

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में प्रस्तावित दो एथनॉल फैक्ट्रियों के खिलाफ चल रहा जन आंदोलन अब केवल पर्यावरणीय चिंता तक सीमित नहीं रह गया है। इस आंदोलन ने विकास की दिशा और प्राथमिकताओं पर बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोग कह रहे हैं कि जब एक दशक से बंद पड़ी हनुमानगढ़ स्पिनिंग मिल को पुनर्जीवित कर रोजगार, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक साथ मजबूत किया जा सकता है तो एथेनॉल आधारित नई औद्योगिक परियोजनाओं पर ही क्यों जोर दिया जा रहा है।
माकपा नेता एडवोकेट रघुवीर वर्मा कहते हैं कि यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हनुमानगढ़ स्पिनिंग मिल कभी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती थी। इसके बंद होने से हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई, किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाया और स्थानीय बाजार में नकदी का प्रवाह रुक गया।
दूसरी ओर, प्रस्तावित एथनॉल फैक्ट्रियों को लेकर पानी की भारी खपत, प्रदूषण और कृषि भूमि पर असर की आशंकाएं सामने आ रही हैं। वह कहते हैं कि हम समय-समय पर प्रशासन को ज्ञापन देकर मिल को शुरू करने की मांग उठाते हैं।
सहकारी मॉडल से औद्योगिक पहचान तक
हनुमानगढ़ में स्पिनिंग मिल की स्थापना की प्रक्रिया 1970 के दशक में शुरू हुई थी और वर्ष 1985 में उत्पादन आरंभ हुआ। शुरुआती सालों में यह मिल सहकारी मॉडल पर संचालित होती थी। प्रतिदिन लगभग 17 टन धागा तैयार होता था, जिसका उपयोग देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ निर्यात के लिए भी किया जाता था।
हनुमानगढ़ उपभोक्ता सहकारी होलसेल भंडार के अध्यक्ष मोहम्मद मुश्ताक जोईया बताते हैं कि उस समय मिल का संचालन स्थानीय स्तर पर होता था जिससे निर्णय जल्दी लिए जाते थे और किसानों से सीधे कपास खरीद संभव होती थी। जोईया के अनुसार मिल प्रबंधन और श्रमिकों के बीच समन्वय था और मिल का लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही वापस लौटता था।
यह मिल केवल औद्योगिक इकाई नहीं थी, बल्कि नरमा-कपास उगाने वाले किसानों, परिवहन से जुड़े लोगों और शहर के छोटे व्यापारियों के लिए भी एक स्थायी आधार थी। स्पिनिंग मिल किसानों से सीधे कपास खरीदती थी, वो भी बाजार से अधिक मूल्य पर। भुगतान भी जल्दी मिल जाता था,अस्सी के दशक मे ये बहुत अहम बात थी।
श्रमिकों और प्रशासनिक कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन स्थानीय बाजार में खर्च होता था, जिससे हनुमानगढ़ की अर्थव्यवस्था में निरंतर गति बनी रहती थ।
स्पिनफैड और गिरावट की शुरुआत
स्थिति 1992-93 के बाद बदलने लगी, जब राज्य सरकार ने गुलाबपुरा, हनुमानगढ़ और गंगापुर की मिलों को मिलाकर राजस्थान राज्य सहकारी स्पिनिंग एवं जिनिंग मिल्स फेडरेशन लिमिटेड (स्पिनफैड) का गठन किया।
यह एक केंद्रीकृत ढांचा था, जिसके बाद हनुमानगढ़ मिल की स्वायत्तता समाप्त हो गई और निर्णय जयपुर से होने लगे।
हनुमानगढ़ स्पिनिंग मिल श्रमिक यूनियन (एटक) के महामंत्री रामकुमार बताते हैं कि स्पिनफैड बनने के बाद हनुमानगढ़ मिल के खाते से गुलाबपुरा यूनिट को करीब आठ करोड़ रुपये उधार दिए गए लेकिन यह राशि वापस नहीं मिल सकी। इससे कार्यशील पूंजी पर सीधा असर पड़ा। कपास की समय पर खरीद नहीं हो सकी और उत्पादन प्रभावित होने लगा।
रामकुमार के अनुसार वर्ष 2015-16 की बैलेंस शीट में मिल को 10.58 करोड़ रुपए के घाटे में बताया गया जबकि गुलाबपुरा मिल को दिया गया पैसा लौट आता तो घाटा ढाई करोड़ ही रह जाता। उनका कहना है कि घाटे में चल रही अन्य इकाइयों का बोझ हनुमानगढ़ मिल पर डाल दिया गया, जिससे इसकी स्थिति बिगड़ती चली गई।
तालाबंदी का सामाजिक असर
कार्यशील पूंजी के अभाव और प्रबंधन संकट के चलते वर्ष 2015-16 में मिल में तालाबंदी कर दी गई। इसके साथ ही हजारों श्रमिक बेरोजगार हो गए। स्थानीय बाजार में खर्च होने वाला वेतन बंद हुआ और शहर की आर्थिक गतिविधियां सुस्त पडऩे लगीं।
किसानों पर भी इसका गहरा असर पड़ा। स्थानीय प्रोसेसिंग एवं जिनिंग यूनिटें बंद होने से नरमा-कपास उगाने वाले किसान खुले बाजार पर निर्भर हो गए। इससे उन्हें फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाया।
रामकुमार बताते हैं कि मिल बंद होने से दो ही वर्ष पहले 2013 में मशीनरी का आधुनिकीकरण किया गया था। आज भी सीमित मरम्मत और रखरखाव से मिल को दोबारा चालू किया जा सकता है। चार से पांच करोड़ रुपये खर्च कर उत्पादन फिर शुरू किया जा सकता है जबकि नई मिल लगानी हो तो सौ करोड़ रुपये में भी न लगे।
सरकारें बदलीं, वादे दोहराए
मिल बंद होने के विरोध में हनुमानगढ़ में लंबा आंदोलन चला। आंदोलन के दबाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने स्पिनफैड की तीनों मिलों की स्थिति सुधारने के लिए एक हाई-पावर कमेटी गठित की। कमेटी ने पीपीपी मॉडल, आर्थिक सहायता और निजी भागीदारी की सिफारिश की लेकिन इन पर अमल नहीं हुआ।
कांग्रेस सरकार के दौरान भी मिल को पुन: चालू करने की मांग उठती रही। वर्ष 2022 में विधानसभा में तत्कालीन सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना ने कहा था कि यदि व्यवहारिक प्रस्ताव आता है और मशीनरी उपयोग योग्य पाई जाती है तो मिल को पीपीपी मोड पर शुरू करने पर विचार किया जाएगा।
तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने फरवरी 2023 के बजट में मिल को चलाने की घोषणा भी की लेकिन उसी वर्ष हुए विधानसभा चुनावों के बाद सरकार बदल गई और यह घोषणा अधूरी रह गई।
हनुमानगढ़ उपभोक्ता सहकारी होलसेल भंडार के अध्यक्ष मोहम्मद मुश्ताक जोईया के अनुसार वर्ष 2023 में स्पिनफैड की साधारण सभा में हनुमानगढ़ स्पिनिंग मिल को पुन: चालू करने का प्रस्ताव पारित किया गया था लेकिन इसे जमीन पर उतारने में नौकरशाही स्तर पर अड़चनें आईं।
एथनॉल फैक्ट्रियां और नया टकराव
इसी बीच, हनुमानगढ़ में दो एथनॉल फैक्ट्रियों के प्रस्ताव सामने आए। इन परियोजनाओं के खिलाफ किसानों और स्थानीय लोगों ने आंदोलन शुरू किया। विरोध का मुख्य कारण जल-खपत, प्रदूषण और उपजाऊ कृषि भूमि पर संभावित असर को लेकर उपजी आशंकाएं हैं।
अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष माकपा नेता एडवोकेट रघुवीर वर्मा का कहना है कि एथनॉल फैक्ट्रियों की तुलना में स्पिनिंग मिल एक आजमाया हुआ और रोजगार-केंद्रित मॉडल है। वर्मा कहते हैं कि मिल को फिर से संचालित करने से करीब एक हजार श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा जबकि परिवहन, व्यापार और कृषि से जुड़े सैकड़ों अन्य लोगों को भी लाभ होगा।
पर्यावरणीय दृष्टि से क्या है बेहतर
कृषि विभाग के सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक वी.एस. नैण बताते हैं कि जिस टिब्बी क्षेत्र में एथनॉल फैक्ट्री लगाने का प्रस्ताव है वह घग्घर नदी के बहाव क्षेत्र का इलाका है और अत्यंत उपजाऊ कृषि क्षेत्र माना जाता है। ऐसे इलाके में वृहद औद्योगिक इकाइयां पर्यावरण और खेती दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।
नैण मानते हैं कि स्पिनिंग मिल को चालू करना न केवल रोजगार के लिहाज से बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अधिक उपयुक्त विकल्प है।
राजस्थान आर्थिक परिषद के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष संतोष राजपुरोहित भी मानते हैं कि रोजगार बढ़ाने के लिए सरकार को आजमाए हुए और टिकाऊ मॉडलों पर ध्यान देना चाहिए। राजपुरोहित के अनुसार हनुमानगढ़ स्पिनिंग मिल घाटे का सौदा नहीं थी और इसके उत्पाद की गुणवत्ता हमेशा बेहतर रही। विवेकपूर्ण नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे फिर से शुरू किया जा सकता है। यह एथेनॉल कारखानों से कहीं बेहतर विकल्प है।
हनुमानगढ़ में एथनॉल फैक्ट्रियों के विरोध के बीच स्पिनिंग मिल का मुद्दा फिर से उभर आया है। स्थानीय लोगों, श्रमिक संगठनों और विशेषज्ञों की राय में हनुमानगढ़ स्पिनिंग मिल को पुनर्जीवित करना ऐसा विकल्प है जो रोजगार, कृषि और पर्यावरण के बीच संतुलन बना सकता है।