हादसे के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सुरंग का मुआयना किया।
हादसे के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सुरंग का मुआयना किया।

उत्तराखंड: पीपलकोटी सुरंग हादसा, हिमालय में खुदाई के लिए जल-विज्ञान पर नए सिरे से विचार जरूरी

तपोवन-विष्णुगाड से पीपलकोटी तक बार-बार सामने आए दबावयुक्त जलभृतों के फटने, सुरंगों में जलप्रलय और भूजल क्षरण के उदाहरण बताते हैं कि पारंपरिक इंजीनियरिंग मॉडल हिमालय को स्थिर चट्टान मानने की गंभीर भूल कर रहे हैं
Published on

उत्तराखंड के चमोली जिले में 520 मेगावाट की विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की टेल-रेस सुरंग के भीतर हुए भीषण हादसे ने एक बार फिर नाजुक हिमालय में बड़े पैमाने पर भूमिगत खुदाई के खतरों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मूसलाधार मानसूनी बारिश ने सुरंग के ऊपर स्थित अस्थिर पर्वतीय ढलान को पूरी तरह पानी से संतृप्त कर दिया था, जिससे जमीन के भीतर पानी जमा होने की परिस्थितियां बन गईं। अचानक चट्टान का एक हिस्सा ढह गया और उसके साथ अत्यधिक दबाव वाला पानी, कीचड़ और मलबा तेज वेग से सुरंग के भीतर घुस आया।

इस जलप्रलय में 22 श्रमिक सुरंग के भीतर फंस गए, जिनमें से 10 की मौत हो गई और कई अन्य संकरे कंक्रीट कक्ष में पानी के तेज बहाव के साथ बह गए। जीवित बचे श्रमिकों ने बताया कि अचानक सुरंग में पानी इस तरह घुसा जैसे जमीन के नीचे बाढ़ आ गई हो। पानी, हवा और मलबा सुरंग के भीतर उसी तरह तेजी से दौड़ रहे थे, जैसे बांध टूटने के बाद पानी का सैलाब आता है।

यह महज कोई एक इंजीनियरिंग हादसा नहीं था। यह हिमालय की वलित और भ्रंशयुक्त पर्वत श्रृंखला में जलविद्युत तथा परिवहन परियोजनाओं के लिए सुरंग निर्माण के दौरान पानी के अचानक रिसाव, जलभृतों के फटने और सुरंगों की अस्थिरता की व्यापक और चिंताजनक समस्या की ओर इशारा करता है।

पहाड़ों के भीतर छिपा पानी

भारतीय हिमालय को अक्सर धरती का ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है। यहां मीठे पानी का विशाल भंडार मौजूद है। इसका बड़ा हिस्सा ग्लेशियरों, बर्फ की परतों और सतही बर्फ के रूप में दिखाई देता है। लेकिन इतना ही महत्वपूर्ण एक जल तंत्र इन पहाड़ों के भीतर भी छिपा हुआ है।

हिमालय युवा वलित पर्वत हैं, जो आज भी भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से लगातार आकार ले रहे हैं। यहां की चट्टानों की परतों में व्यापक रूप से दरारें और भ्रंश हैं तथा वे जगह-जगह टूटी हुई हैं। मेन सेंट्रल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और नॉर्थ अल्मोड़ा थ्रस्ट जैसे प्रमुख भूगर्भीय क्षेत्र इस पूरे इलाके को काटते हुए गुजरते हैं।

हजारों वर्षों से मौसमी बर्फ पिघलने और बारिश का पानी इन दरारों, भ्रंश रेखाओं और चट्टानों के बीच बने गर्तों में रिसता रहा है। इस प्रक्रिया ने ऊंचाई वाले इलाकों में भूमिगत जलभृतों का निर्माण किया है, जिनमें पानी दबाव के साथ जमा रहता है।

सामान्य परिस्थितियों में पहाड़ों के भीतर मौजूद यह जल तंत्र एक नाजुक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। दरारों वाली चट्टानों में जमा पानी चट्टान के भीतर जल-दाब पैदा करता है, जो पर्वतीय ढलानों को भीतर से सहारा देने में योगदान देता है। ये भूमिगत जल भंडार सतही पारिस्थितिकी तंत्रों को भी पानी उपलब्ध कराते हैं।

प्राकृतिक जलधाराओं के जरिए पानी बाहर निकलता है और *धारों* यानी प्राकृतिक पत्थर के जलस्रोतों तथा नौलों यानी जलभृतों से पोषित कुओं जैसे पारंपरिक पेयजल स्रोतों को बनाए रखता है। ये जल भंडार हिमालयी नदियों में मानसून के अलावा अन्य मौसमों में भी पानी के निरंतर प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब ऐसे जल-भूवैज्ञानिक रूप से जटिल क्षेत्रों में कई किलोमीटर लंबी सुरंगें बनाई जाती हैं और इसके लिए टनल बोरिंग मशीनों या ड्रिल-एंड-ब्लास्ट तकनीक का इस्तेमाल होता है, तो यह संतुलन बिगड़ सकता है। किसी पानी से भरे भ्रंश क्षेत्र को सुरंग काट दे तो सुरंग आसपास की चट्टानों से भूजल खींचने वाली एक कृत्रिम नाली में बदल सकती है।

इससे बड़े पैमाने पर भूजल बाहर निकल सकता है, जिससे स्थानीय भूजल स्तर नीचे चला जाता है और उन चट्टानी संरचनाओं की मजबूती कम हो जाती है, जिन्हें भीतर मौजूद जल-दाब से सहारा मिल रहा था। जैसे-जैसे छिद्रों में पानी का दबाव कम होता है, दरारों वाली और कमजोर चट्टानें बैठने या खिसकने लग सकती हैं। इससे जमीन धंसने और सतह पर बनी संरचनाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

इसी प्रक्रिया को जोशीमठ में जमीन धंसने और इमारतों में दरारें पड़ने की घटनाओं के संदर्भ में भी देखा गया है। वहां भूमिगत जल के प्रवाह में बदलाव को जमीन धंसने के कई संभावित कारणों में से एक माना गया है।

पहले की परियोजनाओं से मिली चेतावनियां

यह खतरा नया नहीं है। दिसंबर 2009 में पास की तपोवन-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना के निर्माण के दौरान एक टनल बोरिंग मशीन ने कथित तौर पर सतह से 900 मीटर से अधिक गहराई में मौजूद दबावयुक्त जलभृत को भेद दिया था। इसके बाद भूमिगत जल लगातार तेज धार के रूप में बाहर निकलने लगा। इसका अनुमानित प्रवाह 600 से 700 लीटर प्रति सेकंड था और यह कई महीनों तक जारी रहा। बड़ी मात्रा में भूजल बाहर निकल गया और आसपास के पहाड़ी इलाकों के कई प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने की खबरें सामने आईं।

पिपलकोटी हादसा बताता है कि पिछली परियोजनाओं से मिली सीख को पूरी तरह आत्मसात नहीं किया गया है। एक बार फिर उच्च दबाव वाला पानी और कीचड़ सुरंग में घुस गया, जिससे सुरंग की अंदरूनी संरचना को मजबूत करने का काम प्रभावित हुआ और भूमिगत सुरंग के कुछ हिस्से पानी में डूब गए।

ऐसी घटनाएं एक बुनियादी समस्या को सामने लाती हैं: हिमालय में सुरंगें किसी निर्जीव और स्थिर चट्टान को काटकर नहीं बनाई जा रही हैं। ये दरारों से भरे, जलधारण करने वाले और भूकंपीय रूप से सक्रिय पर्वतीय तंत्रों से होकर गुजरती हैं। यदि इनके निर्माण को सामान्य इंजीनियरिंग परियोजना की तरह देखा गया और भूजल विज्ञान को उतना ही महत्व नहीं दिया गया, तो श्रमिकों, स्थानीय समुदायों और पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं।

ऊंचे हिमालय में और गहराई तक निर्माण के खतरे

इस ताजा हादसे ने उत्तराखंड में प्रस्तावित भविष्य की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। इनमें कर्णप्रयाग से आगे बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थ केंद्रों तक रेल नेटवर्क के विस्तार की योजनाएं शामिल हैं। ये दोनों तीर्थ स्थल समुद्र तल से 3,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हैं।

इस भूभाग में ऊंचाई वाले इलाकों में रेल ढांचा तैयार करना अपने साथ गंभीर जल-भूवैज्ञानिक चुनौतियां लेकर आता है। कभी-कभी इसकी तुलना चीन की छिंगहाई-तिब्बत रेल व्यवस्था से की जाती है, लेकिन यह तुलना पूरी तरह उचित नहीं है। तिब्बत अपेक्षाकृत स्थिर और ऊंचा महाद्वीपीय पठार है, जहां रेल लाइन का बड़ा हिस्सा खुले और सतही भूभाग से होकर गुजरता है। इसके विपरीत, उच्च हिमालय सक्रिय प्लेट टकराव क्षेत्र है, जहां खड़ी ढलानें, संकरी घाटियां, बिखरी और टूटी हुई चट्टानें, सक्रिय भ्रंश तथा अस्थिर जल निकासी तंत्र मौजूद हैं।

125 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में ही 100 किलोमीटर से अधिक रेल मार्ग सुरंगों के भीतर है। यदि रेल ढांचे का विस्तार बद्रीनाथ और केदारनाथ की ओर किया जाता है, तो इसके लिए ऊंचे पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों और उन इलाकों में और गहरी खुदाई करनी होगी, जहां ऊंचाई वाले जलभृतों के लिए पानी का पुनर्भरण होता है।

इस तरह की सुरंगें भूमिगत जल निकासी के प्राकृतिक रास्तों को बदल सकती हैं, नई दरारें पैदा कर सकती हैं और खुदाई वाली जगह से काफी दूर स्थित जलस्रोतों को भी प्रभावित कर सकती हैं। 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर सुरंगों को ऊपर मौजूद चट्टानों के अत्यधिक दबाव का भी सामना करना पड़ता है। कमजोर और पानी से संतृप्त हिमालयी चट्टानों में यह स्थिति ‘सिकुड़ती जमीन’ जैसी समस्या पैदा कर सकती है, जिसमें दबाव के कारण सुरंग की दीवारें अंदर की ओर खिसकने लगती हैं और आसपास की चट्टानी संरचना अस्थिर हो जाती है।

उत्तराखंड में बार-बार हो रही आपदाएं, भूजल का क्षरण और सुरंगों के धंसने की घटनाएं संकेत देती हैं कि पारंपरिक इंजीनियरिंग मॉडल जो पहाड़ों को कंक्रीट और पत्थर के स्थिर ढांचे के रूप में देखते हैं गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण हैं। सतही सर्वेक्षण और सीमित संख्या में की गई परीक्षण बोरिंग अक्सर भ्रंश क्षेत्रों के भीतर छिपे दबावयुक्त जलभृतों का पता लगाने में विफल रहती हैं।

व्यापक और वास्तविक समय में किए जाने वाले जल-भूवैज्ञानिक मानचित्रण तथा उन्नत जांच-बोरिंग के बिना उच्च हिमालय में सैकड़ों किलोमीटर लंबी गहरी सुरंगों की खुदाई जारी रखना उस भूमिगत जल संरचना को स्थायी रूप से नष्ट करने का जोखिम पैदा करता है, जो पूरे क्षेत्र में जीवन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जय सिंह रावत करीब पांच दशकों से पत्रकारिता कर रहे हैं। इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे डाउन टू अर्थ के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in