फेम योजना के नियमों का उल्लंघन करने वाले ओईएम को 468 करोड़ का डिमांड इंसेटिव दिया गया: सीएजी रिपोर्ट

फेम योजना के दूसरे चरण में 20 एजेंसियों को 2,877 चार्जिंग स्टेशन बनाने की मंजूरी दी गई, लेकिन इनमें से सिर्फ चार एजेंसियों ने कुल 148 चार्जिंग स्टेशन ही चालू किए
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाई गई थी फेम योजना। फोटो: भागीरथ
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाई गई थी फेम योजना। फोटो: भागीरथ
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इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई फेम (फास्टर एडोप्शन एंड मैन्युफैक्चुरिंग ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल) योजना पर हाल ही में जारी हुई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) रिपोर्ट में कई अनियमितताएं उजागर हुई हैं।

भारी उद्योग मंत्रालय ने अप्रैल 2015 से शुरू होने वाले दो साल के लिए 795 करोड़ रुपए के बजट के साथ भारत में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को बढ़ावा देने के लिए फेम 1 योजना शुरू की थी। बाद में इस योजना को मार्च 2019 तक बढ़ा दिया गया और इसका बजट 795 करोड़ से बढ़ाकर 895 करोड़ रुपए कर दिया गया।

अप्रैल 2019 से मार्च 2024 की अवधि के लिए 10,000 रुपए करोड़ के बजट के साथ योजना का दूसरा चरण (फेम-II) शुरू हुआ। बाद में इसका बजट बढ़ाकर 11,500 करोड़ रुपए कर दिया गया। इस योजना को पांच घटकों के माध्यम से लागू किया गया। पहला घटक था डिमांड इंसेंटिव, दूसरा चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, तीसरा टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म (आरएंडी), चौथा पायलट प्रोजेक्ट्स औ पांचवा सूचना, शिक्षा और संचार।

रिपोर्ट के अनुसार, डिमांड इंसेंटिव डिलीवरी मैकेनिज्म (डीआईडीएम) पोर्टल (फेज I और II) में कुछ कमियां थीं, जैसे डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार न करना और पोर्टल डेवलपमेंट के लिए सर्विस लेवल एग्रीमेंट पर साइन न करना। इस वजह से मुख्य डिलिवरेबल्स, टाइमलाइन, टेस्टिंग प्रोटोकॉल, डेटा/सिस्टम इंटीग्रिटी की जरूरतें, डिफेक्ट मैनेजमेंट और चेंज मैनेजमेंट प्रोसेस जैसे अहम पहलुओं को कॉन्ट्रैक्ट में साफ तौर पर तय नहीं किया गया था। साथ ही, पोर्टल में मिनिस्ट्री द्वारा क्लेम की एंड-टू-एंड ऑनलाइन प्रोसेसिंग की सुविधा नहीं थी और पोर्टल में वैलिडेशन कंट्रोल की भी कमी थी।

सेंट्रल सर्वर नहीं बना

रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्कीम के पहले चरण में देश भर के 10 शहरों में राज्य परिवहन उपक्रमों/नगर निगमों की 425 ई-बसों के प्रस्ताव को मंत्रालय ने मंजूरी दी थी, जिसमें मंत्रालय की ओर से 278.42 करोड़ रुपए की सब्सिडी शामिल थी। पहले चरण में सभी ई-बसें तैनात कर दी गई थीं। दूसरे चरण में 31 दिसंबर 2025 तक, 6,862 बसों के संशोधित लक्ष्य में से 5,195 ई-बसें इस स्कीम के तहत तैनात की जा चुकी थीं।

ई-बसों की परफॉर्मेंस की निगरानी के लिए जरूरी सेंट्रल सर्वर को मंत्रालय ने तैयार नहीं किया था, जबकि प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन एंड सैंक्शनिंग कमिटी की तीसरी बैठक (नवंबर 2019) में यह भरोसा दिलाया गया था कि सेंट्रल सर्वर दिसंबर 2020 तक उपलब्ध हो जाएगा।

फेम इंडिया स्कीम के तहत टेस्टिंग एजेंसियों द्वारा टेस्टिंग और एलिजिबिलिटी असेसमेंट रिपोर्ट (ईएसआर) जारी करने के लिए मंत्रालय ने कोई समय-सीमा तय नहीं की थी। इसके न होने की वजह से टेस्टिंग एजेंसियों द्वारा टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी करने में लगने वाले समय पर कोई कंट्रोल या निगरानी नहीं थी और ईएआर जारी करने में काफी समय (497 दिनों तक) लगा।

उल्लंघनकर्ताओं को डिमांड इंसेटिव का भुगतान

रिपोर्ट के अनुसार, पांच ओईएम (ओरिजनल ऑक्युप्मेंट फैन्युफैक्चरर) ने फेज्ड मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम के तहत तय किए गए लोकलाइजेशन नियमों का उल्लंघन किया, फिर भी उन्हें 467.96 करोड़ रुपए का डिमांड इंसेंटिव दिया गया। इस उल्लंघन का पता बाद में चला, जब खुद मंत्रालय के खास निर्देशों पर टेस्टिंग एजेंसियों ने रिकॉर्ड की बारीकी से जांच, प्लांट का फिजिकल इंस्पेक्शन और गाड़ियों का स्ट्रिप-डाउन एनालिसिस किया। पांच में से दो ओईएम ने मंत्रालय को ब्याज समेत पूरा डिमांड इंसेंटिव (कुल 190.90 करोड़ रुपए) वापस कर दिया। इसके अलावा, बाकी तीन ओईएम के खिलाफ डिमांड इंसेंटिव की रिकवरी या डी-रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया चल रही थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि फेम एलिजिबिलिटी असेसमेंट सर्टिफिकेट की वैलिडिटी खत्म होने के बाद गाड़ी बेचने जैसी स्कीम गाइडलाइंस का उल्लंघन हुआ, जिसके कारण ओईएम से 6.18 करोड़ रुपए (894 ईवी) की रिकवरी की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, दो ओईएम को 5,198 इलेक्ट्रिक थ्री व्हीलर्स के मामले में मिनिस्ट्री ने टेस्टिंग एजेंसियों द्वारा एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट में बताई गई रकम तक इंसेंटिव को सीमित किए बिना डिमांड इंसेंटिव जारी कर दिया, जिससे 1.65 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान हुआ।

हाल ही में जारी हुई सीएजी रिपोर्ट
हाल ही में जारी हुई सीएजी रिपोर्ट

चार्जिंग की बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी

सीएजी ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले चरण में पर्याप्त पब्लिक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए कोई रोडमैप या एक्शन प्लान नहीं था। प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन एंड सैंक्शनिंग कमिटी (पीआईएससी) ने (2015-19 के दौरान) बिना किसी एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (रुचि की अभिव्यक्ति) को आमंत्रित किए तीन एजेंसियों (बीएचईएल, राजस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंट्स लिमिटेड (आरईआईएल) और महिंद्रा रेवा) को चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सौंपे। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लागू करने वाली एजेंसियों से मिले प्रस्तावों के आधार पर मंजूरी दी गई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2019 में आरईआईएल को सौंपे गए एक प्रोजेक्ट के मामले में 12.66 करोड़ रुपए का खर्च बेकार चला गया क्योंकि 122 केवी के चार्जर और पावर ट्रांसफॉर्मर चालू नहीं किए गए थे, सोलर प्लांट शुरू नहीं किए गए थे और बिना इस्तेमाल की गई केबल इंस्टॉलेशन एजेंसी के पास पड़ी थी।

मंजूर किए गए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के तहत मंत्रालय ने चार्जिंग स्टेशनों के प्रबंधन के लिए सेंट्रल मैनेजमेंट सिस्टम (सीएमएस) सॉफ्टवेयर बनाने के लिए फंड आवंटित किया था। ऑडिट में पाया गया कि आईआईटी मद्रास ने टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट (आरएंडडी) घटक के तहत मंत्रालय द्वारा जारी फंड से जून 2017 में ही सीएमएस विकसित कर लिया था, लेकिन मंत्रालय ने उसे अपनाया या चालू नहीं किया

समयसीमा पर चालू नहीं हुए चार्जिंग स्टेशन

दूसरे चरण में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में बहुत कम प्रगति हुई। पीआईएससी ने शहरों के लिए कुल 2,877 चार्जिंग स्टेशन (20 एजेंसियों द्वारा) को मंजूरी दी थी, लेकिन इनमें से सिर्फ चार एजेंसियों ने कुल 148 चार्जिंग स्टेशन चालू किए। इसके अलावा, हाइवे और एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट के तहत कोई फंड जारी नहीं किया गया क्योंकि इस प्रोजेक्ट के तहत चार्जिंग स्टेशन लगाने/चालू करने में बहुत कम प्रगति हुई थी। मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के तहत मंजूर किए गए सभी 1,576 चार्जिंग स्टेशनों को रद्द कर दिया। साथ ही, तीन तेल मार्केटिंग कंपनियों को दिए गए 8,412 चार्जिंग स्टेशनों में से कोई भी स्टेशन तय समय-सीमा यानी 31 मार्च 2024 तक चालू नहीं किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑडिट टीम और लागू करने वाली (इंप्लीमेंटिंग) एजेंसियों के अधिकारियों ने मिलकर (फरवरी से जुलाई 2023 के बीच) 104 चार्जिंग स्टेशनों/चार्जरों का निरीक्षण किया जिनमें ऐसे स्टेशनों पर लगे 25 सोलर प्लांट भी शामिल थे। इस संयुक्त फिजिकल निरीक्षण के दौरान कई तरह की समस्याएं देखी गईं, जैसे कि चार्जर में बिजली न होना, इंस्टॉलेशन वाली जगह से चार्जर हटा लिया जाना, साइट पर चार्जर का न मिलना, चार्जिंग प्रक्रिया के बारे में कर्मचारियों को जानकारी न होना, चार्जिंग मैनेजमेंट सिस्टम का काम न करना, ईवी चार्जिंग के लिए तय पार्किंग जगह पर कब्जा करने के लिए तोड़-फोड़ करना, खराब चार्जर, दो-पहिया वाहनों के लिए तय पार्किंग में कार चार्जर लगे होना आदि।

जागरुकता पर सीमित खर्च

रिपोर्ट के अनुसार, स्कीम के पहले और दूसरे चरण के दौरान जानकारी, शिक्षा और संचार (आईईसी) गतिविधियों के लिए आवंटित कुल 48 करोड़ रुपए में से मंत्रालय ऐसी गतिविधियों के लिए 7.52 करोड़ रुपए की राशि ही इस्तेमाल कर सका। इसके अलावा, मंत्रालय को ग्राहकों में जागरुकता पैदा करने और स्कीम को बढ़ावा देने के लिए एक उपयुक्त आईईसी प्रोग्राम लागू करना था। हालांकि, मंत्रालय ने इस संबंध में कोई नीति या कार्य योजना नहीं बनाई।

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