

सारांश
क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में नवंबर, दिसंबर और जनवरी में हवा की गुणवत्ता सबसे अधिक खराब रही
2026 में पंजीकृत 1.40 लाख वाहनों में 1.07 लाख से अधिक वाहन पेट्रोल पर चलने वाले थे जबकि करीब 20 हजार वाहन डीजल चालित थे
पंजीकृत इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 10,396 ही रही। इनमें भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी तिपहिया वाहनों (ऑटो) की रही
प्रदूषण के कारण राज्य में सांसों की बीमारियों बढ़ रही हैं। सीडी अस्पताल में इमरजेंसी पहुंचने वाले और भर्ती होने वाले मरीज बढ़े
कुछ दशकों पहले तक अपनी साफ हवा और शुद्ध वातावरण के लिए चर्चित जम्मू-कश्मीर अब वायु प्रदूषण से अछूता नहीं है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यह पर्वतीय क्षेत्र तेजी से प्रदूषण की जद में आ रहा है। श्रीनगर के खोनमोह क्षेत्र में इस साल के शुरुआती छह महीनों (जनवरी से जून) में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 100-200 के बीच रहा। यह एक्यूआई की मॉडरेट श्रेणी है। नवंबर और दिसंबर 2025 में यहां एक्यूआई क्रमश: 279 और 246 दर्ज किया गया जो खराब (पूअर) श्रेणी है।
जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण कमिटी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल के दौरान यानी अगस्त 2025 से जुलाई 2026 तक किसी भी महीने एक्यूआई अच्छी (गुड) श्रेणी (0-50 एक्यूआई) में नहीं था। यहां तक की सबसे साफ माने जाने वाले मॉनसून के महीनों में वायु की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी। जम्मू कश्मीर के अधिकांश हिस्सों में नवंबर, दिसंबर और जनवरी में हवा की गुणवत्ता सबसे अधिक खराब रही। वहीं, कई मॉनिटरिंग स्टेशनों के आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं।
जम्मू-कश्मीर में परिवहन क्षेत्र वायु गुणवत्ता को खराब करने में सबसे अधिक हिस्सेदारी रखते हैं। जानकारों के अनुसार, परिवहन क्षेत्र का वायु प्रदूषण में करीब 50 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।
सांस की बीमारियों में इजाफा
श्रीनगर के डलगेट स्थित सीडी (चेस्ट डिसीज) हॉस्पिटल में लबे समय तक श्वसन रोग विशेषज्ञ के तौर पर पदस्थ रहे और वर्तमान में गौसिया स्थित सरकारी अस्पताल में सेवारत डॉक्टर फिरदौर मंजूर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पहले बायोमास जलाने से सबसे अधिक प्रदूषण होता था लेकिन वर्तमान में पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल इसमें सबसे अधिक योगदान दे रहा है।
उनका कहना है कि वायु प्रदूषण में इजाफा होते ही अस्पताल की ओपीडी में सांस के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। सीडी अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 में 18,672 लोग इमरजेंसी में पहुंचे जिनकी संख्या 2023-24 में बढ़कर 32,133 पहुंच गई। इसी तरह आईपीडी (इन पैशंट्स डिपार्टमेंट) में इस 4,315 मरीजों से बढ़कर 7,480 हो गई। जानकार इस उछाल की अहम वजह के तौर पर वायु प्रदूषण को भी जिम्मेदार ठहराते हैं।
फिरदौर मंजूर के अनुसार, सांस हर समय चाहिए। इसी के साथ प्रदूषक भी सांस के साथ अंदर जा रहे हैं। कुछ प्रदूषक तो खून तक में पहुंच रहे हैं। वह इसके लिए सीधे तौर सड़कों पर बढ़ रहे वाहनों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि 1990 के दशक में हमारे मोहल्ले में कुल 2-3 कारें थीं, जबकि मौजूदा समय में हर घर में 2-3 वाहन हो गए हैं। वाहनों की बढ़ी भीड़ में डीजल वाहन सबसे अधिक हैं जो प्रदूषण के अहम स्रोत हैं।
हर महीने 20 हजार वाहनों का पंजीकरण
जम्मू-कश्मीर में परिवहन विभाग में पंजीकृत वाहनों के आंकड़ों पर नजर डालने पर पता चलता है कि यहां 26,64,696 वाहनों का पंजीकरण हुआ है। 2025 में पंजीकृत वाहनों की वृद्धि दर 6.07 प्रतिशत थी। यहां पंजीकृत वाहनों में सबसे अधिक हिस्सेदारी जम्मू की है जहां कुल 8.8 लाख वाहन हैं। दूसरा सबसे अहम शहर श्रीनगर है जहां 4.10 लाख वाहन हैं।
वाहन डैशबोर्ड के अनुसार, 2026 में अब तक 1.4 लाख से अधिक वाहनों का पंजीकरण हो चुका है। 2025 में 1.90 लाख, 2024 में 1.79 लाख, 2023 में 1.71 लाख और 2022 में 1.62 लाख वाहनों का जम्मू-कश्मीर में पंजीकरण हुआ। आंकड़ों के अनुसार, यहां की सड़कों पर हर महीने करीब 20 हजार वाहनों की संख्या बढ़ रही है।
इन वाहनों में जीवाश्म ईंधन से चलने वालों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। उदाहरण के लिए 2026 में पंजीकृत 1.40 लाख वाहनों में 1.07 लाख से अधिक वाहन पेट्रोल पर चलने वाले थे जबकि करीब 20 हजार वाहन डीजल चालित थे। वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 10,396 ही रही। इनमें भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी तिपहिया वाहनों (ऑटो) की रही।
वायु प्रदूषण में वाहनों का 50 प्रतिशत योगदान
जम्मू-कश्मीर में जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों से निकलने वाला धुआं वातावरण में वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रहा है। जम्मू कश्मीर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एवं वर्तमान में वैली इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन कंट्रोल, एनवायरमेंट मैनेजमेंट एंड क्लाइमेट चेंज (वीआईपीसीईसीसी) कंसल्टेंसी की संचालक मुताहरा आबिदा वहीद देवा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि ठंड में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि चलने में मुश्किल होती है।
मुताहरा के अनुसार, इस मौसम में हवा के साथ धूल मिल जाती है और ठहर सी जाती है। वह कहती हैं कि इस मौसम में श्रीनगर में एक्यूआई 300-400 तक भी पहुंच जाता है जो सामान्य नहीं है। उनका कहना है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में कमी के कारण निजी वाहनों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ रही है जो वायु प्रदूषण में 40-50 प्रतिशत तक अपनी हिस्सेदारी निभा रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में वैज्ञानिक फैयाज अहमद डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि वायु गुणवत्ता मौसम के अनुसार बदलती रहती है। नवंबर से इसमें वृद्धि होती है और पार्टिकुलेट मैटर ठहर जाता है। वह इसकी वजह श्रीनगर की कटोरानुमा स्थिति को बताते हैं। श्रीनगर में प्रदूषण की एक अन्य वजह वह यहां बाहर से आने वाले करीब 6-7 लाख वाहनों को भी जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि जब वाहन चलते हैं तो हर जगह अपने प्रदूषण का असर छोड़ते हुए जाते हैं।
जम्मू-कश्मीर सूचना का अधिकार आंदोलन एवं क्लाइमेट एक्शन ग्रुप के संस्थापक राजा मुजफ्फर भट ने डाउन टू अर्थ को बताया कि वायु प्रदूषण न केवल हवा की गुणवत्ता खराब कर रहा है बल्कि जल प्रदूषण का भी कारण बन रहा है। वह बताते हैं कि तीन साल पहले उन्होंने पीर पंजाल ग्लेशियर का दौरा किया था और वहां बर्फ पर ब्लैक कार्बन की मोटी परत देखी थी। उनका कहना है कि ब्लैक कार्बन युक्त ग्लेशियर का यह पानी बड़ी आबादी पीने में इस्तेमाल करती है। यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा और इसका अध्ययन किया जाना चाहिए।