

"सरकार के पास मौजूदा समय में ना ही अत्यंत गरीबी की कोई परिभाषा है और ना ही वास्तविक गरीबी रेखा को बताने के लिए कोई मजबूत आधार है। आज सरकार दावा कर रही है कि भारत में गरीबी दर 5 फीसदी तक सिमट गई है और करीब बीते 11 वर्षों में 25 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर निकल चुके हैं। लेकिन यह सरकारी दावे ना सिर्फ भ्रामक हैं बल्कि सच से काफी दूर और खोखले हैं। सच्चाई यह है कि आज न सिर्फ गैर कृषि क्षेत्र के रोजगार में बड़ी कमी आई है बल्कि कोविड के बाद रिवर्स माइग्रेशन के कारण 8 करोड़ लोगों को वापस लौटकर खेती-किसानी शुरू करना पड़ा है। व्यक्तिगत कर्ज और रिकॉर्ड स्तर पर सोना गिरवी रख कर लोगों को अपनी आजीविका चलानी पड़ रही है।"
यह बातें विकास अर्थशास्त्री और श्रम व रोजगार पर काम करने वाले संतोष मेहरोत्रा ने राजस्थान के अलवर जिले में निमली स्थित अनिल अग्रवाल एनवॉयरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में 27 फरवरी, 2026 को अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 के एक सत्र में कही। सत्र में वह डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा के सवालों का जवाब दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि गैर कृषि क्षेत्र रोजगार में 75 लाख रोजगार प्रति वर्ष की दर आज घटकर आधी रह गई है। जिसके चलते युवा सर्वाधिक बड़ी बेरोजगारी झेल रहे हैं जबकि रिवर्स माइग्रेशन करके उन्हें खेती-किसानी में अवसर ढूंढना पड़ रहा है।
मेहरोत्रा ने उस मेथेडोलॉजी पर भी सवाल उठाया जिसके आधार पर सरकार यह कह रही है कि भारत में गरीबी दर 5 फीसदी तक सिमट गई है। उन्होंने कहा, गरीबी दर घटने का यह दावा उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के 2022-23 के आंकड़ों पर आधार पर है जबकि यह ध्यान देने लायक बात है कि 2011-12 के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण की मेथेडोलॉजी बिल्कुल अलग थी और 2022-23 के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण की बिल्कुल अलग। इससे हम पुरानी गरीबी दर का आकलन इस नए परिणाम से नहीं निकाल सकते।
मेहरोत्रा ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा, "ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ग्रोथ नहीं हो रही है। लेकिन यह कहना कि गरीबी 5 फीसदी तक सिमट गई है, यह बिल्कुल सही नहीं है। तेंदुलकर समिति की गरीबी रेखा और रंगराजन रंगराजन समिति की गरीबी रेखा के आधार पर 2022-23 में किए गए एक उपभोग सर्वे के हिसाब से गरीबी 26 फीसदी तक है। यानी 5 फीसदी से 26 फीसदी के बीच गरीबी है न कि 5 फीसदी के आस-पास।"
उन्होंने मौद्रिक गरीबी पर आधारित गरीबी रेखा के चलन को खत्म किए जाने को लेकर कहा कि ऐतिहासिक रूप से देखें तो चरम गरीबी का स्तर पहले बहुत अधिक था। उस समय लगभग पूरी आबादी अत्यंत गरीबी में जीवन जी रही थी। वर्ल्ड बैंक की 1993 की परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) आधारित अंतरराष्ट्रीय अत्यंत गरीबी रेखा लगभग 1.08 से 1.09 डॉलर प्रतिदिन था और यह आमतौर पर उपभोग के आधार पर मापी जाती थी। मौजूदा समय में यह लगभग 2.15 डॉलर प्रतिदिन के स्तर पर पहुंच चुकी है। हालांकि, भारत में यह अत्यंत गरीबी के लिए अब उपभोग व्यय का पैमाना नहीं है।
मेहरोत्रा ने कहा, "दुनियाभर में बीते छह दशक से उपभोग व्यय के आधार पर गरीबी का आकलन किया जाता था। उपभोग व्यय का अर्थ कि लोग अपनी आवश्यकताओं पर कितना खर्च कर रहे हैं। यह तरीका सीधा और तुलनात्मक रूप से विश्वसनीय माना जाता था। लेकिन बाद में गरीबी को मापने के लिए बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) का उपयोग शुरू किया गया। यह यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) का खेल था वह बहुत समय से भारत में दखल देने के लिए इसकी जुगत में था। आखिरकार सरकार ने एमपीआई को अपनाया जो कि उपभोग सर्वेक्षण पर आधारित न होकर स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे गैर-आर्थिक आयामों को शामिल करता है। इससे मौद्रिक गरीबी यानी मोनेट्री पॉवर्टी से ध्यान हटाया गया जबकि उपभोग सर्वेक्षण के आधार पर गरीबी का आकलन अधिक प्रत्यक्ष होता है।"
उन्होंने कहा, "उपभोग किसी समाज या अर्थव्यवस्था में न्यूनतम स्तर पर रहने वाले लोगों की वास्तविक जीवन स्थिति को मापने का आधार है।" जबकि एमपीआई यह नहीं बताता है।
मेहरोत्रा ने 2013 के बाद आई सरकार और उनकी नीतियों को लेकर कहा कि इस सरकार के आने के बाद जॉब ग्रोथ रेट नाटकीय रूप से गिरी। इसके बाद नोटबंदी हुई जिसने एमएसएमई और असंगठित सेक्टर को धक्का पहुंचाया और जो कि धीरे-धीरे मंद पड़ गया। रोजगार है नहीं, मैन्युफैक्चरिंग में कमी आई है और ग्रोथ के आंकड़े बिगड़ गए हैं। इसका नॉक आन इफेक्ट हुआ है यानी एक घटना या निर्णय का अप्रत्यक्ष या बाद में होने वाला प्रभाव किसी अन्य क्षेत्र या व्यक्ति पर पड़ रहा है।
कोविड का असर तो दुनिया भर में पड़ा लेकिन चार-पांच साल से निरंतर पूछ रहा हूं कि वित्त वर्ष 2021 में दुनिया की इकोनॉमी 3.1 फीसदी सिकुड़ गई, जबकि हमारी अर्थव्यवस्था 5.36 प्रतिशत घट गई। इसके दो बड़े कारण थे। पहला, स्वास्थ्य प्रणाली को बुरी तरह से संभाला गया और दूसरा, अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह से संभाला गया। 45 लाख लोगों की मौतें कोविड वैक्सीन आने से पहले ही हो गई थीं, जबकि सरकार ने दुनियाभर में अपनी पीठ ठोककर यह दावा किया कि उन्होंने वैक्सीन की वजह से कोविड-19 को काबू कर लिया।"
मेहरोत्रा ने कहा, आज नान फॉर्म सेक्टर में नौकरियां नहीं होने के कारण रीयल वेज बढ़ नहीं रही है। वहीं, कृषि क्षेत्र में लेबर फोर्स का बढ़ना यह दर्शाता है कि गैर कृषि क्षेत्र के कामों में कोई रोजगार नहीं है। उन्होंने समझाया कि, “1947 से 2004 के बीच कृषि में काम करने वाले श्रमिकों का प्रतिशत लगातार घट रहा था, लेकिन कृषि में काम करने वाले लोगों की वास्तविक (कुल) संख्या लगातार बढ़ रही थी। यह स्थिति इसलिए बनी रही क्योंकि कृषि में काम करने वाले श्रमिकों की कुल संख्या बढ़ती जा रही थी, क्योंकि गैर-कृषि क्षेत्रों में उतने रोजगार पैदा नहीं हो रहे थे जितनी अपेक्षा की गई थी। अर्थात उद्योग पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ रहा था। विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) नहीं बढ़ रहा था, निर्माण क्षेत्र नहीं बढ़ रहा था, सेवाएं नहीं बढ़ रही थीं। इसलिए श्रमिकों को कृषि से बाहर निकालने की प्रक्रिया इतनी तेज नहीं थी कि कृषि में काम करने वालों की वास्तविक संख्या कम हो सके।
लेकिन बाद में जब विकास दर लगभग समानांतर रूप से विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से बढ़ी, तो भारत के इतिहास में पहली बार कृषि में काम करने वाले श्रमिकों की कुल संख्या घटनी शुरू हुई। इसका प्रभाव यह पड़ा कि ग्रामीण श्रम बाजार में बदलाव आने लगा।
उसी वर्ष मैं योजना आयोग से जुड़ा था। मैं स्वयं इसे संचालित करने लगा था। मुझे अंदर से पता है कि क्या हो रहा था। मनरेगा का पूरे अर्थव्यवस्था पर नाटकीय प्रभाव पड़ा। इसने ग्रामीण मजदूरी बढ़ा दी, और इससे ग्रामीण श्रम बाजार में कसाव (टाइटनिंग) आ गया।
मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी कई बार ग्रामीण खुले बाजार की मजदूरी से अधिक थी। साथ ही, जब अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ने लगी और निवेश दर बढ़ी, तो श्रमिकों को कृषि से बाहर के क्षेत्रों में काम मिलने लगा। जब श्रमिक कृषि से बाहर जाने लगे, तो ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम बाजार और अधिक सख्त हो गया। इस कसाव के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी बढ़ने लगी। इसका असर शहरी मजदूरी पर भी पड़ा। इस प्रकार पूरी अर्थव्यवस्था में शहरी मजदूरी भी बढ़ी, जो कि पिछले 11 वर्षों में देखने को नहीं मिला।
तो मैं तीन बड़े अंतर की ओर इशारा कर रहा हूं। उस समय, विकास दर अधिक थी। नौकरियों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी। वास्तविक मजदूरी बढ़ रही थी।
ये तीनों चीजें बाद के वर्षों में रुक गईं। और फिर वे दावा करते हैं कि गरीबी केवल 5% रह गई है। क्या आप सच में मुझसे, एक तकनीकी अर्थशास्त्री से, यह उम्मीद करते हैं कि मैं इस पर विश्वास कर लूं? यह विश्वास का प्रश्न नहीं है। इसलिए मुझे गलत तथ्य मत दीजिए, क्योंकि दुनिया में कोई भी इस पर विश्वास नहीं करता।”
2003 में जब मनरेगा शुरु हुआ था, रूरल वेज को इसने बढ़ाया और ठीक उसी समय ग्रोथ रेट भी बढ़िया था। रीयल वेज बढ़ रही थी
। लेकिन एक तकनीकी अर्थशास्त्री के तौर पर यह विश्वास करना बेहद मुश्किल है कि गरीबी 5 फीसदी तक सिमट गई है और दुनिया भी यह दावा नहीं मानेगी। सच्चाई यह है कि आज हाउसहोल्ड सेविंग्स के सहारे अर्थव्यवस्था चल रही है। रीटेल बारोउिंग बढ़ रहा है। बैंक ज्यादातर रीटेलर्स को अपना उपभोक्ता बना रहे हैं। गोल्ड लोन ने नया रिकॉर्ड छू लिया क्योंकि वेजेज नहीं बढ़ रही हैं तो लोग सोना गिरवी रख रहे हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि हम बीते 25 साल से दूसरी सबसे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं और यदि चीन की बात करें तो 1995 से अब तक वह अपनी जीडीपी को पांच गुना बढ़ा चुका है। इसलिए अर्थव्यवस्था के आंकड़े कोई बड़ी सफलता नहीं दिखा रहे हैं।