आर्थिक सर्वेक्षण 2025-25: तेजी से बढ़ती गिग अर्थव्यवस्था को व्यापक सुधार की जरूरत

गिग अर्थव्यवस्था नीति का लक्ष्य ऐसा ढांचा बनाना होना चाहिए जिसमें कामगारों के पास वास्तविक विकल्प हों, न कि कमजोर मांग, कौशल असंतुलन या सामाजिक सुरक्षा के अभाव में उन्हें गिग काम अपनाने को मजबूर होना पड़े
फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में गिग अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ते प्रभाव को स्वीकारते हुए नीतिगत सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

  • गिग श्रमिकों की संख्या में 55% की वृद्धि हुई है, लेकिन आय की अस्थिरता और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • सरकार ने कौशल विकास और वित्तीय समावेशन पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की है।

गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाले श्रमिकों की बढ़ती संख्या और उनकी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में नीतिगत बदलावों की जरूरत पर जोर दिया है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि “गिग अर्थव्यवस्था नीति का उद्देश्य यह होना चाहिए कि श्रमिक अपनी मर्जी से इस क्षेत्र में काम करें, न कि कमजोर रोजगार मांग, कौशल असंतुलन या सुरक्षा जाल के अभाव के कारण गिग काम करने को विवश हों।”

सर्वेक्षण के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 में जहां गिग श्रमिकों की संख्या 77 लाख थी, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह बढ़कर 1.20 करोड़ हो गई है, यानी करीब 55 प्रतिशत की वृद्धि। यह तेज बढ़ोतरी 80 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं और हर महीने लगभग 15 अरब यूपीआई लेन-देन के कारण संभव हुई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि गिग श्रमिक अब भारत की कुल श्रमशक्ति का 2 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। गिग रोजगार की वृद्धि दर कुल रोजगार वृद्धि से तेज है। अनुमान है कि 2029-30 तक गैर-कृषि गिग रोजगार कुल कार्यबल का 6.7 प्रतिशत होगा और यह क्षेत्र जीडीपी में करीब 2.35 लाख करोड़ रुपए का योगदान देगा।

नीति आयोग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए सर्वेक्षण में कहा गया है कि 2030 तक उच्च-कौशल गिग श्रमिकों की हिस्सेदारी 27.5 प्रतिशत और निम्न-कौशल गिग श्रमिकों की हिस्सेदारी 33.8 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि गिग अर्थव्यवस्था के तेज विस्तार के बावजूद आय में अस्थिरता बनी हुई है, जिससे श्रमिकों को ऋण तक पहुंचने में कठिनाई होती है। वित्तीय समावेशन भी गिग श्रमिकों के लिए पिछड़ा हुआ है। अधिकांश गिग श्रमिकों की ‘थिन-फाइल’ क्रेडिट प्रोफाइल होती है, जो एक बड़ी चिंता है।

रिपोर्ट के अनुसार, प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म काम के आवंटन, प्रदर्शन की निगरानी, मजदूरी और मांग-आपूर्ति के संतुलन को नियंत्रित करते हैं, जिससे एल्गोरिद्मिक पक्षपात और अत्यधिक कार्यभार (बर्नआउट) जैसी समस्याएं सामने आती हैं। करीब 40 प्रतिशत गिग श्रमिकों की मासिक आय 15,000 रुपए से कम है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि गिग श्रमिकों को ‘फ्रीलांसर’, ‘स्वतंत्र ठेकेदार’ या ‘प्लेटफॉर्म पार्टनर’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे पारंपरिक श्रम कानूनों और परिभाषाओं को लागू करना मुश्किल हो जाता है।

इस तरह की परिभाषाएं उन्हें सामाजिक सुरक्षा, सवेतन अवकाश, न्यूनतम कार्य घंटे और स्वास्थ्य बीमा जैसे लाभों से वंचित कर देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप नौकरी की असुरक्षा और कम आय की स्थिति बनती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐतिहासिक रूप से इस कार्यबल को अनौपचारिक श्रम के रूप में देखा गया है, जो मौजूदा श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रहा है। ऐसे में लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

आर्थिक सर्वेक्षण ने यह भी उल्लेख किया कि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी-सीएसएस) गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को औपचारिक मान्यता देती है और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रावधान करती है।

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कानून गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को एक अलग श्रेणी के रूप में मान्यता तो देता है, लेकिन उन्हें एक समान समूह मानता है, जबकि वास्तविकता में यह कार्यबल कौशल के स्तर के आधार पर अत्यधिक विभाजित है।

केंद्र सरकार ने कहा है कि अब नीति का फोकस निम्न-कौशल श्रमिकों की ऊर्ध्वगामी गतिशीलता पर होना चाहिए—उन्हें कौशल प्रशिक्षण देकर बेहतर वेतन वाली नौकरियों तक पहुंच दिलानी चाहिए और गिग काम को स्थिर व भरोसेमंद आय का साधन बनाना चाहिए।

सर्वेक्षण में पाया गया कि सीमित कौशल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) व मशीन लर्निंग (एमएल) जैसी तकनीकी प्रगति के कारण नौकरी छिनने का डर, गिग श्रमिकों की असुरक्षा को और बढ़ाता है।

एक अन्य बड़ी चुनौती के रूप में रिपोर्ट ने ऋण और उत्पादक परिसंपत्तियों तक सीमित पहुंच को चिन्हित किया है। कई गिग श्रमिक बाइक, कार या विशेष उपकरणों के अभाव में निम्न से मध्यम कौशल वाली नौकरियों में आगे नहीं बढ़ पाते।

रिपोर्ट ने सिफारिश की है कि प्लेटफॉर्म और नियोक्ता, श्रमिकों के साथ मिलकर परिसंपत्तियों और प्रशिक्षण में निवेश करें, ताकि वे अधिक सुरक्षित और बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरियों की ओर बढ़ सकें।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि गिग श्रमिकों को अस्थिर आय से निपटने में मदद की जानी चाहिए। इसके लिए कम लागत वाली आपातकालीन बचत योजनाएं, पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा लाभ, बजट और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों की आवश्यकता है। बाजार को ऐसे लचीले वित्तीय उत्पाद विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जो गिग श्रमिकों की आय के पैटर्न को ध्यान में रखें।

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म गिग बाजार की बुनियादी संरचना का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन शक्ति के इस केंद्रीकरण से शुल्क, एल्गोरिद्म और श्रमिक संरक्षण को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, नीति के जरिए प्रतिस्पर्धा नियमों, डेटा तक पहुंच और एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही सामाजिक अनुबंध को इस तरह पुनर्गठित करने की ज़रूरत है कि गिग काम से श्रमिकों को अधिक न्यायसंगत लाभ मिले।

सर्वेक्षण ने यह भी सुझाव दिया कि नियमित और गिग काम के बीच लागत अंतर को कम किया जाना चाहिए—अनिवार्य लाभों से बचने की प्रवृत्ति को सीमित करके, न्यूनतम प्रति-घंटा या प्रति-कार्य पारिश्रमिक (प्रतीक्षा समय सहित) तय करके—ताकि औपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिले और निम्न व मध्यम कौशल वाले गिग श्रमिकों की आय में सुधार हो सके।

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