

ढाई दशक पहले जब छत्तीसगढ़ राज्य बना, तब यहां का हर वर्ग यह सोच कर खुश था कि अब हमारा ठीक से विकास होगा। क्या वास्तव में ऐसा हो पाया? इसे समझने के लिए डाउन टू अर्थ ने रायपुर के चार वर्ग के लोगों से बात की, जिनके पास अब केवल सपने ही रहे गए हैं। मजदूर वर्ग, छोटा व्यापारी वर्ग, बड़ा व्यापारी वर्ग और मध्य-वर्ग।
इन चार वर्गों में से मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले 55 वर्षीय पुष्पराज सिंह मध्य प्रदेश से रायपुर नौकरी करने यह सोचकर आए थे कि छोटा राज्य बना है, काम के अवसर अधिक होंगे और पैसे भी ठीक मिलेंगे। लेकिन बारहवीं पास करने के बाद भी जब रायपुर में किसी संस्थान में काम नहीं मिला तो राज्य की राजधानी के सबसे बड़े औद्योगिक गांव उरकुरा की एक फैक्टरी में मजदूरी करने लगे।
उन्होंने बताया कि 2001 में जब उन्होंने फैक्टरी में काम शुरू किया तो माह के दो हजार रुपए मिलते थे, और अब 25 साल बाद यह रकम बमुश्किल 15 हजार रुपए पहुंची है।
वह कहते हैं कि यह रकम तब मिलती है जब मैं नियमित रूप से 12 घंटे काम करने के बाद अतिरिक्त ओवरटाइम यानी दिन के और 12 घंटे काम करता हूं। वह बताते हैं कि उनकी हालत ऐसी नहीं है कि वह इंडस्ट्रियल एरिया में एक कमरा किराए पर ले सकें, क्योंकि किराया बहुत अधिक है। इसलिए वह सात किलोमीटर दूर कारा गांव में रहते हैं।
वह कहते हैं कि यहां इतने साल हो गए, लेकिन हमारी हालत वहीं की वहीं है। वह यहां के एक ढलाई प्लांट में काम करते हैं जिसमें लोहा पिघलाया जाता है, फिर उससे अन्य प्रकार के कल पुर्जे बनाए जाते हैं।
उन्होंने जो शर्ट पहनी हुई है, वह पूरी तरह से जालीदार हो चुकी है, कारण कि ढलाई के दौरान जब वह जलती हुई भट्ठी के पास काम करते हैं तो गर्म लोहे के टुकड़े उनके शरीर पर आकर गिरते रहते हैं जिससे उनकी शर्ट ज्यादा दिन नहीं चलती है।
ध्यान रहे कि केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा न्यूनतम मजदूरी 1,035 रुपए प्रतिदिन निर्धारित की गई है और अकुशल श्रमिकों की मजदूरी 783 रुपए है। पुष्पराज कुशल श्रमिकों की श्रेणी में आते हैं लेकिन फैक्टरी द्वारा उन्हें दी जाने वाली मजदूरी अकुशल श्रमिकों के बराबर भी नहीं बैठ रही है।
नए राज्य के निर्माण के बाद छोटे व्यापारियों ने सपने संजोए थे कि अब तो हमारे लोगों की सरकार है तो वह हमारा विशेष ध्यान रखेगी, लेकिन यहां भी हुआ ठीक उल्टा।
राजधानी के एक मोहल्ले में दर्जी की छोटी दुकान चलाने वाले 60 वर्षीय दीपक कुमार ने डाउन टू अर्थ को बताया कि मैं इस दुकान पर पिछले 45 सालों से बतौर दर्जी का काम कर रहा था और कम से कम पांच से छह कारीगरों को भी प्रतिदिन काम मुहैया कराता था। लेकिन रायपुर निगम ने हमें उस दुकान से यह कहकर निकाल दिया कि अब इस प्रापर्टी पर हमारा असली हक नहीं है।
दीपक के मुताबिक, "हमारे पास पिछले 45 साल तक के किराए की रसीद भी है। इसके बावजूद हमारी कहीं सुनवाई नहीं हुई और देखते- देखते हम सड़क पर आ गए। वह अब अपना गुजर-बसर अगरबत्ती व मोमबत्ती शहर के विभिन्न दुकानों में पहुंचाकर मिलने वाले कमीशन से करते हैं। अकेले मैं ही नहीं मेरे जैसे अनगिनत छोटे व्यापारी इसी तरह से सड़क पर आ गए। एक छोटा व्यापारी जो, लगभग पांच से छह लोगों को काम भी देता था, अब दुकान-दर-दुकान जाकर सेल्समैन बन कर रह गया है।"
इसी प्रकार एक बड़े व्यापारी दिनेश ने बताया कि हमारा साड़ियों का कारोबार था। वह बताते हैं कि उनकी दुकान उस इलाके की सबसे बड़ी साड़ी की दुकान थी। फिर निगम ने हमें कानूनी पचड़े में ऐसा फंसाया कि अब मैं रायपुर शहर से बाहर एक छोटी सी दुकान करने पर मजबूर हूं।
नित्यव्रत राय एकाउंटेंट हैं और उन्होंने अपना करियर रायपुर शहर की ही एक फर्म में ही शुरू किया था। उन्होंने 2001 में जब फर्म ज्वाइन की तो उन्हें चार हजार रुपए माह में मिलते थे। इसके बाद उन्होंने 2007 में फर्म बदला तो नई फर्म में उनका वेतन आठ हजार हो गया और 2016 में जब एक और नए फर्म में काम करना शुरू किया तो वेतन 14 हजार रुपए हो गया।
तब से अब तक वह उसी फर्म में काम कर रहे हैं लेकिन उनका वेतन वर्तमान में 22 हजार ही पहुंचा है। छत्तीसगढ़ का 2001 में 5,700 करोड़ रुपए का बजट था। 2025 तक इसमें बीस गुना वृद्धि हो चुकी है लेकिन आमजन की दुनिया जैसे आज से 25 साल पहले थी, वहीं अब भी है।