पलायन की पीड़ा-1: गांव लौटकर क्या करेंगे प्रवासी मजदूर

लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों की वापसी ने देश के सामने एक सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पलायन होता ही क्यों है?
फतेहपुर जिले का हडाही का डेरा मजरा यमुना की कटान के कारण तीन पर उजड़ चुका है। फोटो:  विकास चौधरी
फतेहपुर जिले का हडाही का डेरा मजरा यमुना की कटान के कारण तीन पर उजड़ चुका है। फोटो: विकास चौधरी
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कोरोनावायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश भर में लॉकडाउन की घोषणा होते ही बड़े शहरों में रह रहे प्रवासी मजदूर अपने घर लौटने लगे। चिंता थी कि 21 दिन के लॉकडाउन के दौरान काम नहीं मिला तो क्या करेंगे, कहां रहेंगे? रेल-बस सेवा बंद होने के बावजूद ये लोग पैदल ही अपने-अपने गांव की ओर लौट पड़े। कोई सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए अपने-अपने घर पहुंच चुका है तो लाखों मजदूरों को जहां-तहां रोक दिया गया है। लेकिन इस आपाधापी में एक सवाल पर बात नहीं हो रही है कि आखिर हर साल लाखों लोग पलायन क्यों करते हैं? डाउन टू अर्थ ने इन कारणों की व्यापक पड़ताल की है। इसे एक सीरीज में वेब में प्रकाशित किया जा रहा है। पढ़ें, पहली कड़ी-

उत्तर प्रदेश का फतेहपुर जिला देश के उन 75 जिलों में शामिल है, जहां से सबसे अधिक पलायन होता है। हालत यह है कि पलायन और विस्थापन से जूझते इस पिछड़े जिले के करीब 5 दर्जन गांव गैर आबाद हो चुके हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो गांव में रहने वाला कोई नहीं बचा है। कई गांवों के बहुत से मजरे (गांव की आबादी का एक हिस्सा जो पास ही कहीं बस जाता है। एक मजरे में 80-150 परिवार तक हो सकते हैं) ऐसे हैं, जो पिछले 10-15 साल में पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। कोर्रा कनक ऐसा ही गांव है जिसके करीब आठ मजरे उजड़ चुके हैं और इन मजरों में रहने वाले समस्त परिवार पलायन कर गए हैं अथवा विस्थापित हो गए हैं।

कोर्रा कनक एक बड़ा गांव है जहां करीब 25 हजार की आबादी है। गांव में करीब 12 हजार मतदाता हैं। इनमें लगभग 50 प्रतिशत मतदाता दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में रोटी रोटी की तलाश में पलायन कर चुके हैं। लेकिन अब लॉकडाउन और कोरोनावायरस के संकट को देखते हुए लोग अपने गांव लौट रहे हैं।

गांव के प्रधान दिनेश सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इस वक्त करीब 30 लोग अलग-अलग स्थानों से लौटकर गांव आ गए हैं। रोजी रोटी का साधन छिनने के बाद लोगों के पास घर वापसी के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। गांव से पलायन करने वाले अधिकांश वे लोग हैं जो प्रकृति की मार जैसे, बाढ़, सूखा, नदी का कटान, अतिशय बारिश के कारण गांव छोड़ने पर मजबूर हुए थे। गांव की करीब 12,000 बीघा जमीन यमुना की कटान की भेंट चढ़ चुकी है। इस कटान के चलते सैकड़ों किसान भूमिहीन हो चुके हैं। लॉकडाउन की स्थिति में गांव लौटने वाले ऐसे लोगों का जीवनयापन कैसे होगा, यह एक यक्ष प्रश्न है।

स्थानीय पत्रकार चंद्रभान सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि अगर लॉकडाउन लंबे समय तक जारी रहा तो गांव लौटने वाले लोगों के सामने भुखमरी के हालात पैदा हो जाएंगे। वह बताते हैं कि गांव से पलायन करने वाले अधिकांश लोग छोटी जोत वाले हैं। खेती से पेट न भरने और कुतरत की मार से त्रस्त होकर इन लोगों ने दूसरे राज्यों का रुख किया था। पलायन करने वाले अधिकांश मजदूर हैं। अब इन लोगों के सामने रोजी रोटी का दोहरा संकट खड़ा हो गया है।

डाउन टू अर्थ ने फतेहपुर जिले के करीब एक दर्जन गांवों का दौरा किया। इनमें से एक गांव है कोर्रा कनक। इस गांव के हड़ाही का डेरा मजरे में रहने वाली रामकली ने अपनी जिंदगी के 60 सालों के दौरान तीन बार अपने घर को यमुना की कटान में बहते हुए देखा है। अब उन्हें चौथी बार उजड़ने का डर सता रहा है। उनके घर के बिलकुल बगल से करीब 150 फीट की गहराई पर यमुना बह रही है। यमुना का तेज कटान किसी दिन उनके इस घर को भी ताश के पत्तों की तरह ढहा सकता है।

रामकली के जेहन में 1978 के बाढ़ की यादें अब भी ताजा हैं। इसी बाढ़ के बाद यमुना में कटान तेज हुआ और देखते ही देखते उनके घर और खेत हाथ से निकलते चले गए। रुंधे गले से रामकली बताती हैं, “1978 से पहले यमुना उनके वर्तमान घर से 5 किलोमीटर दूर बहती थी। कटान के बाद धारा बदली और यह हमारे लिए अभिशाप बन गई। हमारे पूरे 12 बीघा खेत यमुना की दूसरी तरफ चले गए। अब बांदा के लोग हमारा खेत जोत रहे हैं।”

रामकली की तरह उनकी बेटी उर्मिला को भी हर समय यही डर सताता रहता है कि कहीं किसी दिन रात को सोते-सोते उनका परिवार यमुना में न समा जाए। इसी डेरे में रह रहे 54 वर्षीय बसंत सिंह भी तीन बार विस्थापित हो चुके हैं। उनके 11 बीघा खेत कटान की भेंट चढ़ चुके हैं। केवल एक बीघा खेत ही बचा है। बसंत सिंह अपनी बुजुर्ग मां और पत्नी के साथ यहां रहते हैं। उनके दो बेटे हड़ाही का डेरा छोड़ चुके हैं।

हड़ाही का डेरा मजरे में सत्तर के दशक करीब 150 परिवार रहते थे। पिछले साल तक यहां 25 परिवार थे। लेकिन 2019 में आई बाढ़ और कटान के कारण इनमें से अधिकांश परिवार भी पलायन कर गए। वर्तमान में केवल 5 परिवार ही यहां हैं। इन परिवारों से भी ज्यादातर कमा सकने वाले लोग दूसरे राज्यों या शहरों में रोजगार की तलाश में चले गए हैं। घर में केवल महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे ही बचे हैं। रामकली का 40 वर्षीय बेटा देवेंद्र दिल्ली की एक एक्सपोर्ट कंपनी में 6,000 रुपए के मासिक वेतन पर काम रहे हैं। देवेंद्र के भेजे हुए पैसों से ही रामकली का घर चल रहा है। रामकली बताती हैं कि रोजी-रोटी के साधन खत्म होने और प्रकृति की मार के कारण पलायन के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचा है।

हडाही का डेरा की तरह कोर्रा कनक गांव का मैनाही की डेरा मजरा भी तीन बार उजड़ चुका है। कोर्रा कनक गांव के प्रधान दिनेश सिंह ने डाउन टू अर्थ बताया, “गांव में कुल 55 मजरे हैं। इनमें से आठ मजरे पूरी तरह खत्म हो गए हैं। अगर कटान इसी तरह जारी रहा तो अन्य मजरों का वजूद भी खत्म हो जाएगा।”

कोर्रा कनक गांव की करीब 13,000 बीघा जमीन कटान के चलते नदी के उस पार चली गई है। गांव के ज्यादातर किसानों के पास 5-10 बीघा जमीन है। कटान के कारण अधिकांश किसान भूमिहीन हो गए हैं। गांव के 12,000 मतदाताओं में से लगभग 6,000 मतदाता दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के शहरों और नोएडा में पलायन कर चुके हैं।

दिनेश सिंह बताते हैं, “गांव से पलायन करने वालों में 80 प्रतिशत वे लोग हैं जिनके खेत यमुना की कटान में जा चुके हैं। गांव का करीब पांच किलोमीटर क्षेत्र कटान में यमुना नदी के उस पार जा चुका है। ग्रामीणों के लिए नदी के उस पार जाकर खेती करना संभव नहीं है। उस पार बांदा जिले के प्रभावशाली लोगों ने नदी की धारा को सीमा मानकर खेतों पर कब्जा कर लिया है।”

दिनेश सिंह गांव से हो रहे पलायन के लिए नदी के कटान के अलावा बाढ़, असमय बारिश और ओलावृष्टि से खेती हो पहुंच रहे नुकसान को जिम्मेदार मानते हैं। कोर्रा कनक गांव पिछले साल आई बाढ़ में तीन तरफ से पानी से घिर गया था। बाढ़ के कारण गांव कई दिनों तक दुनिया से कटा रहा। ऐसे हालात में मजबूरन पलायन करना ही पड़ता है।

आगे पढ़ें, कुछ और गांवों की कहानी और पलायन के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कारण

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