फोटो: आईस्टॉक
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छत पे सोलर: सिर्फ सस्ती बिजली नहीं, उससे भी कहीं ज्यादा

सोलर रूफटॉप से हर घर बनेगा ‘ऊर्जा उत्पादक’, स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ताकत और रोजगार के हजारों अवसर, सिर्फ अनुदान नहीं बल्कि दीर्घकालिक विकास रणनीति की जरूरत
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भारत का उर्जा क्षेत्र परिवर्तन के एक नए दौर से गुजर रहा है। 'प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' (पीएम-सूर्या घर) ने सोलर रूफटॉप, यानी छतों पर लगने वाले सोलर सिस्टम, को देश के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह एक बहुत ही महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका लक्ष्य 31 मार्च 2027 तक 1 करोड़ घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाना है। हालांकि, हम अभी तक इस लक्ष्य का सिर्फ 44 फीसदी ही हासिल कर पाए हैं।

इस योजना को केंद्र और राज्य सरकारों से अच्छा-खासा अनुदान भी मिल रहा है। ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य अनुदान के सहारे इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि अब तक की ज्यादातर चर्चाएं इस बात पर ही सिमटी रही हैं कि कैसे सोलर पैनल की शुरुआती लागत को कम करके घर-घर सस्ती बिजली पहुंचाई जाए।

सस्ती और किफ़ायती बिजली लोगों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए एक अहम कदम है, लेकिन सोलर रूफटॉप को सिर्फ इसी नजरिए से देखना एक छोटी सोच होगी। सोलर रूफटॉप का फायदा सिर्फ बिजली बिल कम करने या नए तरीके से अनुदान देने तक सीमित नहीं है। परंपरागत बिजली प्रणाली में ग्राहक केवल बिजली इस्तेमाल करता है, जबकि सोलर रूफटॉप में वह खुद बिजली बनाने लगता है और देश के इस ऊर्जा ट्रांसफॉर्मेशन का एक सक्रिय सहायक बन जाता है।

इसमें ऊर्जा के उत्पादन को हर नागरिक तक पहुंचाने, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने, और कमाई के नए मौके पैदा करने की क्षमता है। इसीलिए, सोलर रूफटॉप को केवल एक ऊर्जा कार्यक्रम की तरह नहीं, बल्कि पूरे देश के विकास और बदलाव की एक बड़ी रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

अनुदान से आगे: एक बड़ा बदलाव

सोलर रूफटॉप से जुड़ी चर्चाओं में अक्सर यह मान लिया जाता है कि अगर सरकार अनुदान दे तो लोग तुरंत अपनी छतों पर सोलर पैनल लगवा लेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत और राज्यों का अनुभव कुछ और ही कहानी बयां करता है। वित्तीय मदद और छूट मिलने के बावजूद सोलर पैनल को अपनाने की गति काफ़ सुस्त रही है। खासकर ग्रामीण इलाकों और कम बिजली इस्तेमाल करने वाले परिवारों को सोलर पैनल के आर्थिक फायदे जल्द समझ में नहीं आते। अनुदान मिलने से सोलर की शुरुआती लागत भले ही कम हो जाती है, पर यह अपने-आप लोगों के मन में इसे लगवाने की चाहत या डिमांड पैदा नहीं कर पाती।

अगर हमें सोलर रूफटॉप को सिर्फ एक अनुदान योजना से निकालकर देश के विकास का जरिया बनाना है, तो नीतियों को केवल निधि देने से आगे बढ़ना होगा। सोलर रूफटॉप के अगले दौर के लिए भारत को एक पूरा समर्थन प्रणाली, जनता का भरोसा, स्थानीय लोगों की भागीदारी, हर मौसम को झेलने वाली संरचना (infrastructure), और स्थानीय आर्थिक विकास से इसका सीधा जुड़ाव करना होगा।


बदलाव की नींव

पहला, भारत को एक ऐसा मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की जरूरत है जो सोलर लगाने की प्रक्रिया को आसान बनाए। राज्यों के अनुभव से साफ है कि बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम्स) अगर जागरूकता अभियान चलाएं और नियम-कायदों को आसान कर दें, तो लोग तेजी से सोलर पैनल अपनाने लगते हैं। हालांकि, अकेले डिस्कॉम्स इतना बड़ा बदलाव नहीं ला सकते, क्योंकि वे खुद व्यापारिक और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। इसके लिए प्राइवेट डेवलपर्स, 'रेस्को' मॉडल वाली कंपनियों, स्थानीय व्यवसायी, सहकारी समितियों, बैंकों, और सामाजिक संगठनों को भी आगे आना होगा।

दूसरा, भारत को लोगों के मन में बैठे अविश्वास को दूर करने की जरूरत है। आज भी कई परिवार सोलर रूफटॉप को सिर्फ अमीर याशहरी लोगों की चीज मानते हैं। इसके अलावा, बिलिंग का झंझट, नेट मीटरिंग के नियम, रख-रखाव की जिम्मेदारी, और लंबे समय तक सोलर पैनल का सही काम करना – ये सब बातें लोगों को हिचकिचाने पर मजबूर करती हैं। सिर्फ विज्ञापनों और अभियानों के जरिए यह झिझक दूर नहीं होगी। जब लोग अपने ही आस-पास दूसरों की छतों पर सोलर लगे देखेंगे और बिक्री के बाद बेहतरीन सर्विस मिलेगी, तभी उनका भरोसा जागेगा। इसलिए छतों पर सोलर लगाने और उसकी देखभाल के लिए स्थानीय स्तर पर तकनीशियनों को तैयार करना उतना ही जरूरी है जितना कि इसके लिए अनुदान देना।

तीसरा, भारत की सोलर रूफटॉप रणनीति ऐसी होनी चाहिए जो देश के अलग-अलग मौसमों और जलवायु को ध्यान में रखे। पूर्वी तटों पर आने वाले तूफानों से लेकर उत्तर और पश्चिम भारत की भीषण गर्मी तक, सोलर सिस्टम ऐसा होना चाहिए जो हर स्थानीय माहौल को झेल सके। अगर सोलर रूफटॉप को लंबे समय का टिकाऊ संरचना बनाना है, तो मौसम की मार झेलने की क्षमता को इसके डिजाइन का अहम हिस्सा बनाना ही पड़ेगा|

भारत के ऊर्जा संक्रमण की रणनीति

सोलर रूफटॉप इस बात का भी प्रतीक है कि भारत के घरों की भूमिका अब ऊर्जा के क्षेत्र में बदल रही है। आम उपभोक्ता अब सिर्फ बिजली इस्तेमाल नहीं कर रहा, बल्कि वह बिजली बना रहा है, निवेश कर रहा है और देश के इस बड़े बदलाव में हाथ बटा रहा है। इससे ऐसे रास्ते खुल रहे हैं जो सिर्फ बिजली बनाने से कहीं आगे जाते हैं। 

सोलर रूफटॉप स्थानीय स्तर पर सेवा क्षेत्र को बढ़ावा दे सकता है, जिससे सोलर पैनल लगाने और उनकी मरम्मत करने के हजारों नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा, यह गांव-देहात के छोटे उद्योगों और सामुदायिक संस्थाओं को नई ताकत दे सकता है। सोलर से मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल कृषि-प्रसंस्करण (एग्री-प्रोसेसिंग), गांवों में कोल्ड-स्टोरेज चलाने, कपड़े और हस्तशिल्प जैसे कामों में दक्षता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इससे लोगों की आजीविका बेहतर होगी, आमदनी बढ़ेगी, और बड़े पैमाने पर विकास देखने को मिलेगा।

इस नजरिए से देखें तो सोलर रूफटॉप सिर्फ एक ‘क्लीन एनर्जी’ का प्रोजेक्ट नहीं है। यह एक ऐसी डेवलपमेंट स्ट्रेटेजी है जो भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को रफ्तार देते हुए स्थानीय स्तर पर कमाई के नए अवसर बनाएगी। इस बदलाव को सफल बनाने के लिए हमें सिर्फ इस बात से सफलता नहीं नपनी होगी कि कितनी छतों पर सोलर पैनल लग गए या कितनी अनुदान दी गई। असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सोलर रूफटॉप हमारे स्थानीय बाजारों, भरोसेमंद संस्थाओं, कुशल सेवा प्रदाता, और आम जनता की भागीदारी के साथ कितनी गहराई से जुड़ पाता है।

भारत में सोलर रूफटॉप का भविष्य केवल करोड़ों छतों पर सोलर पैनल ठोक देने भर का नहीं है। असल मक़सद तो उन छतों को एक विकेंद्रीकृत, सबको साथ लेकर चलने वाले, और विकास-उन्मुख ऊर्जा रूपांतरण का मंच बनाना है।

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