इस नेटवर्क का हिस्सा हैं। नक्सलवाद सिर्फ जंगल तक सीमित नहीं, बल्कि विचार और भ्रम के जरिए समाज में जड़ें जमाने की कोशिश करता है।

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