

भारतीय सड़कों पर यातायात का व्यवहार कई विकसित देशों से अलग है। एक ही सड़क पर दोपहिया, तिपहिया, कार, बस और भारी वाहन अलग-अलग गति से चलते हैं। कई बार वाहन तय लेन में चलने के बजाय उपलब्ध जगह के अनुसार अपनी दिशा और स्थिति बदलते रहते हैं। ऐसे में उन देशों की सड़कों के लिए विकसित यातायात मॉडल भारत की सड़कों पर वाहनों की आवाजाही और जाम की स्थिति का सटीक अनुमान नहीं लगा पाते। इसी चुनौती को समझने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने ड्रोन से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप यातायात मॉडल विकसित करने की वकालत की है।
शोधकर्ताओं ने दिल्ली के बाहरी इलाके में आठ लेन वाले एक विभाजित हाईवे पर दिन के समय ड्रोन से वीडियो रिकॉर्ड किए। इन वीडियो के विश्लेषण के जरिए 36 हजार से अधिक वाहनों की आवाजाही दर्ज की गई।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम्स रिसर्च में "रेगरेसन-बेस्ड मैक्रस्कोपिक एंड माइक्रोस्कोपिक एनालिसिस ऑफ यूएवी बेस्ड डाटा ऑफ ए डिस्ऑरडलरी स्ट्रीम" शीर्षक से प्रकाशित शोध अध्ययन में यह कहा गया है। इसके शोधार्थी शेखर सिंह, सूर्या एच. रविकुमार और अखिलेश कुमार मौर्य हैं। शोधपत्र के अनुसार, इस प्रक्रिया से 10 फ्रेम प्रति सेकंड की दर से कुल 89,38,920 डेटा पॉइंट जुटाए गए। इन आंकड़ों की मदद से वाहनों की गति, सड़क पर उनकी संख्या और उनके बीच की दूरी जैसे पहलुओं का अध्ययन किया गया।
यातायात बढ़ने पर बदलती है वाहनों के बीच की दूरी
अध्ययन में पाया गया कि सड़क पर यातायात कम होने पर वाहन एक-दूसरे से अधिक दूरी बनाकर चलते हैं। जैसे-जैसे वाहनों की संख्या बढ़ती है और यातायात मध्यम से भारी होता है, उनके बीच का फासला कम होने लगता है। लेकिन यातायात बहुत अधिक बढ़ने और सड़क पर भीड़भाड़ की स्थिति बनने के करीब पहुंचने पर वाहनों के बीच की दूरी फिर बढ़ती दिखाई देती है। यानी वाहनों की संख्या, उनकी गति और उनके बीच की दूरी का संबंध हर स्थिति में एक जैसा नहीं रहता।
शोधकर्ताओं ने यह भी दर्ज किया कि जब यातायात जाम की स्थिति में पहुंच गया और वाहन चल नहीं रहे थे, तब सड़क की पूरी चौड़ाई में घनत्व करीब 900 वाहन प्रति किलोमीटर तक पहुंच गया। यह आंकड़ा पूरी सड़क की चौड़ाई के लिए है, किसी एक लेन के लिए नहीं।
भारतीय सड़कों के लिए अलग आंकड़ों की जरूरत
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता और आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अखिलेश कुमार मौर्य के मुताबिक, भारत में यातायात की स्थितियां उन कई देशों से अलग हैं, जहां मौजूदा यातायात मॉडल विकसित किए गए हैं। इसलिए यहां की सड़कों की विविधता और वास्तविक विशेषताओं को दर्शाने वाले आंकड़े जरूरी हैं।
मौर्य कहते हैं, “भारत में यातायात की स्थितियां उन कई देशों से अलग हैं, जहां मौजूदा यातायात मॉडल विकसित किए गए हैं। हमें ऐसे आंकड़ों की जरूरत है, जो भारतीय सड़कों की विविधता और उनकी विशेषताओं को दर्शाते हों। ड्रोन के जरिए आंकड़े जुटाने से सड़क के किसी हिस्से में बड़ी संख्या में वाहनों और उनकी आवाजाही को स्थान और समय के लिहाज से बहुत बारीकी से दर्ज करने का अवसर मिलता है।”
ड्रोन से प्राप्त आंकड़ों की खासियत यह है कि उनसे सड़क के एक हिस्से में एक ही समय पर बड़ी संख्या में वाहनों की स्थिति और उनकी गतिविधियों को देखा जा सकता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग तरह के वाहन एक-दूसरे के साथ किस तरह चलते हैं और यातायात का दबाव बढ़ने पर उनकी गति तथा दूरी में क्या बदलाव आता है।
छह गणितीय और दो मशीन लर्निंग मॉडल का परीक्षण
शोधकर्ताओं ने जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर यातायात के छह गणितीय मॉडलों का परीक्षण किया। इसके अलावा कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क और रैंडम फॉरेस्ट नाम के दो मशीन लर्निंग मॉडल भी प्रशिक्षित किए। इन मॉडलों का उद्देश्य यातायात के अलग-अलग घनत्व पर वाहनों की गति का अनुमान लगाना था। शोध में एक अहम पहलू यह था कि भारतीय सड़कों पर एक जैसी यातायात स्थितियों में भी वाहनों की गति में काफी अंतर हो सकता है। इसलिए शोधकर्ताओं ने ऐसे मॉडल तैयार करने पर जोर दिया, जो गति का केवल एक निश्चित मान बताने के बजाय संभावित गति का दायरा भी दर्शा सकें।
परीक्षण में पारंपरिक गणितीय मॉडलों में अंडरवुड मॉडल का प्रदर्शन सबसे अधिक निरंतर और बेहतर रहा। वहीं, कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क और रैंडम फॉरेस्ट मॉडल का प्रदर्शन ग्रीनशील्ड्स मॉडल के आसपास रहा, लेकिन वे अंडरवुड मॉडल से बेहतर साबित नहीं हुए। शोधकर्ताओं ने गति में होने वाले उतार-चढ़ाव को समझने के लिए संभाव्य मूलभूत आरेख भी विकसित किए। इससे समान यातायात घनत्व में वाहनों की गति में आने वाले अंतर का विश्लेषण किया जा सकता है।
यातायात प्रबंधन में वास्तविक मॉडल की जरूरत
शोधकर्ताओं के अनुसार, भारतीय सड़कों की वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित ऐसे मॉडल यातायात का अधिक सटीक कंप्यूटर आधारित अनुकरण करने में मदद कर सकते हैं। इनका उपयोग सड़क और चौराहों की बनावट तय करने, यातायात की क्षमता का आकलन करने, जाम का प्रबंधन करने और बुद्धिमान यातायात प्रबंधन प्रणालियां विकसित करने में हो सकता है।
प्रोफेसर मौर्य कहते हैं, “विश्वसनीय यातायात प्रबंधन की शुरुआत ऐसे मॉडलों से होती है, जो भारतीय सड़कों पर यातायात के वास्तविक व्यवहार को दर्शाते हों। ड्रोन से प्राप्त वाहनों की आवाजाही के सूक्ष्म आंकड़ों से अलग-अलग तरह के वाहनों की परस्पर गतिविधियों और उनके व्यवहार में मौजूद बड़े उतार-चढ़ाव को दर्ज किया जा सकता है। यातायात के पारंपरिक मॉडल अक्सर इन पहलुओं को नजरअंदाज कर देते हैं। भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित ऐसे मॉडल यातायात का अधिक वास्तविक अनुकरण करने, सड़कों और चौराहों की बेहतर बनावट तय करने, जाम का प्रबंधन करने, सड़कों की क्षमता का आकलन करने और देश की जरूरतों के मुताबिक बुद्धिमान यातायात प्रबंधन प्रणालियां विकसित करने में मदद कर सकते हैं।” हालांकि, इस अध्ययन के निष्कर्षों को अभी सभी तरह की भारतीय सड़कों पर लागू नहीं किया जा सकता।
शोध में दिल्ली के बाहरी इलाके के एक आठ लेन वाले हाईवे और दिन के समय के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। शोधपत्र में भी एक ही तरह की यातायात व्यवस्था और वाहनों की लंबवत दिशा में आवाजाही के विश्लेषण को इसकी सीमाओं में शामिल किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, अलग-अलग शहरों और तरह-तरह की सड़कों से इसी तरह के विस्तृत आंकड़े जुटाने पर यातायात के व्यवहार को और बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।