

टिहरी की चंबा तहसील के चोपड़ियाल गांव में खेती ज्यादातर महिलाएं करती हैं, लेकिन गांव की एक विधवा महिला को छोड़ अन्य किसी भी महिला के नाम पर जमीन नहीं है।
महिलाओं के भूमि स्वामित्व पर कोई स्पष्ट आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। पीएम किसान योजना का डेटा बताता है कि हर 10 लाभार्थियों में सिर्फ दो–तीन महिलाएं हैं। ये योजना उन्हीं किसानों को मिलती है जिनके नाम जमीन होती है।
महिलाएं जमीन को सामाजिक सुरक्षा से जोड़कर देखती हैं और बेटियों-बहुओं के भूमि अधिकार की मांग करती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कानून के बावजूद इसे लागू करने वाला मजबूत ढांचा अब भी नहीं है।
उत्तराखंड के टिहरी जिले के चंबा तहसील में हिमालय की गोद में बसे इस छोटे से पहाड़ी गांव के पहले दृश्य से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ये मेहनतकश किसान महिलाओं का गांव है। सड़क से नीचे पहाड़ की ढलान पर बसे तकरीबन सभी घरों के पास छोटे-छोटे खेत हैं। खेतों से लगे पेड़ों की टहनियों पर जंगल से लाया गया पशुओं का चारा सुखाने के लिए रखा गया है। सर्दियोंभर पशुओं के भोजन का बंदोबस्त हो गया है।
सेब, अखरोट, खुबानी के पेड़ पत्तियों को झाड़कर दिसंबर की ठंड को सोख रहे हैं। ठंड जितनी ज्यादा मिलेगी फल उतने बेहतरीन होंगे। कुछ खेतों के उपर कीवी की इठलाती बेलें जंगली जानवरों के हमले से बचने के प्रगतिशील उपाय के तौर पर देखी जा सकती हैं। आलू-मटर जैसी सब्जियों को नुकसान पहुंचाने वाले जंगली सूअर और बंदरों के झुंड को कीवी खास पसंद नहीं आता।
चोपड़ियाल गांव के चुरेड़धार तोक में करीब 40 परिवार रहते हैं। यहां ज्यादातर पुरुष नौकरी के लिए गांव से बाहर रहते हैं और ज्यादातर महिलाएं अपने घरों, खेतों, बगीचों, गांव और जंगल का जिम्मा संभालती हैं। एक परिवार ऐसा भी है, जहां सिर्फ एक महिला अकेले रहती है।
शकुंतला देवी घर से लगे अपने खेत और बगीचे दिखाती हैं। उनके पास करीब 15 नाली क्षेत्र में खेत है। कीवी का बगीचा घर के पिछले हिस्से में कुछ उपर है। जबकि घर के सामने के निचले हिस्से में सेब के करीब एक दर्जन पेड़ हैं। इसके अलावा पुलम, खुबानी और अखरोट के पेड़ भी हैं। राई, मूली, गोभी, पत्तागोभी जैसी मौसमी सब्जियों की फ़सल लेने के बाद वह अब मटर बोने की तैयारी कर रही हैं।
उत्तराखंड में पारंपरिक जमीन इकाई एक नाली जमीन लगभग एक बैडमिंटन कोर्ट के आकार के बराबर होती है। ऐसे लगभग 50 कोर्ट मिलकर एक हेक्टेयर बनता है।
खेती से जुड़े छोटे-छोटे फ़ैसले शकुंतला खुद करती हैं, “खेतों में क्या उगाना है, इनकी देखरेख, खाद तैयार करने जैसे काम मेरे हैं। मेरे पति हल लगाने में मदद करते हैं। मेरे पास 15 पशु हैं और उनके लिए जंगल से चारापत्ती लाने का काम भी मेरा है। पशु के गोबर से हम खाद तैयार करते हैं और खेतों में इस्तेमाल करते हैं। इससे मिट्टी स्वस्थ्य रहती है और पहाड़ हरे-भरे”।
दरांती, कुटली, फावड़े जैसे खेती के औजारों को संभालती प्रगतिशील किसान शकुंतला का नाम उनके खेतों के काग़ज़ों पर नहीं है। खेत और घर उनके पति सत्यप्रसाद डबराल के नाम पर हैं और काग़ज़ पर सिर्फ वे किसान हैं। इसीलिए किसानों के लिए देशभर में लोकप्रिय सरकारी योजना पीएम किसान सम्मान निधि भी उन्हीं के खाते में आती है।
“हमने धरती को बंजर होने से बचाया लेकिन जमीन के कागजों में हमारा नाम नहीं”
घर के बरामदे के एक हिस्से में तीखी धूप और दूसरे हिस्से की छांव में ठिठुराती सर्दी है। गांव की महिलाएं धूप वाले हिस्से में इकट्ठा होती हैं। महिलाओं ने खेती की अपनी उपज को व्यवसायिक पहचान देने के लिए उजाला स्वयं सहायता समूह बनाया है। समूह की बैठकों में आमतौर पर वे खेत की मिट्टी, उपज और मूल्य जैसे विषयों पर चर्चा करती हैं लेकिन आज मुद्दा खेत की ज़मीन पर अधिकार का है।
“मुझे पैसों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ता। मैं पिछले 40 वर्षों से खेती कर रही हूं। जब से समूह से जुड़ी हूं खेती से होने वाली आमदनी अपने ही पास रखती हूं। मेरे पति नौकरी करते हैं लेकिन खेत की ज़मीन उन्हीं के नाम पर है। मुझे पता है कि जिसके नाम पर जमीन होती है, असल ताकत उसी के पास होती है। महिलाओं को पूरा जीवन दबकर गुजारना पड़ता है। वे न मायके की होती हैं, न ही ससुराल की। जमीन पर अधिकार हमें मायके और ससुराल दोनों में मजबूत बनाएगा।”
सावित्री देवी तीन बेटियों और एक बेटे की शादी कर चुकी हैं, कहती हैं, “जब सभी लोग महिलाओं को ज़मीन पर अधिकार देंगे तभी बदलाव संभव है”, उनकी इस बात पर यहां मौजूद अन्य महिलाएं सहमति जताती हैं।
बेटी, बहू, विधवा महिला, किसे मिला अधिकार
“ज़मीन पर अधिकार और लैंगिक भेदभाव निर्णायक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं”। यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनचेस्टर (यूके) के ग्लोबल डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट में विकास अर्थशास्त्र और पर्यावरण की प्रोफेसर बीना अग्रवाल ने भारत समेत दक्षिण एशिया में महिलाओं के भूमि अधिकारों पर महत्वपूर्ण और व्यापक शोध किया है। अपनी एक रिपोर्ट में वह लिखती हैं, “संपत्ति के स्वामित्व और नियंत्रण में लैंगिक असमानता ही महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक स्थिति और सशक्तिकरण में सबसे बड़ा फर्क पैदा करता है”।
भारत में महिलाओं को समान उत्तराधिकार अधिकार देने की कानूनी सुधार प्रक्रिया आज़ादी के बाद शुरू हुई। वर्ष 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के जरिए हिंदू महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को पहली बार कानूनी मान्यता मिली। सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन के साथ आया। इसके तहत हिंदू महिलाओं को कृषि भूमि समेत हर तरह की संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिला और बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार बनाया गया, चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित।
अर्थशास्त्री बीना अग्रवाल के शोध के अनुसार कानूनी सुधारों ने बेटी के रूप में महिलाओं को मजबूत किया है, पैतृक संपत्ति में उनका हक़ बढ़ा है। लेकिन व्यवहार में जमीन का स्वामित्व अधिकतर महिलाओं को विधवा के रूप में मिला है, न कि बेटी के रूप में, “महिला के सशक्तिकरण के लिए ये महत्वपूर्ण है कि उन्हें जमीन किस रूप में और किस उम्र में मिलती है। बेटी के रूप में अधिकार मिलने से परिवार में उसकी निर्णय क्षमता बढ़ती है। विवाहित महिलाओं के नाम पर जमीन होना उन्हें घरेलू हिंसा से सुरक्षित बनाता है”।
चोपड़ियाल गांव की अकेली महिला, जिनके नाम पर ज़मीन है, वह लक्ष्मी देवी हैं। 9 वर्ष पहले पति की मृत्यु के बाद दो बेटों के साथ उनका नाम काग़ज पर चढ़ा। दोनों बेटे नौकरी के लिए सपरिवार अलग-अलग शहरों में रहते हैं और वह गांव के अपने घर में अकेली रहती हैं। “मैं खुद ही अपने खेतों को हरा-भरा रखती हूं। यहां तक कि जुताई भी मैं ही करती हूं। जब बारिश नहीं होती, मिट्टी बहुत सख्त हो जाती है, और इसमें बहुत मेहनत लगती है।”
लक्ष्मी देवी को इस बात का मलाल है कि जब जमीन उनके और बेटों के नाम दर्ज हुई, उनकी बेटी को ये अधिकार नहीं मिला, “हम बेटी के विवाह में अपनी ख़ुशी से दान देते हैं लेकिन उसे उसका अधिकार नहीं देते”।
आंकड़े और अधिकार- दोनों अधूरे
वर्ष 2023 में चोपड़ियाल गांव को स्वच्छता, हरियाली और कार्बन न्यूट्रल श्रेणी में राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार मिल चुका है। अपने गांव के लिए ये गर्व जुटाने वाली ज्यादातर महिलाएं सीधे किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं ले पातीं।
शहर में नौकरी के लिए पुरुषों का पलायन और पहाड़ में बंजर छोड़े गए खेतों को गांवों में रह रही महिलाएं अपनी मेहनत से सींच रही हैं। चोपड़ियाल गांव की किसान महिलाओं की तरह ही भारत समेत अधिकांश देशों में आधी आबादी का ज़मीन पर कानूनी अधिकार सीमित है। संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन ने अपनी वेबसाइट पर इसका उल्लेख किया है।
“सामाजिक नियमों, परंपरा और कानून के चलते कई देशों में संपत्ति पर महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और गरीबी से बाहर निकलने के अवसरों में रुकावट आती है। यहां तक कि ऐसे देश जहां ज्यादातर छोटे किसान महिलाएं ही हैं और 75% से ज्यादा खेती का काम करती हैं, उन्हें अक्सर ज़मीन पर मालिकाना हक नहीं दिया जाता जबकि अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए वे इसी पर निर्भर होती हैं”।
भारत में महिलाओं के ज़मीन और घर पर स्वामित्व को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड इंडिया ने दिसंबर 2023 में प्रकाशित अपने एक लेख में वर्ष 2014-15 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-4 और वर्ष 2019-21 के एनएफएचएस-5 रिपोर्ट में संपत्ति से जुड़े आंकड़ों की तुलना की। इस अवधि में देश में सिर्फ महिला के नाम पर भू-स्वामित्व करीब 7% से बढ़कर 8% हुआ। वहीं, महिला-पुरुष का संयुक्त भू-स्वामित्व करीब 21% से बढ़कर 23% हुआ।
“जमीन से हमारी सुरक्षा भी जुड़ी हुई है”, चोपड़ियाल गांव में महिलाओं से बातचीत के दौरान ग्रामीण सुषमा पुंडीर आक्रोश जताती हैं, “पति के साथ कभी अनबन हो जाती है तो वो महिला को सीधा घर से निकलने को कहता है। अपनी ज़मीन पर खेती कर महिला अपनी आजीविका चला सकती है। इसलिए बेटी और बहू दोनों को ज़मीन पर अधिकार मिलना चाहिए”।
“हमने धरती को बंजर होने से बचा रखा है। जंगल भी महिलाओं ने बचाये हैं। पहाड़ अगर हरे-भरे हैं तो हम महिलाओं की वजह से ही हैं। हम जानते हैं कि ये जंगल बचे रहेंगे तो हमारा पशुपालन, खेती और आजीविका बचेगी।” सुषमा धरती की हरियाली संजोने में महिलाओं की दिन-रात की मेहनत का जिक्र करती हैं।
पहाड़ में खेती-बागवानी से बेहतर आजीविका हासिल करने के लिए ग्रामीणों के बीच कार्य कर रही संस्था हिमोत्थान सोसाइटी के क्लस्टर कॉर्डिनेटर अनिल रमोला बताते हैं, “महिलाएं ही गांव में खेती-बाड़ी और पशुपालन कर रही हैं। पॉलीहाउस लगाने, खेती के लिए अच्छी गुणवत्ता के बीज और पौध दिलवाने, बगीचे लगाने, बैंक से ऋण लेने जैसे कार्य में हम उनकी मदद करते हैं। जब हम महिलाओं को खेती से जुड़ी सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास करते हैं तो भू-स्वामित्व न होने से दिक्कत आती है। ऐसे में हम एक शपथ पत्र दाखिल करवाते हैं कि मैं इस परिवार से हूं, मेरे पति का नाम ये है, और खाता-खतौनी में उनके नाम की ज़मीन ये है।”
रमोला बताते हैं कि कई बार शहर से बाहर रह रहे पुरुष इन कार्यों में दिलचस्पी नहीं लेते और महिला चाहकर भी इन योजनाओं का लाभ नहीं ले पाती। वे पॉलीहाउस लगाने से जुड़ी योजना का उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक, “महिलाओं को बैंक से ऋण लेने में दिक्कत आती है। यहां ऐसी कोई महिला नहीं है जिसके अकेले के नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड बना हो। पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ भी ज्यादातर महिलाओं को नहीं मिलता।”
पीएम किसान सम्मान निधि योजना के आंकड़े महिला किसानों के जमीन पर अधिकार की स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट करते हैं। दिसंबर 2024 को राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में बताया गया कि देशभर में इस योजना के तहत 8.70 करोड़ से अधिक योग्य लाभार्थी हैं। इनमें महिलाओं की संख्या 2 करोड़ से कुछ कम है। यानी हर 10 लाभार्थी में से सिर्फ दो या तीन महिला है।
वहीं, उत्तराखंड में पीएम किसान सम्मान निधि के कुल लाभार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 16 प्रतिशत है, यानी हर दस लाभार्थियों में एक या दो ही महिला होती है।
‘अमल नहीं हुआ तो दिखावा बनकर रह जाएंगे ये अधिकार’
“काग़ज़ पर बने कानून यह पक्का करते हैं कि ज़मीन और जंगल पर महिलाओं के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक फ्रेमवर्क मौजूद है। लेकिन इन अधिकारों का पूरी तरह से फ़ायदा उठाने के लिए एक ऐसा ढांचा होना चाहिए जो कानूनों के नियमों को लागू करे। ताकि अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में महिलाएं अपने अधिकारों का फ़ायदा ले सकें। इसलिए अगर कानूनों को लागू नहीं किया जाता है तो महिलाओं के लिए ये अधिकार सिर्फ़ एक दिखावा बनकर रह जाएंगे”, ओडिशा के पूर्वी घाट में आदिवासी समुदाय के अधिकारों के लिए कार्य कर रही शरण्या नायक कहती हैं कि ज़मीन सिर्फ खेती का साधन ही नहीं बल्कि अस्तित्व का आधार भी है।
शरण्या एशिया पैसेफिक फोरम ऑन विमेन, लॉ एंड डेवलपमेंट (एपीडब्ल्यूएलडी) की सदस्य संस्था राइट्स फोरम की कार्यक्रम सलाहकार हैं।
हिमालयी पर्वत श्रृंखला से दूर ओडिशा के पूर्वी घाट में रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों में फैले गंधमर्दन पर्वत श्रृंखला की एक पहाड़ी तिजमाली पर बसे आदिवासी कांधा समुदाय की महिलाएं ज़मीन पर अपने अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
शरण्या तस्वीर साझा करती हैं, लाठी-डंडे लिए महिलाएं वेदांता के बॉक्साइट माइनिंग प्रोजेक्ट का विरोध कर रही हैं। पिछले दो वर्षों से अपनी ज़मीन पर हक़ न छिनने को लेकर ये विरोध प्रदर्शन जारी है। वह बताती हैं, “आदिवासी महिलाओं के लिए तिजमाली सिर्फ़ बॉक्साइट के भंडार वाला पहाड़ नहीं है, बल्कि उनके देवता तिज राजा का निवास स्थान है। वे सभी के लिए अच्छी बारिश, फ़सल और भोजन की प्रार्थना करते हैं। फ़सल कटाई के बाद देवता को नई फ़सल चढ़ाकर धन्यवाद देते हैं।“
शरण्या कहती हैं, “भू-अधिकार महिलाओं के स्वनिर्णय और गरिमा के लिए जरूरी है। ज़मीन के अधिकार से उन्हें आजीविका के साधनों पर नियंत्रण मिलता है और वे आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हो सकती हैं। अपने ऊपर होने वाले हर तरह के अन्याय और हिंसा को चुनौती देने की ताकत मिलती है। यह पक्का होता है कि वे बिना किसी भय के अपनी ज़िंदगी के फैसले ले सकती हैं”।
अधिकार की रक्षा और इस्तेमाल की जागरुकता भी जरूरी
“महिलाओं को ज़मीन पर कानूनी अधिकार देना जरूरी है लेकिन उस अधिकार की रक्षा और सही इस्तेमाल के लिए उन्हें सक्षम बनाना भी उतना ही अहम है”, दलित महिलाओं के अधिकार को लेकर लंबे समय से काम कर रही एम. गजलक्ष्मी आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के मगराजपुर गांव की 40 दलित महिलाओं का उदाहरण देती हैं, जिन्हें वर्ष 2010 में सरकारी योजना के तहत जमीन के पट्टे दिए गए थे। वह आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में कार्य कर रही संस्था सोसाइटी फॉर रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट से जुड़ी हैं।
गजलक्ष्मी बताती हैं, “इन महिलाओं को जो ज़मीन मिली, वह पट्टे के रूप में थी, जिसकी न तो स्पष्ट सीमाएं तय की गईं और न ही खेती के लिए पानी या अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। कई महिलाओं को यह तक पता नहीं था कि उन्हें दी गई जमीन कहां स्थित है”।
“रोजगार के विकल्प न होने के कारण परिवारों ने पहले पट्टाधारित ज़मीन की मिट्टी बेची और बाद में पट्टों के काग़ज़ बैंक में गिरवी रखकर कर्ज़ लिया। आज ये महिलाएं न तो बैंक कर्ज़ चुकाने की स्थिति में हैं और न ही अपनी ज़मीन पर नियंत्रण बनाए रखने की”।
गजलक्ष्मी के अनुसार, “ज़मीन का महिलाओं के नाम पर होना अपने-आप में सशक्तिकरण नहीं है, जब तक उस अधिकार को बचाने और इस्तेमाल करने के लिए सामाजिक और संस्थागत समर्थन न हो”।
उत्तराखंड के चोपड़ियाल गांव की महिलाओं के पास खेती को बेहतर बनाने के लिए संस्थागत समर्थन है और इसी वजह से वे अपने छोटे-छोटे खेतों और बगीचों से आत्मनिर्भर हो रही हैं। हालांकि अपने हिस्से की ज़मीन के लिए वे सामाजिक परंपराओं के बदलने का इंतजार कर रही हैं।
किसान बहन
गांव में मौजूद गिने-चुने पुरुषों में से एक, शकंतुला देवी के पति सत्यप्रसाद डबराल इस बदलाव के लिए सरकार के पहल की बात करते हैं, “ये सही है कि महिलाओं को भू-स्वामित्व मिलने से उनका अधिकार बढ़ेगा, वे और अच्छा कार्य करेंगी। सभी लोग बेटी-बहू के नाम ज़मीन करें इसके लिए सरकार को पहल करनी होगी। इसमें हम पुरुषों के लिए डरने जैसी कोई बात नहीं”।
चोपड़ियाल गांव की किसान महिलाएं हंसती हैं, “तब रेडियो पर किसान भाइयों की जगह किसान बहनों के लिए समाचार दिया जाएगा”।
( यह स्टोरी इंटरन्यूज के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से प्रकाशित की गई है )