

विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया में जनसांख्यिकीय लाभांश का दौर खत्म हो रहा है, क्योंकि कामकाजी उम्र की आबादी की वृद्धि दर धीमी पड़ रही है।
2034 तक क्षेत्र में कामकाजी उम्र के लोगों की आबादी का अनुपात अपने चरम पर पहुंच जाएगा। इसके बाद 2049 तक दक्षिण एशिया वृद्ध आबादी वाली अर्थव्यवस्था में बदल जाएगा।
प्रति व्यक्ति आय पहले से ही कम होने के बीच आबादी में यह तेज बदलाव आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकता है। इससे निपटने के लिए तत्काल नीतिगत कदम उठाने की जरूरत है।
दक्षिण एशिया में दुनिया की कामकाजी उम्र की आबादी का करीब 22 प्रतिशत हिस्सा रहता है, लेकिन इस क्षेत्र में आबादी की उम्र तेजी से बढ़ रही है। यह दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों में शामिल दक्षिण एशिया के लिए एक चेतावनी का संकेत है।
विश्व बैंक की 3 नवंबर को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, अगले एक दशक से भी कम समय में दक्षिण एशिया की कामकाजी उम्र की आबादी अपने चरम पर पहुंच जाएगी और इसके बाद इसमें गिरावट शुरू हो जाएगी।
रिपोर्ट कहती है, "2049 तक दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था एक वृद्ध होती अर्थव्यवस्था बन जाएगी, जहां कुल आबादी का 14 प्रतिशत हिस्सा 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र का होगा।"
भारत सहित दक्षिण एशिया के देशों में दुनिया की कामकाजी उम्र की आबादी का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा रहता है। इसका मतलब है कि दुनिया का हर पांचवां कामगार इसी क्षेत्र में रहता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई दशकों में जनसांख्यिकीय अनुकूलता ने आर्थिक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे पहला जनसांख्यिकीय लाभांश भी कहा जाता है। इस दौरान कामकाजी उम्र के वयस्कों की संख्या बढ़ी और उन पर निर्भर रहने वाले बच्चों तथा बुजुर्गों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। इसके चलते कामकाजी आबादी के पास कम आश्रितों की जिम्मेदारी थी और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला।
इस जनसांख्यिकीय बदलाव ने दक्षिण एशिया की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि में हर साल अनुमानित 0.4 प्रतिशत अंक का योगदान दिया। भारत में यह योगदान 0.5 प्रतिशत अंक आंका गया है। कामकाजी उम्र की आबादी बढ़ने से श्रम उत्पादकता की वार्षिक वृद्धि दर में भी 0.4 से 1.1 प्रतिशत अंक तक का इजाफा हुआ।
लेकिन अब जनसांख्यिकीय लाभांश का यह दौर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1960 से 2023 के बीच दक्षिण एशिया में कामकाजी उम्र की आबादी औसतन हर साल 2.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी। लेकिन 2024 से 2050 के बीच इसके घटकर सालाना महज 0.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
कामकाजी उम्र की आबादी में कमी से आर्थिक विकास में जनसांख्यिकीय कारकों का योगदान काफी घट जाएगा। विश्व बैंक का अनुमान है कि इसी अवधि में जीडीपी वृद्धि में जनसांख्यिकीय कारकों का योगदान तीन-चौथाई घटकर सालाना करीब 0.1 प्रतिशत अंक रह जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2034 तक दक्षिण एशिया की कुल आबादी में कामकाजी उम्र के लोगों की हिस्सेदारी अपने चरम पर पहुंच जाएगी, जबकि 2049 तक यह क्षेत्र वृद्ध आबादी वाले क्षेत्र की श्रेणी में आ जाएगा।
भारत में भी कामकाजी उम्र की आबादी अगले एक दशक से कम समय में अपने चरम पर पहुंच जाएगी।
दक्षिण एशिया में आबादी के वृद्ध होने से लेकर वृद्ध आबादी वाले क्षेत्र में बदलने की प्रक्रिया दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों की तुलना में तेजी से हो रही है। चिंता की बात यह है कि यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब इस क्षेत्र की औसत प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे कम आय वाले क्षेत्रों में शामिल है।
विश्व बैंक के अनुसार, एक औसत विकासशील अर्थव्यवस्था को वृद्ध होती आबादी से वृद्ध आबादी वाली अर्थव्यवस्था बनने में 32 साल लगे हैं। इसके मुकाबले दक्षिण एशिया यह बदलाव महज 25 साल में पूरा कर लेगा। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र के पास रोजगार के अवसर पैदा करने और आबादी की उम्र बढ़ने से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी व्यवस्थाएं तैयार करने का समय भी कम होगा।