

केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में इलेक्ट्रिक वाहनों ने पिछले तीन-चार सालों में जोर तो पकड़ा है लेकिन यह अभी केवल इलेक्ट्रिक बसों, ई-रिक्शों और तिपहिया (थ्री व्हीलर) वाहनों तक ही सीमित है। इलेक्ट्रिक कारें सड़कों पर न के बराबर ही दिखाई दे रही हैं। बैटरी चालित दोपहिया वाहनों की गति भी धीमी है।
परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2023 से अब तक करीब 44,000 से अधिक इलेक्ट्रिक वाहनों का पंजीकरण हुआ है। जम्मू-कश्मीर में 2026 में जुलाई तक कुल 9,482 इलेक्ट्रिक वाहनों का पंजीकरण हुआ है जिनमें सर्वाधिक 6,186 तिपहिया वाहन शामिल हैं। यानी पंजीकृत वाहनों में 65 प्रतिशत ही हिस्सेदारी तिपहिया वाहनों की है। इसी तरह 2025 में पंजीकृत 11,289 वाहनों में तिपहिया वाहनों की संख्या 7,970 और 2024 में पंजीकृत 13,210 वाहनों में 6,636 तिपहिया वाहन थे। हालांकि 2023 में कुल पंजीकृत वाहनों में सबसे अधिक हिस्सेदारी यात्री ई-रिक्शों की थी। इस साल कुल 9,750 पंजीकृत वाहनों में 5,033 ई रिक्शा थे। 2023 के बाद ई रिक्शा के पंजीकरण में लगातार गिरावट आती रही जबकि तिपहिया वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती रही है।
श्रीनगर में पेरिस ऑटोमोबाइल में जनरल मैनेजर (जीएम) सैयद मुश्ताक तिपहिया वाहनों की बिक्री के पीछे 30 हजार की सब्सिडी को भी श्रेय देते हैं। हालांकि यह सब्सिडी अप्रैल 2026 से बंद है। उनका शोरूम पिछले तीन साल से इलेक्ट्रिक थ्री व्हीलर बेच रहा है। 2023-24 में उनके शोरूम ने 342, 2024-25 में 556 और 2025-26 में 892 थ्री व्हीलर की बिक्री कर चुके हैं। 2026 में अप्रैल से जुलाई तक 281 थ्री व्हीलर बेच चुके हैं। सैयद मुश्ताक कहते हैं कि श्रीनगर में अब कोई नया पेट्रोल ऑटो नहीं खरीद रहा। सड़कों पर दिखने वाले अधिकांश थ्री व्हीलर बैटरी चालित हैं।
परिवहन विभाग में ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी अवनी लवासा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सरकार का जोर भरोसेमंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर है। उनका कहना है कि सड़कों पर बहुत अधिक ई रिक्शा और थ्री व्हीलर की जरूरत नहीं है क्योंकि उनसे कानून व्यवस्था पर असर पड़ता है। उनका कहना है कि थ्री व्हीलर को मिलने वाली सब्सिडी असीमित नहीं थी। वह सब्सिडी खत्म हो चुकी है। कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सरकार इन्हें रेगुलेट कर रही है।
श्रीनगर में इलेक्ट्रिक कारें अभी स्थानीय लोगों का भरोसा नहीं जीत पा रही हैं। यही वजह है कि यहां 2026 में अब तक केवल 486 कारों का ही पंजीकरण हुआ। इसके पहले के वर्षों में भी कोई खास पंजीकरण नहीं हुआ। 2025 में 458, 2024 में 271 और 2023 में केवल 166 इलेक्ट्रिक कारें ही यहां पंजीकृत हुईं। इसी तरह 2026 में 2314, 2025 में 1650, 2024 में 941 और 2023 में 236 मोटरसाइकल व स्कूटर का पंजीकरण हुआ।
महिलाओं को भाईं इलेक्ट्रिक बसें
श्रीनगर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की एक अहम कड़ी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत चलने वाली इलेक्ट्रिक बसें हैं। श्रीनगर और इसके आसपास के इलाकों में स्मार्ट सिटी लिमिटेड की ओर से 100 और जम्मू कश्मीर राज्य परिवहन निगम लिमिटेड की तरफ से 20 इलेक्ट्रिक बसें चलाई जा रही हैं। स्मार्ट सिटी की लाल रंग की बसें ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रेक्ट (जीसीसी) मॉडल पर चल रही हैं। यानी बसों को चलाने का संपूर्ण जिम्मा टाटा कंपनी के पास है। कंपनी पर बसों के रखरखाव, चार्जिंग, ड्राइवर की जिम्मेदारी है। स्मार्ट सिटी लिमिटेड केवल कंडक्टर मुहैया कराती है।
स्मार्ट सिटी के अर्बन आर्किटेक्ट सुहैब नक्शबंदी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि हमने नवंबर 2022 से शहर में इलेक्ट्रिक बसें शुरू की हैं। जीसीसी मॉडल की ये बसें सरकार ने नहीं खरीदी हैं बल्कि सेवा खरीदी है। आमतौर पर जब सरकार बसें खरीदती हैं तो कुछ समय बाद बसें सड़ जाती थीं। संचालन और मरम्मत के अभाव में लोगों को वह सुविधा नहीं मिल पाती थी जो उन्हें मिलनी चाहिए। इसलिए यह जीसीसी मॉडल बेहतर है।
नक्शबंदी के अनुसार, हर सिटी बस को 200 किलोमीटर चलाने का लक्ष्य दिया गया है। लक्ष्य पूरा न होने पर पेनल्टी लगाई जाती है। उनका कहना है कि बसों की मांग के विश्लेषण के आधार पर रूट तय किए गए हैं। स्मार्ट सिटी 45 रुपए प्रति किलोमीटर की दर से कंपनी को भुगतान करती है। ये बसें श्रीनगर शहर से करीब 50-60 किलोमीटर की दूर के इलाकों को कवर करती हैं।
श्रीनगर में स्मार्ट सिटी की बसें लोगों में खासी लोकप्रिय हो रही हैं, खासकर महिलाओं में इनकी लोकप्रियता अधिक है क्योंकि उनके लिए यात्रा मुफ्त है। नक्शबंदी कहते हैं कि इन बसों में प्रतिदिन 35,000 लोग यात्रा कर रहे हैं। इनमें से करीब 20,000 संख्या महिलाओं की है। वह मानते हैं कि लोगों ने इन बसों को अपनाया है। बसों की संख्या बढ़ने पर लोगों की निजी वाहनों पर निर्भरता कम होगी।
स्मार्ट सिटी की बसों का सबसे अधिक इस्तेमाल छात्र कर रहे हैं। इन बसों का शुरुआत से इस्तेमाल कर रही 20 वर्षीय छात्रा राबिया अमीन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि उनके घर के सभी सदस्य इन बसों में सफर करते हैं। ये बसें प्राइवेट बसों के मुकाबले जल्दी पहुंचा देती हैं, इसलिए सभी इसे प्राथमिकता देते हैं। साथ ही महिलाओं की फ्री यात्रा से पैसों की भी बचत होती है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि बसों में वह कभी-कभी असुरक्षित महसूस करती हैं क्योंकि बसों में अक्सर जेबकतरों का खतरा रहता है। उनका मानना है कि बसों का एक हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित कर देना चाहिए ताकि वे सुरक्षित महसूस करें।