100 प्रतिशत अपशिष्ट जल में 90 फीसदी मछलियों का जीवित रहना जरूरी, कास्टिक सोडा उद्योगों के लिए नया नियम

मेम्ब्रेन सेल तकनीक वाले कास्टिक सोडा संयंत्रों के लिए नए पर्यावरण मानक जारी
कानपुर शहर का अपशिष्ट जल गंगा नदी में गिर रहा है, फोटो साभार : सीएसई
कानपुर शहर का अपशिष्ट जल गंगा नदी में गिर रहा है, फोटो साभार : सीएसई
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कास्टिक सोडा उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पानी का अब “मछलियों” के जरिए इम्तिहान होगा। केंद्र सरकार ने पर्यावरण (संरक्षण) दूसरा संशोधन नियम, 2025 के तहत नए पर्यावरण मानक जारी किए हैं। अधिसूचना में साफ लिखा गया है कि "बायोऐसे परीक्षण में 100 प्रतिशत अपशिष्ट जल में पहले 96 घंटे के बाद कम से कम 90 प्रतिशत मछलियों का जीवित रहना आवश्यक होगा।"

यानी फैक्ट्री के 100 प्रतिशत अपशिष्ट जल में 96 घंटे बाद कम से कम 90 प्रतिशत मछलियां जीवित रहनी चाहिए। पहली नजर में यह नियम अजीब लग सकता है। सवाल उठता है, क्या सरकार सचमुच नालों में मछलियां छोड़ेगी? असल में ऐसा नहीं है। यह लैब आधारित वैज्ञानिक परीक्षण होता है जिसमें फैक्ट्री के पानी का सैंपल लेकर नियंत्रित परिस्थितियों में मछलियों पर उसका असर देखा जाता है।

यहीं से इस अधिसूचना की सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है। सरकार अब केवल यह नहीं देखना चाहती कि पानी में कौन सा रसायन कितना है, बल्कि यह भी जानना चाहती है कि वह पानी असल में जीवित प्राणियों को मारता है या नहीं।

26 मार्च 2025 को जारी अधिसूचना में केंद्र सरकार ने कास्टिक सोडा उद्योगों के पानी, गैस और अपशिष्ट के लिए नई सीमाएं तय की हैं। नियम कहता है कि "ये मानक मेम्ब्रेन सेल प्रौद्योगिकी पर आधारित स्वतंत्र (स्टैंडअलोन) कास्टिक सोडा संयंत्रों पर लागू होंगे।"

लेकिन आम आदमी के लिए यहां दूसरा सवाल पैदा होता है, मेम्ब्रेन सेल तकनीक क्या है?

दरअसल कास्टिक सोडा बनाने की पुरानी तकनीक में पारे यानी मरकरी का इस्तेमाल होता था। वैज्ञानिकों ने पाया कि इससे पारा प्रदूषण फैल सकता है, जो मछलियों, मिट्टी और इंसानी दिमाग तक को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए दुनिया भर में धीरे-धीरे नई मेम्ब्रेन सेल प्रौद्योगिकी अपनाई गई। इसमें विशेष झिल्ली (मेम्ब्रेन) के जरिए रासायनिक प्रक्रिया नियंत्रित की जाती है और इसे अपेक्षाकृत कम प्रदूषणकारी माना जाता है।

कास्टिक सोडा आखिर बनता क्यों है?

कास्टिक सोडा यानी सोडियम हाइड्रॉक्साइड भारत के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले औद्योगिक रसायनों में से एक है। साबुन, डिटर्जेंट, कागज, कपड़ा, एल्युमिनियम, पेट्रोकेमिकल और पानी साफ करने वाले उद्योग तक इसका उपयोग करते हैं। यानी रोजमर्रा की कई चीजों के पीछे यही रसायन काम करता है। भारत में फिलहाल लगभग 32 से 37 कास्टिक सोडा इकाइयां मानी जाती हैं और देश का वार्षिक उत्पादन 50 लाख मीट्रिक टन से अधिक पहुंच चुका है।

लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण भी चुकाता है। इस उद्योग से निकलने वाला पानी अत्यधिक क्षारीय और नमकयुक्त होता है। उसमें क्लोरीन, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और घुले ठोस पदार्थ बड़ी मात्रा में हो सकते हैं।

इसीलिए सरकार ने अपशिष्ट जल की सीमाएं तय की हैं। अधिसूचना के अनुसार पीएच स्तर 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए। क्लोराइड के लिए 250 मिलीग्राम प्रति लीटर, कुल निलंबित ठोस पदार्थों के लिए 100 मिलीग्राम प्रति लीटर और कुल घुले ठोस पदार्थ (टीडीएस) के लिए 2100 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा तय की गई है।

सरकार ने पानी की खपत पर भी सीमा तय की है। नियम में कहा गया है,"कास्टिक सोडा के प्रति टन उत्पादन पर अधिकतम 5 घन मीटर पानी की खपत की अनुमति होगी।"

यानी एक टन कास्टिक सोडा बनाने में अधिकतम 5 घन मीटर पानी इस्तेमाल किया जा सकेगा। साथ ही अपशिष्ट जल उत्पादन की सीमा कास्टिक सोडा के प्रति टन उत्पादन पर अधिकतम 1 घन मीटर रखी गई है।

यहां एक और बड़ा सवाल उठता है, सरकार यह सब मापेगी कैसे?

नई अधिसूचना यह नहीं बताती कि नियमित बायोऐसे परीक्षण उद्योग खुद करेंगे, निजी प्रयोगशालाएं करेंगी या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड। भारत की मौजूदा व्यवस्था में आम तौर पर उद्योगों को मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से परीक्षण करवाकर उसकी रिपोर्ट राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को देनी होती है। बाद में बोर्ड सत्यापन के लिए नमूना परीक्षण कर सकते हैं।

यानी व्यवस्था मुख्य रूप से स्व-निगरानी पर आधारित रहेगी।

यहीं पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता शुरू होती है। क्योंकि बायोऐसे परीक्षण सामान्य पानी जांच से कहीं ज्यादा कठिन और महंगे होते हैं। इनमें जिंदा मछलियां रखनी पड़ती हैं, 96 घंटे लगातार निगरानी करनी होती है, पानी का तापमान और ऑक्सीजन नियंत्रित रखना पड़ता ह और वैज्ञानिकों को व्यवहार तथा मृत्यु दर का रिकॉर्ड रखना पड़ता है।

यानी यह केवल मशीन से होने वाला रासायनिक परीक्षण नहीं, बल्कि जीव विज्ञान और पर्यावरण विष विज्ञान का संयुक्त परीक्षण है।

यह नियम पूरी तरह नया नहीं है। भारत में कीटनाशक उद्योगों समेत कुछ अन्य क्षेत्रों में पहले से ऐसे बायोऐसे परीक्षण लागू हैं। वैज्ञानिक इसे संपूर्ण अपशिष्ट जल विषाक्तता परीक्षण (डब्ल्यूईटी परीक्षण) कहते हैं। इसका उद्देश्य यह समझना होता है कि अलग-अलग रसायनों का मिला-जुला असर जीवित प्राणियों पर क्या पड़ता है।

दरअसल कई बार कोई फैक्ट्री सभी रासायनिक मानकों में पास हो जाती है, लेकिन मिश्रित विषाक्तता के कारण मछलियां फिर भी मरने लगती हैं। इसी वजह से दुनिया भर में केवल रासायनिक परीक्षण की जगह जीव आधारित परीक्षणों पर जोर बढ़ रहा है।

अधिसूचना में यह भी लिखा गया है, "बायोऐसे परीक्षण भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा निर्धारित आईएस: 6582-1971 मानकों के अनुसार किया जाएगा।"

लेकिन यहां एक और व्यावहारिक सवाल पैदा होता है, अगर यह परीक्षण इतने महंगे हैं, तो क्या हर उद्योग इन्हें ईमानदारी से कराएगा?

भारत में अभी यह स्पष्ट सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि हर साल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कितने बायोऐसे परीक्षण करते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ निगरानी क्षमता पर सवाल उठाते हैं।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) भी कई मामलों में नियमित निगरानी, स्वतंत्र नमूना संग्रहण और ऑनलाइन निगरानी पर जोर देता रहा है। क्योंकि केवल स्व-प्रमाणीकरण पर निर्भर रहने से प्रदूषण छिपाए जाने का खतरा बना रहता है।

नई अधिसूचना में भार-आधारित प्रदूषण मानक भी जोड़े गए हैं। उदाहरण के लिए नियम कहता है कि उत्पादित कास्टिक सोडा के प्रति टन पर कुल घुले हुए ठोस पदार्थ (टीडीएस) की सीमा 2.1 किलोग्राम होगी।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले उद्योग कई बार ज्यादा पानी मिलाकर प्रदूषण की सांद्रता कम दिखा देते थे। अब सरकार यह भी मापना चाहती है कि प्रति टन उत्पादन कुल कितना प्रदूषण पैदा हुआ।

नई अधिसूचना केवल पर्यावरणीय मानक तय करने का दस्तावेज नहीं है। यह भारत की प्रदूषण निगरानी व्यवस्था के सामने एक कठिन सवाल भी खड़ा करती है, क्या देश के पास इतने वैज्ञानिक, प्रयोगशालाएं और निगरानी संसाधन हैं कि मछलियों के जरिए जहरीले पानी का यह इम्तिहान वास्तव में जमीन पर हो सके?

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