अमीरों के फायदे के लिए बनी व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई

अमीरों के फायदे के लिए बनी व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

सरकारों पर भरोसा कम होने की शासन संबंधी प्रमुख वजह असमानता है
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जी20 देशों में लोग अपनी सरकारों पर भरोसा खो रहे हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि शासन व्यवस्था को इस तरह बनाया गया है कि उसका फायदा अमीर और ताकतवर लोगों को मिल रहा है। इस अविश्वास के केंद्र में बढ़ती असमानता है।

अर्थ4ऑल एंड इप्सोस के “अर्थ फॉर ऑल सर्वे 2026” ने मौजूदा शासन व्यवस्था को लेकर लोगों की धारणा को सामने रखा है। अर्थ4ऑल, क्लब ऑफ रोम, पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च, स्टॉकहोम रेजिलिएंस सेंटर और नॉर्वेजियन बिजनेस स्कूल की पहल है। अर्थ4ऑल का यह तीसरा सर्वेक्षण है और इसमें “सामाजिक एकजुटता और सामाजिक तनाव” जैसे परिवर्तन की गति बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कारकों का अध्ययन किया गया है। इससे पहले के सर्वेक्षणों में वैश्विक सामुदायिक संसाधनों और पृथ्वी के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित किया गया था।

असमानता अब महज एक धारणा नहीं रह गई है, बल्कि लोगों के व्यापक अनुभव का हिस्सा बन चुकी है। “रीबिल्ड ट्रस्ट” शीर्षक वाली सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों का सरकारों पर भरोसा कम होने के पीछे असमानता सबसे प्रमुख शासन संबंधी कारक है।

भारत समेत जी20 देशों में किए गए इस सर्वेक्षण में हर सात में से एक व्यक्ति ने कहा कि उनके देश में असमानता बहुत अधिक है। इसका सबसे प्रमुख कारण लोगों ने ऐसी शासन व्यवस्था को बताया, जो अमीर और ताकतवर लोगों के फायदे के लिए बनाई गई है। सर्वेक्षण में शामिल एक-तिहाई लोग भी यह नहीं मानते कि उनकी सरकार आज से 20 या 30 साल बाद भी लोगों के हित में फैसले लेगी।

यानी लोगों का यह भरोसा लगभग खत्म हो चुका है कि सरकारें लंबे समय में जनता के हित में काम करेंगी। सर्वेक्षण में पाया गया कि ज्यादातर लोग अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत महसूस करते हैं।

इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क में सामाजिक विज्ञान की पब्लिक अंडरस्टैंडिंग की प्रोफेसर और सर्वेक्षण रिपोर्ट की सह-लेखिका केट पिकेट कहती हैं, “सभी आय वर्ग में लोग एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि व्यवस्था में हेराफेरी की गई है और असमानता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। भरोसे का खत्म होना बेहद चिंताजनक है। जब लोग यह मानना बंद कर देते हैं कि उनकी सरकार लंबे समय में उनके हित में काम करेगी तो इससे उस साझा भविष्य की भावना कमजोर होती है जिस पर स्वस्थ समाज निर्भर करते हैं।”

लोगों का यह अविश्वास किस तरह सामने आ रहा है? सर्वेक्षण के मुताबिक, लोगों का लोकतंत्र में भरोसा अब भी कायम है, लेकिन वे “इसे तेजी से चुनौती भी दे रहे हैं।” 68 प्रतिशत लोगों ने लोकतंत्र को शासन का सबसे अच्छा तरीका माना। वहीं करीब 40 प्रतिशत ने कहा कि “उनके देश की स्थिति ऐसे मजबूत नेता के साथ बेहतर होगी, जो संसद और चुनावों से बंधा हुआ न हो।” कई उच्च-मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा आधे से भी अधिक है।

भारत में सरकार पर भरोसे की स्थिति कुछ अलग है। सर्वेक्षण में शामिल करीब 60 प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि उन्हें सरकार पर अधिक भरोसा है। इतने ही लोगों ने सरकार की ओर से लंबे समय में लोगों के हित में कदम उठाए जाने पर भी भरोसा जताया। हालांकि यह 2024 के 75 प्रतिशत के स्तर से काफी कम है, फिर भी भारत में सरकार पर भरोसे का स्तर वैश्विक औसत से अधिक है।

लेकिन भारतीय तानाशाही शासन के समर्थन में भी आगे दिखाई देते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 61 प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि “भारत के लिए बेहतर होगा कि उसके पास ऐसा मजबूत नेता हो जिसे संसद और चुनावों की परवाह करने की जरूरत न हो।” यह वैश्विक औसत से काफी अधिक है। क्या इसकी वजह लोगों का ऐसे समाज में बड़ा होना है जहां समानता का स्तर कम है? सर्वेक्षण के मुताबिक, दो-तिहाई भारतीयों को लगता है कि देश में असमानता बहुत अधिक है। हालांकि यह वैश्विक औसत से कम है। इसे भारत के निम्न-मध्यम आय वाले देश होने के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि 40 प्रतिशत भारतीय “अगले 12 महीनों में अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसा न होने को लेकर चिंतित” हैं। लेकिन दूसरे देशों के लोगों की तरह भारतीय भी मानते हैं कि व्यवस्था अमीरों के फायदे के लिए बनाई गई है।

हैरानी की बात यह है कि निम्न-आय वाले परिवारों के लोग उच्च-आय वाले परिवारों की तुलना में इस बात से कम सहमत हैं कि व्यवस्था में हेराफेरी की गई है। यह सर्वेक्षण मौजूदा दौर की उस स्थिति को फिर सामने लाता है, जो शायद एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। देश बंटे हुए हैं, राजनीतिक ध्रुवीकरण इस खाई को और गहरा कर रहा है और बढ़ती असमानता उन लोगों का व्यवस्था पर भरोसा खत्म कर रही है, जिन्हें उन्होंने खुद चुना है। सर्वेक्षण भी कहता है, “समाज खुद को टूटते हुए देख रहा है।”

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