प्रतिस्पर्धा के दौर की नई दुनिया

अब दुनिया ताकतवर नेताओं के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां हर देश को अपना आर्थिक भविष्य, अपने गठबंधन और समृद्धि का रास्ता खुद तय करना होगा
इलेस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
इलेस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
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“पुरानी दुनिया मर रही है, नई दुनिया जन्म लेने के लिए संघर्ष कर रही है और अब राक्षसों का समय है।” इतालवी दार्शनिक एंटोनियो ग्राम्शी का यह कथन आज राजनीतिक-नीतिगत विमर्श में बार-बार दोहराया जा रहा है और यह गलत भी नहीं है।

साल 2026 ने दुनिया की मौजूदा व्यवस्था को और ज्यादा अस्थिर और उलझन भरा बना दिया है। विश्व आर्थिक मंच में बोलते हुए कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कुछ कड़वी सच्चाइयों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि यह पुरानी व्यवस्था के टूटने का समय है। नियमों पर चलने वाली वैश्विक व्यवस्था अब टूट चुकी है और उसके दोबारा पहले जैसी होने की संभावना बहुत कम है।

आइए इसे साफ तौर पर समझते हैं। अब दुनिया ताकतवर नेताओं के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां हर देश को अपना आर्थिक भविष्य, अपने गठबंधन और समृद्धि का अपना रास्ता खुद तय करना होगा। इसका छिपा हुआ अर्थ और भी अहम है। चीन और अमेरिका के बीच वर्चस्व की दौड़ नए तरह के तनाव पैदा करेगी। यह तनाव जमीन और इलाकों को लेकर भी दिखेगा, जैसा कि वेनेज़ुएला और ग्रीनलैंड के मामलों में देखा जा रहा है, और तकनीक के क्षेत्र में भी, जैसे इलेक्ट्रिक वाहन और नवीकरणीय ऊर्जा बनाम पारंपरिक इंजन तथा तेल, गैस और कोयले की अर्थव्यवस्था।

राष्ट्रों के बीच इस तीखी प्रतिस्पर्धा में वैश्विक सहयोग सबसे बड़ा नुकसान झेल रहा है। यह सहयोग जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए बेहद जरूरी है। यह भी साफ समझ लेना चाहिए कि अब मामला सिर्फ जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जरूरी ऊर्जा संक्रमण (स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव) का नहीं रह गया है। असली लड़ाई कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण की है। चाहे रेयर-अर्थ मिनरल्स (धरती के दुर्लभ खनिज) हों, कोयला-तेल और उन्हें प्रोसेस करने वाली तकनीक पर पकड़ की बात हो। पेट्रो-स्टेट्स और इलेक्ट्रो-स्टेट्स के बीच की खाई वास्तविक है और यह मुकाबला बेहद कठोर है। जलवायु परिवर्तन इसमें एक तरह का ‘कोलैटरल डैमेज’ बनता जा रहा है। पेट्रो-स्टेट्स वे देश हैं जिनकी ताकत और कमाई मुख्य रूप से तेल, गैस और कोयले (फॉसिल फ्यूल) पर टिकी है। इलेक्ट्रो-स्टेट्स वे देश हैं जो बिजली आधारित नई अर्थव्यवस्था जैसे अक्षय ऊर्जा, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और साफ तकनीक पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

आज की भू-राजनीति में आर्कटिक (और ग्रीनलैंड) का महत्व अपने आप में एक बड़ी विडंबना है। जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया का यह “फ्रिज” पिघल रहा है और अब जहाज पृथ्वी के “ऊपरी हिस्से” से होकर महाद्वीपों के बीच ज्यादा तेजी से सफर कर सकते हैं।

ये नए समुद्री रास्ते रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इससे रूस और चीन को पश्चिमी गोलार्ध तक पहुंचने में बढ़त मिल सकती है। घटती बर्फ इस क्षेत्र के तेल और खनिज संसाधनों को भी दोहन के लिए खोल देगी।

लेकिन जो बात नजरअंदाज हो रही है, वह यह है कि दुनिया का यह “फ्रिज” वैश्विक मौसम प्रणालियों को संतुलित रखने में बेहद अहम भूमिका निभाता है। मगर मौजूदा व्यापार-प्रधान विश्व व्यवस्था में मानो इन बातों की परवाह कम रह गई है। अब फोकस सिर्फ मुनाफा कमाने पर है, चाहे वह वैश्विक नुकसान और तबाही की कीमत पर ही क्यों न हो।

फिर सवाल आता है नई पीढ़ी की हरित तकनीक वाली दुनिया के लिए खनिज दोहन का और इसका क्षेत्रीय दौड़ तथा पर्यावरण पर क्या असर होगा। अब तक आम धारणा थी कि दुनिया कोयला, लौह अयस्क और बॉक्साइट जैसे खनिजों की मांग के चरम (पीक) के करीब पहुंच रही है। लेकिन तेजी से बढ़ते विद्युतीकरण, हरित तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ढांचे की जरूरतों के कारण अब अनुमान है कि अगले लगभग एक दशक में तांबे की वैश्विक मांग दोगुनी हो जाएगी।

इसी वजह से सबसे बड़े तांबा भंडार वाले देश पेरू, चिली और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य अब वैश्विक नजरों में हैं। वैश्विक तांबे का लगभग 50 प्रतिशत प्रसंस्करण और शोधन चीन करता है।

मांग बढ़ने के साथ अधिक खदानें खुलेंगी, जो अक्सर घने जंगलों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों में खुलती हैं और तांबा गलाने वाले संयंत्रों (स्मेल्टर) की जरूरत बढ़ेगी। ये ऐसे संयंत्र हैं जिनमें प्रदूषण नियंत्रण के लिए भारी निवेश चाहिए होता है। यही स्थिति रेयर-अर्थ खनिजों लिथियम से लेकर ग्रेफाइट तक के साथ भी है।

चीन न सिर्फ इन आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करने में बहुत आगे निकल चुका है, बल्कि हरित तकनीक में भी अग्रणी बन गया है। दूसरे देश अब उसकी बराबरी करने के लिए हड़बड़ी में नए खदान स्रोत और समझौते खोज रहे हैं। इसका हमारे भविष्य पर क्या असर होगा, इसकी झलक आज के छोटे-छोटे टकरावों में ही दिखने लगी है।

मेरे मन में दो बड़े सवाल हैं, जो हमारी वास्तविक दुनिया में तय करेंगे कि आगे क्या होगा। पहला- जब देश आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करने और औद्योगीकरण को पुनर्जीवित करने के लिए उत्पादन को अपने यहां वापस (ऑन-शोरिंग) ला रहे हैं, तो क्या समृद्ध देश, जो पहले पर्यावरण और श्रम की ऊंची लागत के कारण उत्पादन बाहर भेजते थे (ऑफ-शोरिंग), अब उन लागतों को अपने यहां स्वीकार करेंगे? या फिर वे वैश्विक मानकों को इस तरह बदलेंगे कि दुनिया भर में उत्पादन महंगा हो जाए?

दक्षिण अमेरिका के साथ यूरोपीय संघ की मर्कोसुर साझेदारी का उसके किसान खाद्य सुरक्षा मानकों के मुद्दे पर विरोध कर रहे हैं। इसी तरह यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म भी आगे बढ़ाया जा रहा है, जबकि इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं के उद्योगों पर डीकार्बोनाइजेशन की लागत और बढ़ेगी।

दूसरा बड़ा सवाल है कि देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा और अपनी-अपनी सोच वाली नीतियां मिलकर हरित तकनीक की प्रगति को कैसे प्रभावित करेंगी, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जरूरी है।

दावोस में हुए विश्व आर्थिक मंच 2026 में यह विरोधाभास साफ दिखा। एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व में जीवाश्म ईंधन को बढ़ावा देने की पहल थी तो दूसरी ओर चीन के उप-प्रधानमंत्री देशों से “हरित अवसंरचना, हरित ऊर्जा, हरित खनिज और हरित वित्त” पर सहयोग बढ़ाने की अपील कर रहे थे।

देश अब एक कठिन स्थिति में फंसे हैं। उन्हें घरेलू बनाम आयातित ऊर्जा स्रोतों के बीच संतुलन बैठाना है, और साथ ही भविष्य की आपूर्ति शृंखलाओं के लिए किन वैश्विक गठबंधनों पर भरोसा करें, यह भी तय करना है।

साथ ही यह सवाल भी है कि देश अपने यहां क्या-क्या उत्पादन कर पाएंगे और क्या वे चीनी प्रतिस्पर्धा के सामने अपने उद्योगों को बचा सकेंगे। पिछले साल चीन का व्यापार अधिशेष रिकॉर्ड 1.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। वह लगभग हर चीज अधिकांश देशों की तुलना में सस्ते में बना और उपलब्ध करा सकता है। ऐसे में हर देश की घरेलू विनिर्माण बढ़ाने और आर्थिक वृद्धि की योजनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा?

एक नई दुनिया आकार ले रही है। हमें जल्द जवाब खोजने होंगे ताकि यह दुनिया लोगों और पृथ्वी दोनों के लिए बेहतर साबित हो सके।

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