बजट 2026- 27: वादों का नया पिटारा, पुराने वादे क्या हुए?

केंद्रीय बजट 2026–27 कई इरादों और बड़े प्रस्तावों की सूची जैसा लगता है, लेकिन उन्हें कैसे लागू किया जाएगा, इसकी साफ जानकारी नहीं दी गई है।
बजट 2026- 27: वादों का नया पिटारा, पुराने वादे क्या हुए?
इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
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एक फरवरी को जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना करीब 90 मिनट का भाषण खत्म किया, तो साफ दिखा कि बजट पेश करने का तरीका बदल गया है। अब बजट सिर्फ एक साल की आय-व्यय योजना नहीं रह गया है। पिछले कुछ वर्षों से यह बड़े-बड़े इरादों और लंबे समय के वादों का मंच बन गया है। “विकसित भारत” से लेकर “सबका साथ, सबका विकास”, “अमृत काल” और अब “कर्तव्य” जैसे नारों के साथ सरकार बजट को अलग-अलग लक्ष्यों से जोड़ती है। ये लक्ष्य अक्सर कई साल आगे तक के होते हैं। वो चाहे अगले पांच साल की बात हो या 2047 तक देश को विकसित बनाने का वादा।

प्रस्तावित केंद्रीय बजट 2026-27 भी इससे अलग नहीं है। वित्त मंत्री सीतारमण के भाषण के 177 प्रस्तावों या पैराग्राफ में से आधे से अधिक केवल नीतिगत ढांचे या इरादों से जुड़े थे। अधिकांश नई प्रतिबद्ध योजनाओं के लिए बजटीय आवंटन भी पांच वर्षों में फैलाकर तय किए गए हैं।

इसे ऐसे समझिए। बजट में प्रस्ताव है कि भारत को वैश्विक जैव-औषधि (बायोफार्मास्यूटिकल) निर्माण केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके लिए अगले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए 20,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जो पांच साल में खर्च किए जाएंगे। इसी तरह, शहरों की आर्थिक क्षमता को बढ़ाने के प्रस्ताव के तहत “सिटी इकोनॉमिक रीजन” के लिए 5,000 करोड़ रुपए प्रति क्षेत्र तय किए गए हैं और यह राशि भी पांच वर्षों में दी जाएगी।

कुछ नए प्रस्ताव ऐसे भी हैं, जिनके लिए कोई स्पष्ट बजटीय प्रावधान घोषित नहीं किया गया है। इनमें पांच विश्वविद्यालय टाउनशिप बनाने की महत्वाकांक्षी योजना, हर जिले में बालिका छात्रावास स्थापित करना, भारत-विस्तार योजना शुरू करना, कृषि के लिए बहुभाषी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) उपकरण विकसित करना, और “सेल्फ-हेल्प एंटरप्राइज (एसएचई)–मार्ट” या सामुदायिक स्वामित्व वाले खुदरा आउटलेट स्थापित करना शामिल हैं।

यह बजट एक प्रतिकूल आर्थिक और भू-राजनीतिक माहौल में तैयार किया गया है। पहला, अग्रिम अनुमान के अनुसार 2025-26 में नाॅमिनल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर लगभग 8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो पिछले चार वर्षों में सबसे कम है। दूसरा, निजी कॉरपोरेट निवेश और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग ठहर गए हैं, जिससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ी है। तीसरा, वैश्विक व्यापार व्यवस्था की अनिश्चितता ने निवेश को जोखिम भरा बना दिया है। दूसरी ओर ग्रामीण मजदूरी दर पिछले एक दशक से लगभग ठहरी हुई है, जिससे लोगों की खर्च करने की क्षमता कमजोर हुई है। ऐसे में मौजूदा बजट आदर्श रूप से प्रोत्साहन देने वाला होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं है। 2026-27 के लिए प्रस्तावित कुल व्यय जीडीपी का 13.6 प्रतिशत रखा गया है, जो 2025-26 के 14.2 प्रतिशत और 2024-25 के 14.3 प्रतिशत से कम है।

कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र, जो देश में सबसे बड़े रोजगारदाता हैं और जहां गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा निर्भर है, के लिए 1.62 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। यह राशि 2025-26 के संशोधित अनुमान 1.51 लाख करोड़ रुपए की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक है, लेकिन यह बढ़ोतरी महंगाई की भरपाई के लिए भी पर्याप्त नहीं है। कृषि क्षेत्र की कई प्रमुख योजनाओं के लिए बजटीय आवंटन लगभग पहले जैसा ही रखा गया है या उनमें केवल मामूली बढ़ोतरी हुई है। हालांकि कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कृषि उन्नति योजना (जिसका उद्देश्य उत्पादन, उत्पादकता और किसानों को बेहतर लाभ दिलाना है) के आवंटन में 2026-27 के लिए 4,400 करोड़ रुपए की उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है। इसके विपरीत प्रमुख योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का आवंटन 12,267 करोड़ रुपए से घटाकर 12,200 करोड़ रुपए कर दिया गया है। यह 2019-20 के बाद (आठ वर्षों में) सबसे कम है। यह कटौती तब की गई है, जब आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में स्वयं माना गया है कि कृषि क्षेत्र लगातार मौसम संबंधी झटकों का सामना कर रहा है, जिससे फसलों को भारी नुकसान हो रहा है। योजना की अहमियत 2024-25 के वास्तविक व्यय से भी स्पष्ट होती है, जो 14,473 करोड़ रुपए रहा। मौजूदा आवंटन की तुलना इससे करें तो प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में लगभग 15.7 प्रतिशत की कमी दिखती है। दूसरी ओर दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के कार्यक्रमों के लिए 2026-27 में 17,280 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह 2025-26 के संशोधित अनुमान 14,400 करोड़ रुपए की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक है। हालांकि, 2025-26 का मूल बजट अनुमान 17,104 करोड़ रुपए था, जिसके मुकाबले यह वृद्धि बहुत अधिक नहीं मानी जा सकती। जून 2011 में शुरू हुए इस योजना का लक्ष्य गरीब ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित करना और लगभग 10 करोड़ महिलाओं को लक्षित करते हुए स्थायी आय वृद्धि और बेहतर जीवन स्तर हासिल करने में उनकी मदद करना है।

कई अन्य कार्यक्रमों में या तो बहुत मामूली बढ़ोतरी हुई है या उन्हें 2025-26 के मूल बजट अनुमान (संशोधन से पहले) से भी कम आवंटन मिला है। उदाहरण के तौर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए बजर्ट 2026-27 में लगभग 10 प्रतिशत की कटौती की गई है। पर्यावरण मंत्रालय के अधीन काम कर रहे एक प्रमुख निकाय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को आगामी वित्त वर्ष के लिए 35.26 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। यह 2025-26 के बजट अनुमान में निर्धारित 38.98 करोड़ रुपए से कम है। हालांकि यह राशि पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान 31.26 करोड़ रुपए की तुलना में कुछ अधिक है। इसी तरह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लिए 123 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह 2025-26 के बजट अनुमान 126 करोड़ रुपए से थोड़ा कम है, लेकिन संशोधित अनुमान 116 करोड़ रुपए से अधिक है। वहीं केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के लिए इस वर्ष कुल आवंटन 3,759.46 करोड़ रुपए रखा गया है, जो 2025-26 के बजट अनुमान की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत अधिक है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के तहत नमामि गंगे मिशन–2 के अंतर्गत राष्ट्रीय गंगा योजना के लिए 2026-27 में 3,100 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। यह 2025-26 के संशोधित अनुमान 2,687 करोड़ रुपए से अधिक है, लेकिन मूल बजट अनुमान 3,400 करोड़ रुपए से कम है। यह अंतर बताता है कि 2025-26 में तय स्तर के अनुसार खर्च नहीं हो पाया और बची हुई राशि को नए वित्त वर्ष में आगे बढ़ा दिया गया। ध्यान देने वाली बात यह है कि बजट भाषण में नदियों, यहां तक कि गंगा या प्रस्तावित गंगा-यमुना परियोजनाओं का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जबकि कागज पर आवंटन बढ़ा हुआ दिखाया गया है। 2026-27 के लिए जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग का कुल बजट 19,912.98 करोड़ रुपए रखा गया है। यह पिछले वर्ष के 18,405.74 करोड़ रुपए से अधिक है, लेकिन 2025-26 के मूल अनुमान 25,276.83 करोड़ रुपए से काफी कम है।

साफ ईंधन उपलब्ध कराने वाली योजना उज्ज्वला के बजट में पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान की तुलना में 28 प्रतिशत की कटौती की गई है। 2024-25 में गरीब परिवारों को रसोई गैस (एलपीजी) कनेक्शन देने के लिए वास्तविक खर्च 12,700 करोड़ रुपए था। 2025-26 के बजट अनुमान में इसे घटाकर 9,100 करोड़ रुपए किया गया, जिसे बाद में संशोधित कर 12,736 करोड़ रुपए कर दिया गया। लेकिन 2026-27 के बजट अनुमान में इसे फिर घटाकर 9,200 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस योजना का उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को मिट्टी का तेल, कोयला, लकड़ी, गोबर और फसल अवशेष जैसे पारंपरिक और प्रदूषणकारी ईंधनों से हटाकर स्वच्छ ईंधन अपनाने में मदद करना है।

20 साल पुराने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) कानून की जगह लाए गए विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-ग्रामजी) विधेयक, 2025 के लिए केंद्रीय बजट 2026 में 95,692.31 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। सरकार इस नई योजना को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) से बेहतर बताते हुए 125 दिन के रोजगार का वादा कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्रामीण परिवारों को 125 दिन का रोजगार देना है तो केंद्र सरकार को कम से कम 2.3 लाख करोड़ रुपए का आवंटन करना होगा। मौजूदा आवंटन के आधार पर यह योजना साल में केवल 52 दिन का रोजगार ही सुनिश्चित कर पाएगी। वह भी तब, जब राज्य सरकारें अपनी 40 प्रतिशत हिस्सेदारी (करीब 64,000 करोड़ रुपए) देंगी। राज्यों के योगदान के बिना यह योजना पूरी तरह लागू ही नहीं हो सकती। बजट में मनरेगा के मद में 30,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन भी किया गया है।

बजट भाषण में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, “बड़े शहरों द्वारा उच्च मूल्य के म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करने को प्रोत्साहित करने के लिए मैं 1,000 करोड़ रुपए से अधिक के एकल बॉन्ड निर्गम पर 100 करोड़ रुपए के इंसेंटिव का प्रस्ताव करती हूं।” इसका आशय है कि यदि कोई बड़ा शहर 1,000 करोड़ रुपए से अधिक का एकल म्युनिसिपल (नगर निगम या नगर पालिका) बॉन्ड जारी करता है तो उसे 100 करोड़ रुपए का इंसेंटिव दिया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि बजट में इसके लिए केवल 100 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया है। इसका मतलब है कि इस योजना का लाभ केवल एक ही शहर उठा पाएगा।

कुल मिलाकर, यह बजट कई इरादों और महत्वाकांक्षी प्रस्तावों की सूची जैसा प्रतीत होता है, लेकिन उनकी ठोस रूपरेखा और क्रियान्वयन की स्पष्ट जानकारी का अभाव दिखता है।

नोट: 2017–18 से 2024–25 (वास्तविक); आरई: संशोधित अनुमान; बीई: बजट अनुमान
नोट: 2017–18 से 2024–25 (वास्तविक); आरई: संशोधित अनुमान; बीई: बजट अनुमानस्रोत: केंद्रीय बजट 2026–27, भारत सरकार

पुराने वादे क्या हुए?

केंद्रीय बजट 2025-26 की घोषणाओं का हिसाब-किताब

कृषि जिले : इस पहल के केंद्र में प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना थी। योजना की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार 100 ऐसे जिलों में “परिवर्तनकारी कार्यक्रम” चलाएगी, जहां उत्पादकता कम है, फसल चक्र सीमित है और ऋण उपलब्धता औसत से नीचे है। इसका लक्ष्य 1.7 करोड़ किसानों को लाभ पहुंचाना बताया गया था।

स्थिति: जुलाई 2025 में कैबिनेट ने योजना को मंजूरी दी और अक्टूबर में इसे औपचारिक रूप से शुरू किया गया। इसके बाद जिलों ने अपनी-अपनी कार्ययोजनाएं जमा कराईं। हालांकि, अधिकांश प्रस्ताव अभी भी समीक्षा में हैं और कई जिलों में जमीन पर काम शुरू होता दिखाई नहीं देता।

ग्रामीण समृद्धि

ग्रामीण समृद्धि एवं स्थायित्व कार्यक्रम की घोषणा करते हुए सीतारमण ने कहा था कि इससे “पलायन मजबूरी नहीं, विकल्प बनेगा।” इस योजना को कृषि क्षेत्र में अपर्याप्त रोजगार से निपटने के लिए कौशल, तकनीक और निवेश के जरिये बहु-क्षेत्रीय पहल के रूप में पेश किया गया था।

स्थिति: इस कार्यक्रम का पहला चरण (योजना और तैयारी (2025-27) अटका हुआ है। अवधारणा-पत्र स्वीकृत हुए हैं, राज्यों और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों से परामर्श हुए हैं और समझौता ज्ञापन भी हस्ताक्षरित हुए हैं। लेकिन वास्तविक रोजगार सृजन अभी दूर की बात लगती है।

खाद्य सुरक्षा

दालों में आत्मनिर्भरता के लिए मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेज शुरू किया गया। सीतारमण ने कहा था, “केंद्रीय एजेंसियां तूर, उड़द और मसूर की जितनी मात्रा किसान देंगे, उसे खरीदने के लिए तैयार रहेंगी।”

स्थिति: 11,440 करोड़ रुपए का यह मिशन लागू है। बीज बांटे जा चुके हैं, नई किस्मों को अधिसूचित किया गया है और खरीद की व्यवस्था भी तय की गई है, लेकिन किसानों को “लाभकारी मूल्य” दिलाने के लिए घोषित सब्जी एवं फल समग्र कार्यक्रम अब तक शुरू नहीं हो पाया है। सरकार इसे मौजूदा बागवानी योजनाओं में समाहित करने पर विचार कर रही है, जिससे इसकी मूल महत्वाकांक्षा कमजोर पड़ती दिखती है।

ऋण

बजट में ऋण विस्तार एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया की तरह नजर आता है। सीतारमण ने बताया था कि किसान क्रेडिट कार्ड से 7.7 करोड़ किसान जुड़े हैं और ऋण सीमा 3 लाख रुपए से बढ़ाकर 5 लाख रुपए करने की घोषणा की थी। स्थिति: एक साल बाद भी ऋण सीमा बढ़ाने का फैसला विचाराधीन है। सूक्ष्म उद्यमों के लिए विशेष क्रेडिट कार्ड, एमएसएमई गारंटी का विस्तार और स्टार्टअप कोष जैसी घोषणाएं अभी मसौदे या परामर्श के चरण में ही हैं।

मिशन

पिछले बजट में सरकार ने कई नए “मिशन” घोषित किए थे, जैसे “कॉटन टेक्नोलॉजी मिशन”, “मिशन फॉर पल्सेज”, “मिशन फॉर वेजिटेबल्स एंड फ्रूट्स” और “नेशनल मिशन ऑन हाइब्रिड सीड्स” इनके लिए 500 करोड़ से 1,000 करोड़ रुपए तक के प्रस्तावित आवंटन की बात कही गई थी।

स्थिति: 2026-27 के बजट दस्तावेज बताते हैं कि इन “मिशनों” को 2025-26 के संशोधित अनुमान में एक भी रुपए नहीं मिला। 2026-27 में भी इनके लिए कोई आवंटन नहीं रखा गया है। पिछले वर्ष जिन योजनाओं की बड़े उत्साह से घोषणा की गई थी, वे संशोधित अनुमान में शून्य आवंटन के कारण लागू ही नहीं हो सकीं और इस वर्ष के बजट में उनका नाम तक नहीं दिखता। कुल मिलाकर घोषणाएं जोरदार थीं, लेकिन जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है।

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